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पैनक्रियाटिक कैंसर के खिलाफ बड़ी कामयाबी, नई दवा से दोगुनी होगी मरीजों की उम्र

पैंक्रियाटिक कैंसर को सबसे खतरनाक कैंसर में से एक माना जाता है क्योंकि इसके लक्षण देर से दिखते हैं.

पैनक्रियाटिक कैंसर के खिलाफ बड़ी कामयाबी, नई दवा से दोगुनी होगी मरीजों की उम्र
पैंक्रियाटिक कैंसर के सबसे खतरनाक प्रकार में से एक है.

कैंसर एक ऐसी बीमारी है जिसका नाम सुनते ही डर बैठ जाता है. पैंक्रियाटिक कैंसर को दुनिया के सबसे घातक कैंसरों में गिना जाता है. इसकी सबसे बड़ी चुनौती यह है कि ज्यादातर मामलों में बीमारी का पता तब चलता है, जब कैंसर शरीर के दूसरे अंगों तक फैल चुका होता है. यही वजह है कि इस बीमारी में मरीजों के बचने की संभावना काफी कम रहती है और वर्षों से डॉक्टर बेहतर इलाज की तलाश में जुटे हैं. लेकिन अब एक नई दवा ने क्लिनिकल ट्रायल में ऐसे नतीजे दिए हैं, जिन्हें इस कैंसर के इलाज में लंबे समय बाद मिली बड़ी कामयाबी माना जा रहा है. डैराक्सोनरासिब नाम की एक एक्सपेरिमेंटल दवा को पैंक्रियाटिक कैंसर के इलाज में एक अहम कामयाबी के रूप में देखा जा रहा है.

कीमोथैरेपी से ज्यादा असरदार-

शिकागो में आयोजित अमेरिकन सोसायटी ऑफ क्लिनिकल ऑन्कोलॉजी (ASCO) की वार्षिक बैठक में पेश किए गए RASolute 302 फेज-3 ट्रायल के नतीजे काफी उत्साहजनक रहे. 500 मरीजों पर हुए इस अध्ययन में डैराक्सोनरासिब लेने वाले मरीज औसतन 13.2 महीने तक जीवित रहे, जबकि कीमोथेरेपी पाने वाले मरीजों की औसत सर्वाइवल 6.7 महीने रही. यानी नई दवा ने जीवन अवधि को लगभग दोगुना कर दिया. शोध के नतीजे प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित किए गए हैं.

इस नई टैबलेट का नाम डैराक्सोनरासिब (daraxonrasib) है. दरअसल, 90% से ज्यादा पैनक्रियाटिक कैंसर के मामलों में एक म्यूटेटेड प्रोटीन ट्यूमर को बढ़ाने का काम करता है. विशेषज्ञों के मुताबिक यह दवा KRAS नाम के उस म्यूटेटेड प्रोटीन को निशाना बनाती है, जो पैंक्रियाटिक कैंसर के 90 प्रतिशत से अधिक मामलों में ट्यूमर बढ़ने के लिए जिम्मेदार माना जाता है. दशकों तक वैज्ञानिक इस प्रोटीन को प्रभावी ढंग से टारगेट करने की कोशिश करते रहे, लेकिन सफलता नहीं मिली. डैराक्सोनरासिब को इस मामले में एक अहम उपलब्धि माना जा रहा है.

कैंसर ट्रीटमेंट का ‘टर्निंग पॉइंट'

रिसर्च से यह भी सामने आया कि दवा लेने वाले मरीजों को सिर्फ अधिक समय तक जीवित रहने का फायदा ही नहीं मिला, बल्कि उन्हें अपेक्षाकृत कम दर्द और बेहतर क्वालिटी ऑफ लाइफ भी मिली. कई मरीज अध्ययन के विश्लेषण तक भी इस दवा का उपयोग कर रहे थे, जिससे शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि आगे चलकर सर्वाइवल का अंतर और बढ़ सकता है.

कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के डॉक्टर जेव वेनबर्ग, जिन्होंने इस स्टडी को लीड किया, का कहना है कि यह दवा कैंसर को पूरी तरह खत्म नहीं करती, लेकिन यह इलाज की दिशा में बहुत बड़ा कदम है. वहीं कुछ अन्य कैंसर विशेषज्ञों ने इसे पैंक्रियाटिक कैंसर के इलाज में संभावित ‘टर्निंग पॉइंट' बताया है.

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कैेसर के इलाज में वरदान साबित होगी ये नई दवा. Photo Credit: (Photo: Unsplash)

क्या है इसके साइड इफेक्ट्स-

हालांकि दवा के कुछ साइड इफेक्ट्स भी सामने आए हैं. इनमें त्वचा पर गंभीर रैशेज और मुंह में छाले जैसी समस्याएं शामिल हैं. इसके बावजूद शोधकर्ताओं का मानना है कि इसके फायदे इतने अहम है कि इसे लेकर अध्ययन जारी रहेगा. दवा बनाने वाली कंपनी रिवोल्यूशन मेडिसिन्स ने इस स्टडी को फंड किया है और अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) इसके रिव्यू प्रोसेस को तेज करने की तैयारी में है. इस बीच एजेंसी ने कुछ निर्धारित शर्तों को पूरा करने वाले मरीजों के लिए एक्सपैंडेड एक्सेस प्रोग्राम के तहत इस दवा के उपयोग की परमिशन भी दे दी है.

अमेरिकन कैंसर सोसायटी के अनुसार अमेरिका में इस वर्ष पैंक्रियाटिक कैंसर के करीब 67 हजार नए मामले सामने आने का अनुमान है, जबकि 52 हजार से अधिक लोगों की मौत इस बीमारी से हो सकती है. इस कैंसर की पांच वर्षीय सर्वाइवल रेट सिर्फ 13 प्रतिशत है. ऐसे में डैराक्सोनरासिब से मिले नतीजों को लाखों मरीजों और उनके परिवारों के लिए उम्मीद की नई किरण माना जा रहा है.

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