सेना की महिला अफसरों की ओर से दायर अवमानना याचिका पर SC दो हफ्ते बाद करेगा सुनवाई

सुनवाई के दौरान एडिशनल सॉलिसिटर जनरल संजय जैन ने कहा कि उन्हें दो हफ्ते का वक्त दिया जाए. इस दौरान सेना इन महिला अधिकारियो के समस्याओं का उचित हल निकालेगी.

नई दिल्‍ली :

सुप्रीम कोर्ट में सेना की महिला अधिकारियों की ओर से दायर अवमानना याचिका पर सुनवाई के दौरान एडिशनल सॉलिसिटर जनरल संजय जैन ने कहा कि उन्हें दो हफ्ते का वक्त दिया जाए. इस दौरान सेना इन महिला अधिकारियो के समस्याओं का उचित हल निकालेगी.  इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह दो हफ्ते बाद इस मामले की फिर से सुनवाई करेगा. गौरतलब है कि सेना की 72 महिला अफसरों ने सेना,रक्षा मंत्रालय, सीडीएस, सेना प्रमुख , मिलेट्री सचिव के खिलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अवमानना की याचिका दायर है. इन महिलाओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इनको स्थायी कमीशन दिया जाए पर अभी तक सेना ने नहीं दिया. इसे लेकर इन महिलाओं ने सेना को कानूनी नोटिस भी भेजा लेकिन अब तक कोई जवाब नही मिला. सुप्रीम कोर्ट ने 25 मार्च 2021 को अपना फैसला सुनाया था इसके तहत 25 जून तक इन महिलाओं को स्थाई कमीशन दे दिया जाना था पर सेना ने अब तक नहीं दिया.

सेना ने एक याचिका दायर कर कोर्ट से जजमेंट में सुधार करने की प्रार्थना की जिसको सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया. इसी वजह से एक बार फिर सेना की इन महिला अधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. गौरतलब है कि ये वे महिलायें है जिन्होनें सेना के मापदंड के अनुसार  सेलेक्शन बोर्ड फाइव में भी 60 फीसदी अंक हासिल कर दिखाए. बावजूद इसके, इन महिलाओं को सेना स्थायी कमीशन देने में आनाकानी कर रही है वह भी तब, जब इन महिलाओं की महज दो से 10 साल तक की नौकरी ही बची है.  स्‍थायी कमीशन के लिये सेना में महिलाओं ने काफी लंबी लड़ाई लड़ी है. 2010 में जाकर दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि महिलाओं को भी सेना में स्थायी कमीशन मिले. वायुसेना और नौसेना तो हाईकोर्ट के फैसले को मान गई पर थल सेना यह मानने को तैयार नहीं हुई. वह इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चली गई . थल सेना की अपनी महिला अफसरों को स्थाई कमीशन न दिये जाने के पीछे की दलील भी सुनने लायक है. पहला तर्क दिया कि सेना में जवान गांवों या छोटी जगहों से आते हैं और वे अपने महिला अफसर से कमांड नहीं लेंगे यानी कि महिलाओं की बात नहीं सुनेंगे. महिलाओं को पारिवारिक जिम्मेदारी निभानी पड़ती है इसलिए वह सेना की जिम्मेदारी सही तरीके नही निभा पाएगी.


सेना में अपनी नौकरी के दौरान इन महिलाओं ने एक नहीं, पांच-पांच इम्तिहान अव्वल नंबरों से पास किए. पहली परीक्षा पांच साल की नौकरी के बाद दी, फिर दस साल की नौकरी के बाद  इसके बाद स्थायी कमीशन के लिए सिलेक्शन बोर्ड फाइव पास किया. इतना ही नहीं, लेफ्टिनेंट से कैप्टन, कैप्टन से मेजर और मेजर से लेफ्टिनेंट कर्नल बनने के लिए भी इम्तहान पास किए. इसके बावजूद इन महिलाओं को लेफ्टिनेंट कर्नल पद पर टाइम स्केल प्रमोशन दिया गया जबकि इनके साथ के पुरुष साथी को तीन साल पहले ही कर्नल रैंक मिल गया. सेना में कार्यरत महिलाओं का कहना है कि वे तो पुरुषों की तुलना में डबल ड्यूटी निभाती हैं. वर्दी की जिम्मेदारी तो निभाती ही हैं, परिवार भी संभालती हैं और बच्चे भी पालती हैं. जब कश्मीर या उत्तर पूर्वी राज्यों में फील्ड ड्यूटी करनी पड़ती है तो अपने बच्चे को परिजनों के पास छोड़कर अपनी जिम्मेदारी निभाती हैं . सेना की नौकरी 24*7 की होती है . रात हो या दिन, जब भी आदेश आता है उसी वक्त काम करना पड़ता है. सेना में वैसे तो अभी 1500  के करीब महिला अफसर है . पुरुष अफसरों  की तादाद 48,000 के आसपास है. पुरुष अधिकारियों की तुलना में यह संख्या करीब तीन फीसदी ही है . अब सेना की इन 72 महिला अफसरों की उम्मीद फिर से सर्वोच्च न्यायालय पर ही टिकी है.

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