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4 साल में 57 सुनवाई, फिर भी नहीं मिला इंसाफ... अब सुप्रीम कोर्ट ने खुद संभाली कमान

ब्रेस्ट कैंसर का इलाज करा रहे लाखों मरीजों के लिए राहत की उम्मीद जगी है. सुप्रीम कोर्ट ने महंगी कैंसर दवाओं के मामले में केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर पूछा है कि क्या जीवनरक्षक दवाओं तक पहुंच संविधान के तहत मिलने वाले 'जीने के अधिकार' का हिस्सा मानी जानी चाहिए.

4 साल में 57 सुनवाई, फिर भी नहीं मिला इंसाफ... अब सुप्रीम कोर्ट ने खुद संभाली कमान
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नई दिल्ली: देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने महिलाओं में होने वाले ब्रेस्ट कैंसर (Brest Cancer) की महंगी दवाओं को लेकर एक बेहद अहम और बड़ा कदम उठाया है. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है. अदालत अब इस बात का कानूनी तौर पर इम्तिहान करेगी कि क्या जिंदगी बचाने वाली दवाएं (लाइफ सेविंग ड्रग्स) संविधान के तहत मिलने वाले 'जीने के अधिकार' (राइट टू लाइफ) का हिस्सा हो सकती हैं या नहीं.

चीफ जस्टिस (CJI) सूर्य कांत ने एक चिट्ठी का स्वत: संज्ञान लेते हुए इस मामले की सुनवाई शुरू की है. यह चिट्ठी कैंसर की दवाओं की कीमत कम करने की मांग को लेकर लिखी गई थी.

इंसाफ के इंतजार में दम तोड़ गई जंग शुरू करने वाली महिला

इस पूरे मामले के पीछे एक आंखें खोल देने वाली कहानी है. केरल हाईकोर्ट की फाइलों के ढेर में काफी वक्त से एक ऐसी अर्जी दबी पड़ी थी, जो उसे दाखिल करने वाली महिला से भी ज्यादा लंबी जी गई.

जून 2022 में कैंसर से पीड़ित एक महिला ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था. उसकी मांग बहुत छोटी और जायज थी कि ब्रेस्ट कैंसर की एक दवा, जो उसकी जान बचा सकती है, सरकार उसकी कीमत कम कर दे ताकि गरीब मरीज भी उसे खरीद सकें. लेकिन अदालत का फैसला आने से पहले ही उस बेबस महिला ने दम तोड़ दिया.

4 साल में 57 बार सुनवाई, पर नतीजा सिफर

महिला की मौत के बाद भी केरल हाईकोर्ट ने इस मामले को बंद नहीं होने दिया. अदालत का मानना था कि यह सिर्फ एक महिला की कहानी नहीं है, बल्कि देश की उन हजारों-लाखों महिलाओं का मसला है जिन्हें इस दवा की सख्त जरूरत है. हालांकि, आलम यह रहा कि पिछले चार सालों में यह केस 57 बार सुनवाई के लिए लिस्ट हुआ, लेकिन कोई आखिरी फैसला नहीं हो सका.

राष्ट्रपति और चीफ जस्टिस को लिखी गई खत

हाईकोर्ट में मामले के लटकने के बाद अब ज्योत्सना सिंह और के. एम. गोपाकुमार नाम के दो एक्टिविस्ट्स ने हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को एक भावुक चिट्ठी लिखी है. इस चिट्ठी में गुजारिश की गई है कि इस बेहद जरूरी मामले की सुनवाई को जल्द से जल्द पूरा किया जाए.

यही चिट्ठी देश के राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को भी भेजी गई थी. इस खत में लिखा है:

"जिसने यह लड़ाई शुरू की थी, वह आज हमारे बीच नहीं है. यह हकीकत साफ बताती है कि कानूनी देरी की कीमत कितनी भारी हो सकती है, खास तौर पर तब, जब मामला किसी की जिंदगी बचाने वाली दवा से जुड़ा हो."

इसी खत पर कड़ा रुख अख्तियार करते हुए अब सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्य कांत ने खुद कमान संभाली है. अदालत के इस कदम से उम्मीद जगी है कि आने वाले दिनों में कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी की दवाएं आम लोगों की जेब के मुताबिक सस्ती हो सकेंगी.

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