इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बुधवार को कोर्ट परिसर के अंदर अधिवक्ताओं द्वारा नारेबाजी किए जाने, कोर्ट की कार्यवाही बाधित करने और न्यायिक प्रक्रिया में व्यवधान डालने की घटना को बेहद गंभीरता से लिया है. कोर्ट ने इस पूरे कृत्य को पूरी तरह से अवमाननाकारी मानते हुए रजिस्ट्रार (प्रोटोकॉल) को तत्काल कोर्ट रूम के बाहर लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगालने और हंगामा करने वाले वकीलों की पहचान कर रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है.
कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पहचान होने के बाद अधिवक्ताओं के खिलाफ उत्तर प्रदेश बार काउंसिल को अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए मामला भेजा जाएगा और साथ ही उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही भी शुरू की जा सकती है. यह आदेश जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की सिंगल बेंच ने याचिकाकर्ता देवेंद्र कुमार की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है.
किस मामले में सुनवाई चल रही थी?
दरअसल यह पूरा घटनाक्रम उस समय सामने आया जब कोर्ट नंबर 66 में जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की कोर्ट में देवेंद्र कुमार की जमानत याचिका पर सुनवाई चल रही थी. सुनवाई के दौरान आवेदक के अधिवक्ता ने ट्रायल कोर्ट में दर्ज गवाहों के बयानों को रिकॉर्ड पर लाने के लिए समय मांगा जिसे स्वीकार करते हुए कोर्ट ने मामले को 19 नवंबर के लिए नए मामले के तौर पर सूचीबद्ध कर दिया. हालांकि इसी सुनवाई के दौरान कोर्ट रूम संख्या 66 के बाहर बरामदे में अचानक कुछ वकीलों ने जोर-जोर से आवाज उठानी शुरू कर दी और नारेबाजी करते हुए कोर्ट की कार्यवाही में दखल देना शुरू कर दिया.
इस दौरान अधिवक्ता मन्नू शर्मा ने कोर्ट को अवगत कराया कि कुछ अधिवक्ता मंगलवार को कोर्ट संख्या 49 में एक अधिवक्ता के सम्मान व गरिमा से जुड़ी दुर्भाग्यपूर्ण घटना के विरोध में प्रदर्शन कर रहे है. उन्होंने कोर्ट को यह भी जानकारी दी कि इसी घटना के विरोध स्वरूप कुछ अधिवक्ता कोर्ट संख्या 66 के बाहर गलियारे में खड़े होकर नारेबाजी कर रहे है. इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल ने अपने आदेश में कहा कि इस तरह की घटनाएं कोर्ट की कार्यवाही में सीधा हस्तक्षेप हैं.
कोर्ट ने बेहद कड़े शब्दों में कहा कि दूर-दराज से गरीब और जरूरतमंद वादकारी अपनी समस्याओं के निवारण और न्याय की गुहार लेकर हाईकोर्ट आते हैं. केवल इसलिए कि कुछ अधिवक्ताओं को किसी एक विशेष अदालत से कोई समस्या या शिकायत है उन्हें दूसरी अदालतों के बाहर गलियारे में जाकर नारेबाजी करने, चिल्लाने, वहां की कार्यवाही को बाधित करने और अदालत को डराने-धमकाने वाले शब्दों का इस्तेमाल करने की कतई अनुमति नहीं दी जा सकती.
कोर्ट ने कहा कि ऐसा आचरण पूरी तरह से अनुचित है. इसलिए कोर्ट का मानना है कि कुछ वकीलों का ऐसा बर्ताव पूरी तरह से कोर्ट की अवमानना है. कोर्ट ने रजिस्ट्रार (प्रोटोकॉल) को आदेशित किया कि वो कोर्ट संख्या 66 के बाहर लगे सीसीटीवी कैमरों की रिकॉर्डिंग हासिल करें. उसमें हंगामा और नारेबाजी कर रहे वकीलों की पहचान सुनिश्चित करें और अगली सुनवाई की तिथि तक अपनी विस्तृत रिपोर्ट कोर्ट के समक्ष पेश करें.
अवमानना की कार्रवाई हो सकती है
अधिवक्ताओं की पहचान होने के बाद इस मामले को बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश के पास भेजा जा सकता है ताकि उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की जा सके साथ ही, उनके खिलाफ कोर्ट की अवमानना की कार्यवाही भी शुरू की जा सकती है. रजिस्ट्रार (अनुपालन) को निर्देश दिया जाता है कि वो इस आदेश की कॉपी रजिस्ट्रार (प्रोटोकॉल) को भेजें ताकि इसका अनुपालन सुनिश्चित किया जा सके.
बता दें कि इलाहाबाद हाईकोर्ट में अधिवक्ताओं के सम्मान और गरिमा को लेकर उपजा विवाद अब गहराता जा रहा है. मंगलवार को कोर्ट संख्या 49 में सुनवाई के दौरान एक अधिवक्ता के साथ हुए कथित दुर्व्यवहार, जेल भेजने की चेतावनी और एक पुलिस अधिकारी से माफी मंगवाए जाने के आरोपों के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन ने कड़ा रुख अपनाया है.
बार एसोसिएशन के नव निर्वाचित अध्यक्ष डॉ सीपी उपाध्याय और महासचिव संतोष कुमार मिश्र ने इस पूरे मामले को लेकर हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को औपचारिक पत्र लिखकर कड़ी आपत्ति जताई है और संबंधित कोर्ट के बहिष्कार की चेतावनी दी है. बताया जा रहा है कि वहीं दूसरी ओर इस घटना के विरोध में बुधवार को कोर्ट नंबर 49 के बाहर फिर से अधिवक्ताओं ने हंगामा काटते हुए नारेबाजी की.
इस दौरान कोर्ट परिसर में अफरातफरी का माहौल बन गया जिसके बाद जजों को कोर्ट से जाना पड़ा. कई और कोर्ट का कामकाज भी ठप हो गया. अब परिसर में नारेबाजी और न्यायिक कार्य में बाधा पहुंचाने की घटना को कोर्ट ने गंभीरता से लेते हुए सीसीटीवी फुटेज के जरिए वकीलों की पहचान करने के निर्देश दिए हैं.
क्या क्या आरोप हैं?
दरअसल बार एसोसिएशन द्वारा चीफ जस्टिस को भेजे गए पत्र में आरोप लगाया गया है कि कोर्ट संख्या 49 में एक मामले की सुनवाई के दौरान एक पुलिस अधीक्षक (एसपी) के बैठने को लेकर विवाद शुरू हुआ. बार का कहना है कि नियमों के मुताबिक अधिकारियों के लिए अलग व्यवस्था होती है लेकिन जब अधिवक्ता ने एसपी से पीछे बैठने का आग्रह किया तो अपर शासकीय अधिवक्ता (एजीए) ने इसकी शिकायत कोर्ट से कर दी. आरोप है कि इस पर पीठासीन पीठ ने अधिवक्ता को कड़ी फटकार लगाई, जेल भेजने का आदेश दिया और अधिकारी से माफी मांगने को बाध्य किया.
पत्र में यह भी आरोप लगाया गया है कि अदालत कक्ष में वरिष्ठ अधिवक्ता वीपी श्रीवास्तव का भी मजाक बनाया गया जिसे बार एसोसिएशन ने अधिवक्ताओं की व्यक्तिगत गरिमा और मान-सम्मान का हनन करार दिया है. बार एसोसिएशन ने स्पष्ट किया है कि यदि इस मामले में उचित व ठोस कदम नहीं उठाए गए तो वे संबंधित कोर्ट की कार्यवाही का पूर्ण बहिष्कार करेंगे.
इसी घटना को लेकर बुधवार को कुछ अधिवक्ताओं ने कोर्ट परिसर में विरोध दर्ज कराते हुए नारेबाजी शुरू कर दी. फिलहाल बार एंड बेंच के बीच ये मामला पूरी तरह गरमाता हुआ नज़र आ रहा है. इस मामले को बार एसोसिएशन द्वारा चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया के समक्ष भी पत्र के माध्यम से भेजा गया है.
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