सिंधिया परिवार ने दी थी स्कॉलरशिप, तब कानपुर पढ़ने आए थे अटल बिहारी वाजपेयी, पिता भी बन गए थे क्लासमेट

Atal Jayanti: उन्होंने लिखा कि जब सभी दरवाजे बंद लग रहे थे, तब ग्वालियर महाराजा श्रीमंत जीवाजी राव सिंधिया, (जो वाजपेयी को एक छात्र के रूप में अच्छी तरह से जानते थे) ने 75 रुपये की मासिक छात्रवृत्ति की पेशकश की थी, जो आज के (2002-03) 200 रुपये के बराबर है. 

सिंधिया परिवार ने दी थी स्कॉलरशिप, तब कानपुर पढ़ने आए थे अटल बिहारी वाजपेयी, पिता भी बन गए थे क्लासमेट

Atal Jayanti: देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की आज जयंती है. (फाइल फोटो)

नई दिल्ली:

वह साल 1945 था, जब 21 साल के अटल बिहारी वाजपेयी (Atal Bihari Vajpayee) ने लॉ की पढ़ाई करने के लिए डीएवी कॉलेज कानपुर में दाखिला लिया था. उनके पिता पंडित कृष्ण बिहारीलाल वाजपेयी (Pandit Krishna Biharilal Vajpayee) तब तक रिटायर हो चुके थे और उनके पास इतने पैसे नहीं थे कि दोनों बेटियों की शादी के लिए दहेज देने के साथ-साथ अटल बिहारी वाजपेयी को पढ़ने के लिए भी पैसे दे सकें.

तब ग्वालियर के महाराजा श्रीमंत जीवाजी राव सिंधिया ने उनकी मदद की थी. देश का प्रधानमंत्री बनने के बाद डीएवी कॉलेज कानपुर की पत्रिका के लिए लिखे अपने एक आलेख में अटल बिहारी वाजपेयी ने इस रहस्य पर से पर्दा उठाया था कि कैसे ग्वालियर महाराज की मदद से वह लॉ की पढ़ाई करने आए थे और उनके पिता भी उन्हीं के क्लासमेट कैसे बन गए थे?

तब वाजपेयी ने मैग्जीन में लिखा था, "1945-46 की बात है. मैंने विक्टोरिया कॉलेज, ग्वालियर से बीए कर लिया था और भविष्य को लेकर चिंतित था....मेरे पिता सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त हो गए थे. मेरी दो बहनें विवाह योग्य उम्र की थीं. दहेज ने अभिशाप का रूप धारण कर लिया था. ऐसे में मैं स्नातकोत्तर के लिए संसाधनों का इंतजाम कहाँ से करता?"

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उन्होंने लिखा है कि जब सभी दरवाजे बंद लग रहे थे, तब ग्वालियर महाराजा श्रीमंत जीवाजी राव सिंधिया, (जो वाजपेयी को एक छात्र के रूप में अच्छी तरह से जानते थे) ने 75 रुपये की मासिक छात्रवृत्ति की पेशकश की थी, जो आज के (2002-03) 200 रुपये के बराबर है. 

वाजपेयी ने लिखा था, "छात्रवृति की खबर जान कर पिताजी के चेहरे पर तनाव की झुर्रियां धीरे-धीरे गायब होने लगीं थी. परिवार ने राहत की सांस ली थी और मैंने भी भविष्य के सुखद सपने देखने शुरू कर दिए थे."

वाजपेयी ने तब लिखा था कि ग्वालियर रियासत से छात्रवृत्ति प्राप्त करने के बाद, अधिकांश छात्र कानपुर के डीएवी कॉलेज में ही जाते थे. लिहाजा, उन्हें भी कानपुर जाने के लिए कहा गया था. वाजपेयी ने लिखा था, "मेरे बड़े भाई प्रेम बिहारी वाजपेयी वहां से पहले से ही कानून की पढ़ाई कर रहे थे. लेकिन तब एक असामान्य घटना घटी."

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वाजपेयी आगे लिखते हैं, 'अचानक, मेरे पिताजी ने भी फैसला किया कि वह भी उच्च शिक्षा हासिल करेंगे. उनके इस फैसले ने हम सभी को हैरान कर दिया था. वह 30 साल तक शिक्षा क्षेत्र में अपना योगदान देने के बाद सेवानिवृत्त हो चुके थे. जब उन्होंने देखा कि मैं कानपुर कानून की पढ़ाई करने जा रहा हूं, तो उन्होंने फैसला किया कि वह भी मेरे साथ कानपुर जाएंगे और कानून की पढ़ाई करेंगे.''

वाजपेयी जी ने लिखा है कि उस वक्त उनके पिता की उम्र 50 साल से ज्यादा थी और जब उनके साथ वो कॉलेज में पहुंचे तो प्रिसिपल ने समझा कि बेटे का नामांकन कराने आए हैं या प्रोफेसर की नौकरी मांगने लेकिन जब पढ़ाई की बात सुनी तो कॉलेज प्रिंसिपल कालका प्रसाद भटनागर अपनी कुर्सी से उठ खड़े हुए थे.

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नामांकन लेने के बाद दोनों पिता-पुत्र एक ही हॉस्टल में रहते थे. दोनों एक ही क्लास में पढ़ते थे लेकिन जब पिता लेट होते तो टीचर अटलजी से पूछते तुम्हारे पिता कहां रह गए और जब कभी अटलजी लेट होते तो उनके पिताजी से पूछा जाता कि आपका बेटा कहां रह गया. इस ताने से तंग आकर अटल बिहारी वाजपेयी ने अपना सेक्शन बदलवा लिया था. दोनों ने तब कॉलेज में साथ-साथ दो साल बिताए थे.