- अरुणाचल प्रदेश में कमलांग टाइगर रिजर्व के रेंज फॉरेस्ट ऑफिसर बंटी ताओ ने Classroom in the Wild पहल शुरू की है
- इस पहल में बच्चे जंगल में पक्षियों की आवाज पहचानना और वन्यजीवों के निशान समझना सीखते हैं
- अपना विद्या भवन और कस्तूरबा गांधी विद्यालय इस कार्यक्रम से जुड़े हैं, महीने में 2 बार कक्षाएं आयोजित होंगी
अरुणाचल प्रदेश के लोहित जिले में बच्चों को वाइल्ड लाइफ और प्रकृति से जोड़ने के लिए एक अनोखी पहल शुरू की गई है. कमलांग टाइगर रिजर्व के रेंज फॉरेस्ट ऑफिसर बंटी ताओ ने 'Classroom in the Wild' शुरू किया है, जिसमें बच्चों की पढ़ाई स्कूल की चारदीवारी से निकलकर जंगल और प्रकृति के बीच हो रही है. इस पहल में बच्चे किताबों तक सीमित रहने के बजाय जंगल में पक्षियों की आवाज पहचानते हैं, तितलियों और कीड़ों को देखते हैं, स्थानीय पेड़-पौधों और जीवों के बारे में सीखते हैं और जानवरों के निशानों को समझते हैं. उन्हें कैमरा ट्रैप और जंगल में वाइल्ड लाइफ की निगरानी के तरीकों की जानकारी भी दी जाती है.
फिलहाल अपना विद्या भवन और कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय इस कार्यक्रम से जुड़े हैं. कक्षाएं हर महीने के पहले और चौथे शनिवार को आयोजित करने की योजना है, ताकि प्रकृति और वाइल्ड लाइफ की पढ़ाई सिर्फ वाइल्ड लाइफ वीक तक सीमित न रहे.
72वें नेशनल वाइल्ड लाइफ वीक (राष्ट्रीय वन्यजीव सप्ताह) के दौरान शुरू की गई इस पहल का मकसद वाइल्ड लाइफ की शिक्षा को कभी-कभार होने वाले अवेयरनेस प्रोग्राम तक सीमित न रखकर, इसे स्कूल की ज़िंदगी का रेगुलर हिस्सा बनाना है.

इस प्रोग्राम में दो स्कूलों - अपना विद्या भवन और कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय (KGBV) - ने हिस्सा लिया है. KGBV के आठवीं क्लास के छात्रों के लिए शनिवार को पहली वाइल्ड लाइफ क्लास हुई.
इस पहल का एक और मकसद युवा सोच और प्रकृति के बीच की दूरी को कम करना और वन्यजीवों व प्राकृतिक पर्यावरण के बारे में गहरी समझ विकसित करना था.
इस कार्यक्रम के तहत, जंगल और उसके आसपास का इलाका एक बड़े क्लासरूम की तरह काम करेगा, जहां छात्र ऑब्ज़र्वेशन और प्रैक्टिकल गतिविधियों के ज़रिए बायोडायवर्सिटी, इकोलॉजी और वन्यजीव संरक्षण के बारे में सीख सकेंगे.

इन क्लासरूम के पीछे का विचार इनका प्राकृतिक माहौल है - जैसे पक्षियों की आवाज़ सुनना, तितलियों को देखना, अनजान पौधों की पहचान करना या जंगल में जानवरों के निशान खोजना.
इस कार्यक्रम में नेचर वॉक, बर्ड वॉचिंग, तितलियों और कीड़ों को देखना, स्थानीय पेड़-पौधों और जानवरों की पहचान करना, वन्यजीवों के निशानों को ट्रैक करना, नेचर जर्नलिंग और फ़ील्ड स्केचिंग जैसी गतिविधियां भी इसमें शामिल हैं. छात्र कैमरा ट्रैप के बारे में भी सीखते हैं और यह भी जानते हैं कि वन अधिकारी संरक्षित इलाकों में वन्यजीवों की निगरानी कैसे करते हैं.
सबसे ज़रूरी बात यह है कि ये कार्यक्रम छात्रों को इंसान और वन्यजीवों के साथ रहने और उनके बीच टकराव के संवेदनशील मुद्दों और वन्यजीव संरक्षण कानूनों के बारे में जानकारी देने में मदद करते हैं.

ये क्लास हर महीने के पहले और चौथे शनिवार को आयोजित करने की योजना है, जिससे प्रकृति की शिक्षा सिर्फ़ 'वाइल्डलाइफ़ वीक' तक सीमित गतिविधि न रहकर सीखने की एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया बन जाए.
इस पहल का मकसद कामलांग टाइगर रिज़र्व और स्थानीय स्कूलों के बीच एक मज़बूत और स्थायी साझेदारी बनाना है, ताकि प्रकृति की शिक्षा का ऐसा मॉडल तैयार किया जा सके जिसे आगे चलकर अरुणाचल प्रदेश के दूसरे स्कूल भी अपना सकें.
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