- भारत की पहली मेट्रो सेवा 24 अक्टूबर 1984 को कोलकाता में तीन दशकों की तैयारी के बाद शुरू हुई थी
- शुरुआत में मेट्रो का रूट सिर्फ 3.4 किलोमीटर लंबा था और इसमें पांच स्टेशन शामिल थे
- 2002 में दिल्ली मेट्रो ने आधुनिक तकनीक और समयबद्ध निर्माण के साथ भारत में मेट्रो सेवा को नया आयाम दिया
दिल्ली, कोलकाता, मुंबई से लेकर आगरा और लखनऊ जैसे शहरों की सुपरफास्ट कनेक्टिविटी के लिए मेट्रो चल रही हैं. आज देश के ज्यादातर बड़े शहरों में मेट्रो सर्विस है. कई शहरों में काम जारी है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत की पहली मेट्रो किस शहर में और कब शुरू हुई थी? पहली मेट्रो पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में 42 साल पहले आज ही के दिन यानी 24 अक्टूबर 1984 को दौड़ी थी. ये रूट महज 3.4 किलोमीटर का था और पांच स्टेशन थे. वहीं आज मेट्रो देश के 26 से ज्यादा शहरों तक पहुंच चुकी है. कभी साढ़े तीन किलोमीटर के रूट से हुआ मेट्रो रूट अब 1155 किमी को पार कर गया है. भारत की मेट्रो रफ्तार ने जापान जैसे देश को पछाड़ दिया है.
मेट्रो नेटवर्क के मामले में भारत अब जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों को पीछे छोड़कर दुनिया में तीसरे स्थान पर पहुंच चुका है. अब भारत की नजर अमेरिका को पीछे छोड़कर दूसरे स्थान पर पहुंचने पर है.
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कहानी भारत की पहली मेट्रो की
ये बात है साल 1984 की. आज ही के दिन यानी 24 अक्टूबर 1984 को कोलकाता में पहली मेट्रो शुरू हुई थी. इस प्रोजक्ट के लिए कोलकाता शहर ने दो दशकों का इंतजार किया था. 1969 में 'मेट्रोपॉलिटन ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट' की शुरुआत हुई. 1971 में तैयार किए गए मास्टर प्लान में 97.50 किमी का एक नेटवर्क शामिल था, जिसमें उत्तर-दक्षिण दिशा के तीन कॉरिडोर थे. इनमें से तीन को चुना गया. ये तीन लाइनें थीं: दमदम – टॉलीगंज, बिधाननगर – रामराजतला और दक्षिणेश्वर – ठाकुरपुकुर. ट्रैफिक स्टडी के आधार पर, सबसे पहले दमदम – टॉलीगंज कॉरिडोर को लागू करने के लिए चुना गया और 29 दिसंबर 1972 को इस पर काम शुरू हुआ.
24 अक्टूबर 1984 को एस्प्लेनेड और भवानीपुर के बीच लगभग 3.4 किमी का पहला हिस्सा पूरा हुआ, जो भारत की पहली मेट्रो लाइन बनी. 2010 तक इस कॉरिडोर को न्यू गरिया तक बढ़ा दिया गया। कोलकाता के लोगों को एक आधुनिक मेट्रो सिस्टम का लाभ मिला. आज इस मेट्रो में रोजाना करीब 5 लाख यात्री सफर करते हैं.
दिलचस्प बात यह है कि कोलकाता मेट्रो शुरू होने के बाद करीब 18 वर्षों तक देश में किसी दूसरे शहर को मेट्रो सेवा नहीं मिल सकी.

2002 में दिल्ली मेट्रो ने बदली तस्वीर
साल 2002 में दिल्ली मेट्रो की शुरुआत ने भारतीय अर्बन ट्रांसपोर्ट की तस्वीर बदल दी. शाहदरा से तीस हजारी के बीच शुरू हुई यह सेवा समयबद्ध निर्माण, स्वच्छता और आधुनिक तकनीक का नया मॉडल बनी. आज दिल्ली-एनसीआर का मेट्रो नेटवर्क 416 किलोमीटर से अधिक लंबा है और 300 से ज्यादा स्टेशनों के साथ दुनिया के सबसे बड़े शहरी मेट्रो नेटवर्कों में गिना जाता है.
एक दशक में 4 गुना से ज्यादा विस्तार
2014 तक देश में सिर्फ 248 किलोमीटर मेट्रो नेटवर्क था, जो पांच शहरों तक सीमित था. लेकिन 2026 तक यह बढ़कर 1,155 किलोमीटर से ज्यादा हो गया है.
अब मेट्रो केवल दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई और बेंगलुरु तक सीमित नहीं है. लखनऊ, कानपुर, आगरा, भोपाल, इंदौर, जयपुर, नागपुर, पुणे, कोच्चि, पटना और मेरठ जैसे शहर भी मेट्रो नेटवर्क से जुड़ चुके हैं.
निर्माण की रफ्तार भी तेजी से बढ़ी है. जहां पहले एक महीने में 600 मीटर नेटवर्क का निर्माण होता था, वहीं अब यह स्पीड करीब 6 किलोमीटर प्रति माह तक पहुंच गई है.
जापान पीछे, अब अमेरिका अगला लक्ष्य
भारत ने 2022 में 800 किलोमीटर का आंकड़ा पार करने के बाद जापान को पीछे छोड़ दिया था.
चीन: 10000 KM से ज्यादा नेटवर्क
अमेरिका: 1386 KM से ज्यादा नेटवर्क
भारत: 1155 KM से ज्यादा नेटवर्क
भारत और अमेरिका के बीच अब लगभग 216 किलोमीटर का अंतर रह गया है. देशभर में करीब 1000 किलोमीटर नई मेट्रो लाइनें निर्माणाधीन हैं. मौजूदा गति बरकरार रही तो भारत अगले कुछ सालों में अमेरिका को पीछे छोड़कर दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मेट्रो नेटवर्क वाला देश बन सकता है.
1 करोड़ से ज्यादा लोगों की लाइफलाइन
1984 में कुछ हजार यात्रियों से शुरू हुआ यह सफर अब रोजाना 1.15 करोड़ से अधिक यात्रियों तक पहुंच चुका है. मेट्रो ने बड़े शहरों में ट्रैफिक जाम, प्रदूषण और यात्रा समय को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.
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