Written Tenancy Agreement: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने किराएदारी से जुड़ी छह याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए अपने महत्वपूर्ण फैसले में उत्तर प्रदेश शहरी परिसर किराएदारी रेगुलेशन एक्ट 2021 का विवरण देते हुए एक कानूनी सिद्धांत निर्धारित किया है. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि यदि मकान मालिक और किराएदार के बीच कोई रेंट एग्रीमेंट नहीं हुआ है या इसकी जानकारी रेंट अथॉरिटी को नहीं दी गई है तब भी मकान मालिक किराएदार को बेदखल करने के लिए आवेदन कर सकता है.
कोर्ट ने क्या कहा?
कोर्ट ने कहा कि प्रावधान से यह निष्कर्ष निकलता है कि 2021 के एक्ट के तहत रेंट अथॉरिटी का अधिकार क्षेत्र सिर्फ लिखित एग्रीमेंट और उसकी जानकारी रेंट अथॉरिटी को देने के मामलों तक सीमित नहीं किया जा सकता. अगर विधायिका ने मकान मालिक या किराएदार को सिर्फ लिखित एग्रीमेंट या उसकी जानकारी के मामलों में ही रेंट अथॉरिटी के पास जाने की सीमित सुविधा देने के बारे में सोचा होता तो सेक्शन 9 के सब-सेक्शन (5) का नियम कानून की किताब में नहीं होता. राज्य विधानमंडल की जानबूझकर की गई चूक के कारण 2021 के अधिनियम के तहत मकान मालिक के शीघ्र बेदखली के अधिकार से वंचित करने वाले गंभीर परिणाम नहीं होंगे.
क्यों दाखिल हुई थी याचिकाएं?
मामले के अनुसार सभी मामलों में याचिकाकर्ता जिन्हें चीफ जस्टिस के 5 मई 2025 के आदेशों द्वारा कोर्ट में नॉमिनेट किया गया. इसमें या तो कोई किराएदार है या मकान मालिक था. इन सबने इमारतों को आवासीय या व्यावसायिक उद्देश्य के लिए किराए पर दिया गया था. इनमें से पांच रिट याचिकाएं भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 के तहत जबकि छठा मामला प्रांतीय लघु वाद न्यायालय अधिनियम, 1887 की धारा 25 के तहत SCC रिवीजन में दायर किया गया था.
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कोर्ट ने उठाया ये मुद्दा
कोर्ट में सभी जुड़े मामलों में ये मुद्दा उठाया गया कि क्या 2021 के एक्ट के प्रावधानों के तहत गठित रेंट अथॉरिटी के पास ऐसे मामलों में मकान मालिक द्वारा दायर आवेदन पर सुनवाई करने का अधिकार क्षेत्र है, जहां किराए का समझौता नहीं किया गया है और अगर समझौता नहीं किया गया है तो मकान मालिक रेंट अथॉरिटी के पास किराए की जानकारी दर्ज करने में विफल रहा है. सभी पक्षों के वकीलों की सहमति से इसे एक ही आदेश द्वारा सुना और तय किया गया.
रेंट एग्रीमेंट नहीं होने पर किया गया था ये दावा
दरअसल सभी मामलों में प्रतिवादी मकान मालिकों ने याचिकाकर्ताओं के खिलाफ किराया प्राधिकरण (रेंट ट्रिब्यूनल) व लघुवाद कोर्ट के सामने बेदखली के लिए आवेदन दायर किया था. इसके खिलाफ याचियों ने हाईकोर्ट में वाद दायर किया. उनका कहना था कि उनके व मकानमालिक के बीच कोई भी रेंट एग्रीमेंट नहीं हुआ है. ऐसे में बिना रेंट एग्रीमेंट के ट्रिब्यूनल और लघुवाद कोर्ट को मामले की सुनवाई करने का अधिकार नहीं है.
मकान मालिकों को बड़ी राहत
कोर्ट ने इस मामले में सभी पक्षों को सुनने के बाद कहा कि हालांकि कानून में लिखित समझौते का प्रावधान है, लेकिन इसके अभाव में मकान मालिक को उसके कानूनी अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने पाया कि उत्तर प्रदेश का किराएदारी अधिनियम 2021 केंद्र सरकार के 'मॉडल टेनेंसी एक्ट' से अलग है. मॉडल एक्ट में समझौते की जानकारी न देना राहत पाने के रास्ते बंद कर देता है, लेकिन यूपी के कानून में ऐसा प्रावधान नहीं रखा गया है. यूपी किराएदारी अधिनियम के अनुसार यदि रेंट एग्रीमेंट को ट्रिब्यूनल के सामने जमा नहीं किया गया है तो मकान मालिक केवल इस आधार पर भी बेदखली के लिए आवेदन करने का पात्र है.
रेंट ऑथोरिटी का अधिकार क्षेत्र केवल उन मामलों तक सीमित नहीं है जहां लिखित समझौता जमा किया गया हो. यह उन किराएदारों पर भी लागू होता है जहां कोई लिखित अनुबंध नहीं है. कोर्ट ने अपने 47 पन्नों के फैसले में उत्तर प्रदेश शहरी परिसर किरायेदारी विनियमन अधिनियम 2021 के अलग-अलग प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा कि 2021 के एक्ट के प्रावधानों के तहत गठित रेंट अथॉरिटी के पास उन मामलों में मकान मालिक द्वारा दायर आवेदन पर सुनवाई करने का अधिकार क्षेत्र है, जहां किरायेदारी एग्रीमेंट नहीं हुआ या मकान मालिक ने अथॉरिटी को किरायेदारी की जानकारी नहीं दी.
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