'इससे कोरोना टीकाकरण प्रक्रिया हो सकती है प्रभावित' : वैक्‍सीन के लिए मजबूर न करने की याचिका का केंद्र ने किया विरोध

लोगों को वैक्सीन लगाने के लिए विवश न करने और ट्रायल डेटा सार्वजनिक करने की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को नोटिस जारी किया था. हालांकि SC ने वैक्सीन लगाने के लिए विवश करने पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार किया था.

'इससे कोरोना टीकाकरण प्रक्रिया हो सकती है प्रभावित' : वैक्‍सीन के लिए मजबूर न करने की याचिका का केंद्र ने किया विरोध

सुप्रीम कोर्ट में  13 दिसबंर को इस मामले में अगली सुनवाई होगी (प्रतीकात्‍मक फोटो)

नई दिल्‍ली :

कोरोना वैक्सीन के क्लीनिकल ट्रायल के आंकड़े देने और वैक्सीन के लिए मजबूर न करने की याचिका का केंद्र सरकार ने विरोध किया है. सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने कहा, 'कुछ लोगों के निहित स्वार्थ के लिए दाखिल ऐसी याचिकाओं से टीकाकरण प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है.यहां तक कि कोर्ट की कोई मौखिक टिप्पणी भी नुकसानदेह हो सकती है.' इसके साथ ही केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि 24 नवम्बर 2021 तक कोरोना के टीके की एक अरब 19 करोड़ 38 लाख 44 हजार 741 खुराकें दी जा चुकी हैं,  इनमें से adverse event following immunisation यानी AEFI के 2116 मामले अब तक दर्ज किए गए हैं. 495 (463 कोविशील्ड और 32 कोवैक्‍सीन) के लिए तेजी से समीक्षा और विश्लेषण की एक रिपोर्ट पूरी हुई है जबकि 1356 मामलों (1236 कोविशील्ड, 118 कोवैक्‍सीन और 2 स्पुतनिक) की एक और रिपोर्ट गंभीर AEFI मामलों (पहले से विश्लेषण किए गए 495 मामलों सहित) को NEGVAC को प्रस्तुत किया गया है. शेष मामलों की त्वरित समीक्षा और विश्लेषण चल रहा है और जल्द ही इसे पूरा कर लिया जाएगा.  

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केंद्र सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने कहा कि इस याचिका पर सुनवाई न हो क्‍योंकि इससे वैक्सीन के लिए हिचकिचाहट बढ़ सकती है. देश बड़ी मुश्किल से इससे बाहर आया है.  इस पर जस्टिस नागेश्वर राव ने कहा कि इसीलिए हमने कहा कि आपके पास कुछ विशिष्ट तथ्य हों तो उस पर सुनवाई की जाए. हम भी नही चाहेंगे कि टीकाकरण को लेकर कोई समस्या आए. फिर भी यदि हमारे सामने ठोस तथ्यों के साथ अगर कोई मामला आए तो हमें उसको सुनना होगा. सुप्रीम कोर्ट में  13 दिसबंर को इस मामले में अगली सुनवाई होगी. सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि कई राज्य है जिन्होंने टीकाकरण न कराने वालों पर कई तरह के प्रतिबंध लगा रखे हैं.जस्टिस एल नागेश्वर राव ने कहा कि क्या ऐसा कोई आदेश सरकारों की तरफ से दिया गया है? अगर ऐसा है तो आदेश को चुनौती दी जा सकती है. भूषण ने कहा कि फिलहाल केंद्र ने एक RTI के जवाब में यह जानकारी दी है कि ऐसा कोई आदेश जारी नही किया गया है. हालांकि हमें मध्य प्रदेश, दिल्ली और महाराष्ट्र राज्य द्वारा जारी आदेश मिल गए हैं. हमने उन्हें जमा कर दिया है. जस्टिस राव ने कहा, 'यदि राज्य सरकारों की ओर से जारी आदेशों को चुनौती देना चाहते हैं तो बेशक दे सकते हैं.'  कोर्ट ने साफ कहा कि अगर आप किसी राज्य के आदेश को चुनौती देंगे तो संघीय ढांचे के इतर हम बिना राज्य को सुने क्या रद्द कर देंगे? 

दरअसल, 9 अगस्त को लोगों को  वैक्सीन लगाने के लिए विवश न करने और ट्रायल डेटा सार्वजनिक करने की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया था. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने वैक्सीन लगाने के लिए विवश करने पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार किया था. जस्टिस एल नागेश्वर रॉव ने कहा था,'देश में 50 करोड़ लोगों को वैक्सीन लगाई जा चुकी हैआप क्या चाहते हैं कि वैक्सीनेशन कार्यक्रम को बंद कर दिया जाए.  देश में पहले ही वैक्सीन हेसिसटेंसी चल रही है. WHO ने भी कहा है कि वैक्सीन हेसिसटेंसी ने बहुत नुकसान किया है. क्या आपको लगता है कि यह बड़े जनहित में है? जब तक हम नहीं पाते कि निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा कुछ गंभीर रूप से गलत किया गया है, हम वैक्सीन हैसिसटेंसी से लड़ रहे हैं तो ऐसी याचिकाएं लोगों के मन में संदेह पैदा नहीं कर रही हैं. हमें कुछ आशंका है कि एक बार जब हम इस याचिका पर विचार करते हैं तो यह संकेत नहीं देना चाहिए कि हम वैक्सीन हिचकिचाहट को बढ़ावा दे रहे हैं.' उन्‍होंने कहा, 'वैक्सीन की अनिवार्यता पर भी अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट समेत कई विदेशी अदालतों के आदेश हैं. आप इस तरह पब्लिक हेल्थ के साथ छेड़छाड़ नहीं कर सकते. 100 साल में हमने ऐसी महामारी नहीं देखी, इसलिए इमरजेंसी में वैक्सीन को लेकर संतुलन बनाना जरूरी है.' 

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याचिकाकर्ता की ओर से प्रशांत भूषण ने कहा था कि सीरो रिपोर्ट के मुताबिक 2/3 लोग कोविड संक्रमित हो चुके हैं. ऐसे में कोरोना की वैक्सीन से एंटी बॉडी ज्यादा कारगर है.अब पॉलिसी बनाई गई हैं कि वैक्सीन नहीं लगाई गई तो यात्रा नहीं कर सकते. कई प्रतिबंध लगाए गए हैं.सरकार क्लीनिकल डेटा को सार्वजनिक नहीं कर रही है. चूंकि वैक्सीन स्वैच्छिक है तो अगर कोई वैक्सीन नहीं लगवाता है तो उसे किसी सुविधा से वंचित नहीं किया जाए. सुप्रीम कोर्ट में टीकाकरण के राष्ट्रीय तकनीकी सलाहकार ग्रुप के पूर्व मेंबर जैकब पुलियेल की ओर से यह अर्जी दाखिल की गई है.याचिकाकर्ता के वकील प्रशांत भूषण ने अर्जी दाखिल कर कहा है कि वैक्सीजन के क्‍लीनिकल ट्रायल के साथ-साथ वैक्सीन के विपरीत प्रभाव के बारे में डेटा सार्वजनिक किया जाए.कोविड 19 वैक्सीन के क्‍लीनिकल ट्रायल और वैक्सीन लेने के बाद हुए प्रतिकूल प्रभाव का डेटा सार्वजनिक किया जाए क्योंकि वैक्सीन की इमरजेंसी इस्तेमाल की इजाजत दी गई है. SC में में अर्जी दाखिल कर वैक्सीन के क्‍लीनिकल ट्रायल और वैक्सीन के बाद के विपरीत रिएक्शन के डेटा के मामले में पारदर्शिता की गुहार लगाई गई है.याचिका मेंटीकाकरण के विपरीत प्रभाव के बारे में डिटेल पब्लिक करने के लिए केंद्र सरकार को निर्देश देने की मांग की गई है. 


याचिका में यह भी कहा गया है कि केंद्र को निर्देश दिया जाए कि जिन लोगों ने कोरोना से बचाव के लिए टीका लिया है उनमें कितने लोग संक्रमित हुए हैं. इनमें कितने लोगों को अस्पताल में भर्ती करानी पड़ी और टीकाकरण के कारण कितनों की मौत हुई?  याचिकाकर्ता ने कहा कि जो भी प्रतिकूल प्रभाव का डाटा है उसे टोल फ्री नंबर पर लोगों को बताया जाए.साथ ही ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि अगर कोई टीकाकरण करवा रहा है और प्रतिकूल प्रभाव हुआ है तो वह इस बारे में शिकायत कर सके. सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अर्जी में वैक्सीन के इस्तेमाल को जिस तरह से मंजूरी दी गई है उस पर सवाल किया गया और कहा गया कि वैक्सीन लेने वालों की निगरानी होनी चाहिए.इस तरह की निगरानी से दुनियां के कई देशों में वैक्सीन लेने वालों पर हुए विपरीत प्रभाव जैसे खून का जमना आदि को कंट्रोल करने में हेल्प हुई है. डेनमार्क में एस्ट्रा जेनेका वैक्सीन के इस्तेमाल पर रोक है.कई देशों में वैक्सीन देना बंद किया गया है और वह उसका आंकलन कर रहे हैं. 

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