
फाइल फोटो
नई दिल्ली:
दिल्ली की एक अदालत ने एक निर्माणाधीन इमारत के मालिक को करंट लगने से मारे गए एक मजदूर के माता-पिता को पांच लाख रुपये का मुआवजा अदा करने का निर्देश दिया है और कहा कि किसी संपत्ति पर मालिकाना हक रखने वाले की जिम्मेदारी है कि मदजूरों की सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा जाए।
अदालत ने कहा कि संपत्ति स्वामी ने उचित सावधानी बरतने में लापरवाही की और उसे परिसर में पड़े बिजली के तार से होने वाले नुकसान का पूर्वानुमान होना चाहिए था।
अतिरिक्त जिला न्यायाधीश कामिनी लाउ ने कहा, ‘‘घटना के सभी चश्मदीदों (मजदूरों) का कहना है कि उन्होंने बार-बार प्रतिवादी गोविंद सिंह चौहान को बिजली के तार के बारे में सूचित किया था और उस जगह टेप लगाने का आग्रह भी किया था, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने इस संबंध में कोई कदम नहीं उठाये।’’
अदालत ने 25 वर्षीय दीपक मंडल के माता-पिता को पांच लाख रुपये मुआवजा दिए जाने का आदेश देते हुए फैसला सुनाया। मंडल यहां सरिता विहार में चौहान की निर्माणाधीन इमारत में काम कर रहा था और जुलाई, 2005 में बिजली का करंट लगने से उसकी मौत हो गई थी।
मंडल के माता-पिता ने चौहान से मुआवजे की मांग करते हुए याचिका दाखिल की थी।
अदालत ने चौहान की इस दलील को खारिज कर दिया कि ना तो मंडल इमारत में काम कर रहा था और ना ही वह संपत्ति के मालिक हैं।
अदालत ने कहा कि चौहान ने हालात से बच निकलने के लिए जानबूझकर यह दावा किया कि वह किरायेदार थे लेकिन उन्होंने वास्तविक मालिक की जानकारी नहीं दी, जिससे पता चलता है कि संपत्ति उनकी है।
अदालत ने कहा कि संपत्ति स्वामी ने उचित सावधानी बरतने में लापरवाही की और उसे परिसर में पड़े बिजली के तार से होने वाले नुकसान का पूर्वानुमान होना चाहिए था।
अतिरिक्त जिला न्यायाधीश कामिनी लाउ ने कहा, ‘‘घटना के सभी चश्मदीदों (मजदूरों) का कहना है कि उन्होंने बार-बार प्रतिवादी गोविंद सिंह चौहान को बिजली के तार के बारे में सूचित किया था और उस जगह टेप लगाने का आग्रह भी किया था, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने इस संबंध में कोई कदम नहीं उठाये।’’
अदालत ने 25 वर्षीय दीपक मंडल के माता-पिता को पांच लाख रुपये मुआवजा दिए जाने का आदेश देते हुए फैसला सुनाया। मंडल यहां सरिता विहार में चौहान की निर्माणाधीन इमारत में काम कर रहा था और जुलाई, 2005 में बिजली का करंट लगने से उसकी मौत हो गई थी।
मंडल के माता-पिता ने चौहान से मुआवजे की मांग करते हुए याचिका दाखिल की थी।
अदालत ने चौहान की इस दलील को खारिज कर दिया कि ना तो मंडल इमारत में काम कर रहा था और ना ही वह संपत्ति के मालिक हैं।
अदालत ने कहा कि चौहान ने हालात से बच निकलने के लिए जानबूझकर यह दावा किया कि वह किरायेदार थे लेकिन उन्होंने वास्तविक मालिक की जानकारी नहीं दी, जिससे पता चलता है कि संपत्ति उनकी है।
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