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सिर्फ बिल भरने से कोई मकान मालिक नहीं बन जाता, किरायेदारी विवाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

Allahabad High Court: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रतिकूल कब्जे से जुड़े एक मामले में बड़ा फैसला सुनाया है. जिसके तहत केवल बिजली बिल या टैक्स की रशीदों पर कोई प्रतिकूल कब्जे का दावा नहीं कर सकता है.

सिर्फ बिल भरने से कोई मकान मालिक नहीं बन जाता, किरायेदारी विवाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
किरायेदारी विवाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
  • इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मकान या संपत्ति से जुड़े प्रतिकूल कब्जे को लेकर बड़ा फैसला दिया है.
  • बिजली बिल या टैक्स की रसीदें जमा करने से संपत्ति पर कब्जे का दावा नहीं किया जा सकता.
  • कोर्ट के इस फैसले से मकान मालिकों को बड़ी राहत मिली है.
प्रयागराज:

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने संपत्ति से जुड़े विवादों और अवैध कब्जों के मामलों में एक बड़ा फैसला सुनाया है. न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि अगर कोई व्यक्ति किसी मकान में या फिर जमीन पर लंबे समय से रह रहा है. लेकिन वह अपने पिछले मालिक के नाम पर ही बिजली बिल या हाउस टैक्स जमा करता है. तो वह इस आधार पर उस संपत्ति पर अपना मालिकाना हक या वैध कब्जे का दावा नहीं कर सकता. कोर्ट का कहना है कि जब संबंधित जमीन या मकान पर रहने के बाद भी अगर कोई शख्स पुराने मालिक के नाम से ही टैक्स और बिल जमा कर रहा तो वह यह स्वीकार भी कर रहा है कि संपत्ति का असली मालिक वहीं है जिसके नाम से टैक्स दिया जा रहा है. यह फैसला न्यायमूर्ति संदीप जैन की बैंच ने सुनाया है. 

गाजियाबाद से जुड़ा था मामला 

दरअसल, यह मामला गाजियाबाद का था. यह एक शख्स अपने परिवार के साथ एक किराए के मकान में 1996 से रह रहा था. लेकिन जब मकान के असली मालिक ने उससे घर खाली करने के लिए कहा था उसने इंकार कर दिया. जिसके बाद यह मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंच गया. किराएदार ने अपनी याचिका में दावा किया कि वह लंबे समय से इस मकान में रह रहा है. इसलिए मकान पर उसका अधिकार होता है. वह नियमित तौर पर मकान का बिजली बिल, हाउस टैक्स भी जमा कर रहा है. उसके सभी दस्तावेज भी इसी मकान के हैं. याचिकाकर्ता का दावा था कि इतने सालों तक रहने और बिल भरने की वजह से कानूनन वह इस संपत्ति का मालिक बन चुका है. उसने कोर्ट को बिजली बिलों और हाउस टैक्स की रसीदों को भी दिखाया था. 

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने क्यों खारिज किया दावा

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के इस दावे को खारिज कर दिया. क्योंकि कोर्ट ने कहा कि वह भले ही इस मकान में रह रहा और बिल जमा कर रहा है. लेकिन बिल वह पुराने मालिक के नाम से ही जमा कर रहा है. उसने कागजों में नाम नहीं बदलवाया था. कोर्ट ने कहा कि जब आप किसी अन्य व्यक्ति के नाम से जारी बिल या टैक्स का भुगतान करते हैं, तो इसका सीधा और साफ मतलब यह होता है कि आप मन ही मन यह स्वीकार कर रहे हैं कि संपत्ति का असली मालिक वही पुराना व्यक्ति है, आप नहीं है. आपके बिल यह दावे तो कर रहे हैं कि आप शारीरिक रूप से उस जगह पर रह रहे हैं, लेकिन मकान के असली मालिक आप नहीं है. 

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मकान मालिकों को मिली बड़ी राहत 

इलाहाबाद हाईकोर्ट यह फैसला अहम माना जा रहा है. क्योंकि इससे उन मकान मालिकों को राहत मिली है जो अपने घरों को किराए पर देते हैं. अक्सर किराएदार लंबे समय तक इन मकानों में रहने के बाद उस पर अपना मालिकाना हक जताने लगते हैं. बिजली बिल मकान टैक्स चुकाने को ही अपने मालिकाना हक का आधार बना लेते हैं और कोर्ट में केस दायर कर देते हैं. लेकिन इलाहाबाद कोर्ट ने इस याचिका को खारिज करते हुए यह तय कर दिया है कि केवल टैक्स चुकाना मकान या संपत्ति का हक नहीं हो सकता है. अदालत ने साफ कर दिया है कि संपत्ति का असली मालिक वही रहेगा जिसके नाम पर जमीन या मकान की कानूनी रजिस्ट्री है. 

क्या होता है प्रतिकूल कब्जा

दरअसल, कानून के मुताबिक प्रतिकूल कब्जा एक कानूनी सिद्धांत है. इसके मुताबिक अगर कोई व्यक्ति किसी दूसरे की जमीन या मकान पर 12 साल से ज्यादा समय तक लगातार बिना किसी रोक-टोक या अवैध कब्जे के रहता है तो उसे उस संपत्ति का कानूनी मालिकाना हक मिल जाता है. हालांकि इसमें कुछ कानूनी पेंच भी हैं. जिसमें सबसे अहम यह है कि असली मालिक को पता होना चाहिए कि उसकी जमीन पर किसी और का नियंत्रण है. किसी तरह का कोई लड़ाई झगड़ा नहीं होना चाहिए. 12 साल से ज्यादा समय तक शांतिपूर्ण कब्जा होना चाहिए. इन्हीं परिस्थितियों में प्रतिकूल कब्जे का दावा किया जा सकता है. लेकिन 

इस मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि पुराने मालिक के नाम पर बिल भरना यह साबित करता है कि कब्जाधारी ने कभी असली मालिक के मालिकाना हक को चुनौती ही नहीं दी, बल्कि उसे मन ही मन स्वीकार किया था. कोर्ट ने फैसले में साफ कर दिया कि इस तरह की परिस्थिति में प्रतिकूल कब्जे का दावा नहीं कर सकते हैं.

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