Ravish Kumar Prime Time : रवीश का सवाल- UP में अगर कानून का राज है तो हाईकोर्ट ने NSA के 78% केस खारिज क्यों किए? 

Ravish Kumar Prime Time: वरिष्ठ पत्रकार ने नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के हवाले से बताया कि साल 2016 से साल 2019 के बीच IPC की धारा 124A के तहत दर्ज होने वाले ऐसे मामलों की संख्या में 160 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है लेकिन सजा की दर घट गई है.

वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार (Ravish Kumar) ने अपने शो 'Prime Time With Ravish Kumar' के ताजा एपिसोड (16 जुलाई, 2021) में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस बयान पर सवाल उठाए हैं, जिसमें उन्होंने वाराणसी की सभा में कहा था कि यूपी में कानून का राज है. उन्होंने पूछा है कि अगर उत्तर प्रदेश में कानून का राज है तो फिर क्यों जनवरी 2018 से दिसंबर 2020 के बीच इलाहाबाद हाई कोर्ट ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून से जुड़े 120 मामलों में से 94 (78 फीसदी) को खारिज कर दिया था और टिप्पणी की थी कि राज्य सरकार ने इस कानून का दुरुपयोग किया है.?

वरिष्ठ पत्रकार ने पूछा है कि क्या प्रधानमंत्री को इसी तरह का कानून का राज पसंद है? उन्होंने कहा कि डॉ. कफ़ील खान के केस में इलाहाबाद हाई कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस गोविंद माथुर ने कहा था कि उन पर अवैध रूप से NSA लगाया गया है. रवीश ने पूछा, "क्या यही कानून का राज है कि किसी पर भी अवैध रूप से NSA लगा दिया जाए?" उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस की खबर का हवाला देते हुए कहा कि 11 मामलों में हाई कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस ने टिप्पणी की कि जिलाधिकारियों ने अपने दिमाग तक का इस्तेमाल नहीं किया और NSA को बढ़ाते रहे ताकि आरोपी को जमानत न मिल सके. कम से कम इन 11 मामलों में जिलाधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई तो होनी ही चाहिए.

रवीश ने कहा कि असहमति को दबाने के लिए सिर्फ राजद्रोह के कानून का गलत इस्तेमाल नहीं हो रहा है बल्कि UAPA और NSA का भी दुरुपयोग हो रहा है. उन्होंने कफ़ील खान के मामले को उठाते हुए कहा कि जब खान ने अलीगढ़ के सीजेएम कोर्ट में याचिका लगाई और पूछा कि चार्जशीट से पहले पुलिस ने क्या राज्य या केंद्र सरकार से इजाजत ली थी तब पुलिस ने कहा था, नहीं ली थी. अब कफ़ील खान FIR रद्द कराने की लड़ाई लड़ रहे हैं.

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वरिष्ठ पत्रकार ने नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के हवाले से बताया कि साल 2016 से साल 2019 के बीच IPC की धारा 124A के तहत दर्ज होने वाले ऐसे मामलों की संख्या में 160 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है लेकिन सजा की दर घट गई है.

आर्टिकल 14 डॉट कॉम की एक खबर का हवाला देते हुए उन्होंने कहा, "10 साल में 11,000 लोगों के खिलाफ राजद्रोह के केस दर्ज हुए. इनमें से 65 फीसदी मामले 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद दर्ज हुए हैं. जिन पर ये मुकदमे दर्ज हुए हैं, उनमें कई पत्रकार, छात्र, विपक्षी नेता, लेखक और प्रोफेसर शामिल हैं. 2014 के बाद दर्ज हुए मामलों में से 388 मामले आलोचनात्मक और अभद्र टिप्पणियों से जुड़े हैं. 149 लोगों पर पीएम मोदी और 144 लोगों पर सीएम योगी के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी या आलोचना करने के आरोप हैं. उत्तर प्रदेश में 2010 के बाद से राजद्रोह के 115 केस दर्ज हुए हैं. इनमें से 77 फीसदी केस योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद दर्ज हुए हैं."

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उन्होंने पूछा कि क्या आलोचना करने की लोगों को इतनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी? क्या इसी डर से लोग 110 रुपये प्रति लीटर पेट्रोल की कीमत चुका रहे हैं और सोशल मीडिया में लिखने से घबरा रहे हैं कि कहीं पुलिस केस न कर दे? सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ने भी कहा है कि इसका इस्तेमाल अब अति हो चुका है. जिस कानून को अंग्रेजों ने गांधी और तिलक पर लगाया, उसे हम क्यों बनाए रखना चाहते हैं? कोर्ट ने कहा कि राजद्रोह कानून संस्थाओं के कामकाज पर गंभीर खतरा है.


वरिष्ठ पत्रकार ने इस कानून के इस्तेमाल में सरकारी तंत्र द्वारा किए जा रहे भेदभाव के बारे में शुरुआत में ही बताया और कहा कि सरकारें बेपरवाह हो गई हैं और राजनीतिक संरक्षण में पुलिस बेलगाम. उन्होंने पूछा कि आखिर कब तक न्याय व्यवस्था इस बात से अनजान बनी रह सकती है कि आए दिन वैसे नागरिकों पर राजद्रोह लगाए जा रहे हैं जो सरकारों से सवाल पूछते हैं. उन्होंने कहा कि आप कल्पना नहीं कर सकते कि इन तीनों कानूनों ने सरकार को कितना बेलगाम और डरावना बना दिया है. 

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