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RML अस्पताल में पहली बार हुई ब्रेन पेसमेकर सर्जरी, पार्किंसन से जूझ रही महिला को मिली नई उम्मीद

दिल्ली के RML अस्पताल में पहली बार डीप ब्रेन स्टिमुलेशन यानी ब्रेन पेसमेकर सर्जरी सफल रही. पार्किंसन से पीड़ित 55 वर्षीय महिला का कम लागत में हुआ इलाज.

RML अस्पताल में पहली बार हुई ब्रेन पेसमेकर सर्जरी, पार्किंसन से जूझ रही महिला को मिली नई उम्मीद
RML Hospital DBS Surgery : RML अस्पताल में पहली बार हुई ब्रेन पेसमेकर सर्जरी

अबतक आपने हार्ट में पेसमेकर सर्जरी के बारे में सुना होगा, लेकिन क्या आपने कभी ब्रेन पेसमेकर सर्जरी के बारे में सुना है. अगर नहीं, तो बता दें कि हाल ही में दिल्ली के RML हॉस्पिटल में पहली बार ब्रेन पेसमेकर सर्जरी हुई. हॉस्पिटल के न्यूरोसर्जरी डिपार्टमेंट ने पहली बार डीप ब्रेन स्टिमुलेशन (DBS) यानी ब्रेन पेसमेकर सर्जरी सफलतापूर्वक की है. इस उन्नत सर्जरी के जरिए पार्किंसन रोग से पीड़ित 55 वर्षीय महिला का इलाज किया गया है, जो पिछले छह महीनों से बीमारी के कारण छुट्टी पर थीं और उन्हें चलने-फिरने तथा हाथ-पैरों के कांपने जैसी गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था.

महिला नेपाल सरकार में अंडर सेक्रेटरी के पद पर कार्यरत हैं. वह पहले एक निजी अस्पताल में इलाज करा रही थीं, लेकिन DBS सर्जरी की भारी लागत उनके लिए बड़ी चुनौती बन गई थी. डॉक्टरों के अनुसार, निजी अस्पतालों में इस प्रक्रिया पर लगभग 25 से 30 लाख रुपये तक खर्च आ सकता है, जबकि RML अस्पताल में यह इलाज बेहद कम खर्च में उपलब्ध कराया गया.

क्या है डीप ब्रेन स्टिमुलेशन (DBS)?

डीप ब्रेन स्टिमुलेशन एक उन्नत न्यूरोसर्जिकल प्रक्रिया है, जिसमें मस्तिष्क के विशेष हिस्सों में इलेक्ट्रोड लगाए जाते हैं. ये इलेक्ट्रोड हल्के विद्युत संकेत भेजकर असामान्य गतिविधियों को नियंत्रित करते हैं. इन्हें एक बैटरी संचालित डिवाइस से जोड़ा जाता है, जिसे मरीज के सीने में प्रत्यारोपित किया जाता है. इसी कारण इसे आम बोलचाल में "ब्रेन पेसमेकर" भी कहा जाता है.

8 से 9 घंटे चली सर्जरी

न्यूरोसर्जरी विभाग के प्रोफेसर डॉ. शरद पांडेय के अनुसार, यह जटिल सर्जरी लगभग 8 से 9 घंटे तक चली. प्रक्रिया सुबह 9 बजे शुरू हुई और शाम करीब 5:30 बजे समाप्त हुई. फिलहाल मरीज को निगरानी में रखा गया है और अगले कुछ दिनों में प्रत्यारोपित डिवाइस की प्रोग्रामिंग कर उसके सेटिंग्स को मरीज के लक्षणों के अनुसार समायोजित किया जाएगा.

डॉ. पांडेय ने बताया कि यह तकनीक उन मरीजों के लिए उपयोगी साबित होती है, जिनमें पार्किंसन के लक्षण दवाइयों से पूरी तरह नियंत्रित नहीं हो पाते.

एक मिलीमीटर की गलती भी पड़ सकती है भारी

DBS सर्जरी में अत्यधिक सटीकता की जरूरत होती है. इसके लिए MRI और CT स्कैन की मदद से मस्तिष्क के लक्ष्य क्षेत्र की पहचान की जाती है. डॉक्टरों की टीम इलेक्ट्रोड लगाने से पहले सभी कोण और निर्देशांक तय करती है.

डॉ. पांडेय के मुताबिक, कई मामलों में सिर्फ एक मिलीमीटर का अंतर भी परिणाम को प्रभावित कर सकता है. इसलिए पूरी प्रक्रिया बेहद सावधानी और तकनीकी विशेषज्ञता के साथ की जाती है.

कब दिखेगा असर?

विशेषज्ञों का कहना है कि सर्जरी के शुरुआती परिणाम एक महीने के भीतर दिखने लगेंगे, जबकि अधिक स्पष्ट और बेहतर सुधार तीन से छह महीने में देखने को मिल सकता है. यदि मरीज की स्थिति में सुधार होता है, तो दवाओं की मात्रा भी धीरे-धीरे कम की जा सकती है.

सरकारी अस्पतालों में कम उपलब्ध है ये सुविधा

DBS जैसी अत्याधुनिक सर्जरी के लिए विशेष उपकरण, प्रशिक्षित विशेषज्ञों की टीम और अत्यधिक संसाधनों की आवश्यकता होती है. यही वजह है कि यह सुविधा देश के अधिकांश सरकारी अस्पतालों में उपलब्ध नहीं है. RML अस्पताल की यह सफलता उन मरीजों के लिए राहत की खबर है, जो महंगे निजी इलाज का खर्च नहीं उठा सकते.

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