- सुनेत्रा पवार ने महाराष्ट्र में उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली और अजित पवार की विरासत संभाली है
- अजित पवार के निधन के बाद एनसीपी के विलय की प्रक्रिया फिलहाल अनिश्चित और सस्पेंस में है
- अजित पवार के गुट ने सुनेत्रा पवार को उपमुख्यमंत्री बनाकर अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने की कोशिश की है
महाराष्ट्र की सियासत में आज एक नया अध्याय तो शुरू हुआ, लेकिन अपने साथ कई अनसुलझे सवाल छोड़ गया. सुनेत्रा पवार ने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली. अजित पवार की विरासत को संभालने का ज़िम्मा उठाया, लेकिन इस समारोह में उस एक चेहरे की कमी चर्चा बनी ,जो अजित पवार की अंतिम विदाई की घड़ी में आँसुओं को थामे हुए सुनेत्रा पवार के साथ साये की तरह उन्हें संभालती दिखीं, वो चेहरा थीं सुप्रिया सुले.
अजित पवार के अंतिम संस्कार के वक्त की वो तस्वीरें कोई नहीं भूला है, जब सुप्रिया सुले अपनी भाभी सुनेत्रा पवार को हिम्मत देती नजर आई थीं. तब लगा था कि पवार परिवार का दुख शायद राजनीति की दीवारें गिरा देगा. लेकिन सुनेत्रा के शपथ ग्रहण से सुप्रिया की दूरी ने साफ कर दिया कि इमोशन और इलेक्शन दो अलग पटरी पर हैं. क्या सुप्रिया की ये दूरी शरद पवार की उस नाराजगी का संकेत है जो विलय की चर्चा को ठंडे बस्ते में डालती दिख रही है?
दरअसल, अजित गुट की चिंता है की अगर अभी तुरंत विलय हुआ, तो पार्टी की कमान फिर से शरद पवार के हाथ में चली जाएगी. इसीलिए उन्होंने आनन-फानन में सुनेत्रा पवार को उपमुख्यमंत्री बनाकर अपना पावर सेंटर सुरक्षित किया है.जयंत पाटिल ने भी नरमी दिखाते हुए NDTV पर कहा है कि अगर सुनेत्रा पवार नेतृत्व करती हैं, तो भी उन्हें आपत्ति नहीं. विलय के बाद भी वो नेतृत्व करें इससे आपत्ति नहीं होगी! यह पासा अजित गुट के विधायकों को अपनी ओर खींचने की एक कोशिश भी हो सकती है.
अजित पवार के समर्थक इसे उनकी अंतिम इच्छा बताकर भावनात्मक रूप से विलय का समर्थन कर रहे हैं, ताकि परिवार फिर से एक हो सके. वहीं, शरद पवार गुट इस वक्त वेट एंड वॉच की स्थिति में है.वैसे फिलहाल इन बयानों की बाढ़ में विलय का प्लान फेल नहीं लगता हैं पोस्टपोन और जटिल होता ज़रूर दिख रहा है. अब सब कुछ इस पर निर्भर करेगा कि सुनेत्रा पवार और उनके समर्थक विधायक शरद पवार की छत्रछाया में वापस जाना चाहते हैं या अपनी स्वतंत्र पहचान बीजेपी के साथ मिलकर बनाए रखना चाहते हैं.
सुनेत्रा पवार के कंधों पर अब केवल सरकार की नहीं, बल्कि अजित गुट के अस्तित्व को बचाने की भी भारी जिम्मेदारी है पर सवाल उठ रहे हैं की क्या दिल्ली तय करेगी “घड़ी” की चाल क्या हो? सवाल ये भी है कि क्या दोनों एनसीपी का विलय तभी होगा जब बीजेपी चाहेगी?
बीजेपी के लिए एक मजबूत और एकजुट एनसीपी फायदे का सौदा है या फिर बंटी हुई पार्टी? ये पेंच भी समझना होगा. अगर शरद पवार एनडीए के करीब आते हैं, तभी विलय की राह शायद आसान होगी. अजित पवार के बिना सुनेत्रा पवार के लिए ये रास्ता कांटों भरा है. एक तरफ फडणवीस और शिंदे के साथ तालमेल बिठाना है, तो दूसरी तरफ अपने ही परिवार के पवार से टकराना है. डगर मुश्किल है! क्या सुनेत्रा पवार वो कड़ी बन पाएंगी जो बिखरते कुनबे को जोड़ सके या फिर महाराष्ट्र एक बार फिर पवार बनाम पवार की उसी पुरानी और कड़वी जंग का गवाह बनेगा? खैर, ये महाराष्ट्र है, यहाँ पिक्चर कभी खत्म नहीं होती.
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