सावन के तीसरे सोमवार को लखीसराय के अशोकधाम मंदिर से बुरी खबर आई. यहां भगदड़ में 7 श्रद्धालुओं की मौत हो गई. हादसा शिवलिंग के जलाभिषेक के दौरान भीड़ बढ़ने से हो गया, इसमें 7 महिलाओं की दब कर मौत हो गई. अगर बात करें अशोकनाथ धाम मंदिर की तो इस मंदिर के प्रकट होने की कहानी भी बेहद दिलचस्प है. जब बच्चों ने खेल-खेल में सदियों पुराना रहस्य जमीन से उजागर कर दिया था. जिससे इतिहास और आस्था की नई कहानी शुरू हो गई.
बात साल 1977 की है. जगह थी- बिहार का लखीसराय. एक आम सी सुबह. खेतों की मेड़ पर गांव के कुछ बच्चे गिल्ली-डंडा खेल रहे थे. उन्हीं में से एक था- अशोक. उसने पूरी ताकत से डंडा घुमाया. गिल्ली हवा में उछली और कुछ दूर जाकर जमीन पर एक जोरदार आवाज के साथ गिरी. ये आवाज रोज जैसी नहीं थी. ये एक ऐसी गहरी, भारी और खोखली आवाज थी, मानो जमीन के सीने में कोई बहुत बड़ा राज दफ्न हो. अशोक ठिठक गया. वो घुटनों के बल बैठा और अपने नन्हें हाथों से ही मिट्टी खुरचने लगा.

जमीन से निकला काले रंग का शिवलिंग
चंद मिनटों की खुदाई के बाद, उसे काले रंग की कोई गोल, चिकनी सी चीज दिखाई दी. अशोक जोर से चिल्लाया- "अरे. यहां अंदर कुछ है." आवाज सुनकर गांव वाले दौड़े चले आए. कोई फावड़ा ले आया, तो कोई कुदाल. और फिर जैसे-जैसे उस जगह से मिट्टी हटी, वहां मौजूद हर शख्स की सांसें थम गईं. जमीन के सीने से निकला था एक विशालकाय शिवलिंग. इतना विशाल कि हट्टे-कट्टे चार-पांच नौजवान भी उसे एक इंच खिसका नहीं पा रहे थे. भीड़ में खड़े बुजुर्गों की आंखें छलक पड़ीं. उनके कांपते होठों से बस यही निकला- "ये तो वही 'इंद्रदमनेश्वर महादेव' का शिवलिंग है, जिसे सदियों पहले मंदिर ढहने के बाद धरती ने अपनी गोद में समा लिया था." दरअसल ये पाल वंश कालीन सातवीं-आठवीं सदी के राजा इंद्रदमन के दौर का मंदिर था. इन्हीं के नाम पर इस मंदिर को 'इंद्रदमनेश्वर महादेव' कहा गया.
फिर अशोक का क्या हुआ?
गांव वालों ने उसी पल वहां दीये जलाए और पूजा शुरू कर दी. सबकी जुबान पर एक ही बात थी- "ये कोई इत्तेफाक नहीं है, ये भोलेनाथ का सीधा बुलावा है." गांव वालों ने कमर कस ली. गांववालों ने अपना पसीना बहाना शुरू किया. कोई एक ईंट लाया, तो कोई मुट्ठी भर रेत. और देखते ही देखते, उसी शिवलिंग के चारों ओर आस्था का एक छोटा सा मंदिर आकार लेने लगा.
फिर क्या था, इस चमत्कार की खबर जंगल की आग की तरह पूरे बिहार में फैल गई. दूर-दूर से साधु-संतों और भक्तों का सैलाब उमड़ने लगा. आस्था का ये कारवां बढ़ता गया और फिर शुरू हुआ मंदिर का भव्य निर्माण. साल 1993 में पुरी के जगद्गुरु शंकराचार्य ने पूरे विधि-विधान से इस मंदिर का उद्घाटन किया. और जानते हैं इस पावन धाम का नाम क्या रखा गया? 'अशोक धाम'. उसी बच्चे के नाम पर, जिसकी एक ठोकर से महादेव सदियों बाद दुनिया के सामने आए. वो बालक अशोक आज इस मंदिर के पुजारी भी हैं.

मंदिर के पुजारी अशोक, जिनके नाम पर अशोकधाम रखा गया.
आज यही 'अशोक धाम' बिहार के सबसे पवित्र तीर्थ स्थलों में गिना जाता है. हर साल लाखों श्रद्धालु आते हैं. लेकिन ये सिर्फ एक मंदिर नहीं है, बल्कि समाज सुधार का एक बहुत बड़ा केंद्र भी है. यहां बिना किसी दहेज के सैकड़ों शादियां होती हैं.
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