महाराष्ट्र के अमरावती जिले के मेलघाट में एक अजीबोगरीब वाकया सामने आया. यहां डोमा आदिवासी आश्रमशाला में करीब 16 छात्राओं के अचानक अजीब तरह से हंसने, रोने और अजीब हरकतें करने के बाद पूरे इलाके में सनसनी फैल गई. बच्चों में ऐसी दहशत बैठी कि बात 'भूत-प्रेत' और ऊपरी हवा तक पहुंच गई. डर का माहौल इतना ज्यादा बढ़ गया कि देखते ही देखते 600 से ज्यादा बच्चे हॉस्टल छोड़-छाड़ कर अपने घर भाग गए.
जब स्वास्थ्य विभाग की टीम मौके पर पहुंची और जांच पड़ताल की, तो साफ हुआ कि यह कोई भूतिया साया नहीं बल्कि गहरा मानसिक तनाव और एक-दूसरे को देखकर पैदा हुआ मनोवैज्ञानिक डर है. इसी बारे में और जानकारी पाने के लिए एनडीटीवी ने बात की सर गंगा राम हॉस्पिटल के कंसल्टिंग साइकोलॉजिस्ट डॉ. नीलम मिश्र से और पूरे मामले को समझने की कोशिश की.
मगर सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि कुछ छात्राओं के अजीब व्यवहार से पूरा का पूरा स्कूल कैसे डर गया? क्या सच में केवल डर और तनाव की वजह से शरीर में ऐसे लक्षण दिखाई देने लगते हैं? सर गंगा राम अस्पताल की कंसल्टिंग साइकोलॉजिस्ट नीलम मिश्रा ने इस पूरे मामले को बहुत आसान तरीके से समझाया है.
क्या होती है Mass Psychogenic Illness?
साइकोलॉजिस्ट नीलम मिश्रा के मुताबिक, मेडिकल साइंस में इस स्थिति को Mass Psychogenic Illness (MPI) कहा जाता है. पुराने समय में लोग इसे आम बोलचाल में 'मास हिस्टीरिया' भी कह देते थे. यह तब होता है जब किसी बंद माहौल जैसे हॉस्टल, स्कूल या किसी संस्था में एक या दो लोगों को अचानक कोई घबराहट या अजीब लक्षण दिखते हैं, और उन्हें देखकर बाकी लोगों में भी वही डर, कंपकंपी और शारीरिक तकलीफें तेजी से फैलने लगती हैं.
विश्व स्वास्थ संगठन (WHO) का भी मानना है कि ऐसी घटनाओं में बच्चों को सिर में तेज दर्द, चक्कर आना, बदन में कमजोरी या अचानक बेहोशी जैसे लक्षण महसूस हो सकते हैं. इस तरह के मामले अकसर किसी बंद ग्रुप में तेजी से फैलते हैं और अफवाहें या बातें इसे और भड़का देती हैं.
डॉक्टरों का कहना है कि जब किसी ग्रुप में कोई अनहोनी जैसी बात होती है और उसके साथ किसी भूत या साये की कहानी जोड़ दी जाती है, तो बच्चों का पूरा दिमाग उसी डर पर टिक जाता है. इससे अंदर की एंग्जायटी बहुत तेजी से बढ़ती है और शरीर में वाकई में लक्षण दिखने लगते हैं.
इसका मतलब यह कतई नहीं है कि बच्चा कोई नाटक या ढोंग कर रहा है. उसके शरीर में जो तकलीफ हो रही है वह बिल्कुल असली होती है, बस उसकी असली जड़ शरीर की कोई बीमारी न होकर दिमाग का गहरा डर होता है.
अफवाहों से कैसे शुरू होती है डर की चेन रिएक्शन?
हॉस्टल या बोर्डिंग स्कूल में बच्चे महीनों तक चौबीसों घंटे साथ रहते हैं. जब ऐसे माहौल में कोई एक साथी अचानक जोर-जोर से रोने या अजीब बर्ताव करने लगे, तो दूसरे बच्चे अंदर से सिहर जाते हैं. अगर उसी वक्त किसी ने वहां महुआ के पेड़ या पुरानी भूतिया कहानी की बात छेड़ दी, तो डर की आग में घी का काम हो जाता है.
इसके बाद बच्चों का दिमाग खतरे के सिग्नल देने लगता है. दिल की धड़कनें बहुत तेज हो जाती हैं, सांस फूलने लगती है, हाथ-पैर कांपने लगते हैं और चक्कर आने लगता है. डर एक संक्रामक बीमारी की तरह एक से दूसरे में फैलता है. जब बच्चे अपने साथियों को चीखते या घबराते देखते हैं, तो उनका दिमाग भी 'हाइपर-अलर्ट' मोड में चला जाता है और उन्हें लगता है कि वे भी खतरे में हैं.
अचानक हंसना और रोना क्यों शुरू हो जाता है?
बिना वजह जोर से हंसना या रोना दिमाग के इमोशनल ओवरलोड का नतीजा हो सकता है. जब कोई इंसान बहुत ज्यादा तनाव या डर में होता है, तो उसकी भावनाओं पर से उसका कंट्रोल छूट जाता है.
इसलिए जानकारों का कहना है कि ऐसे मामलों को केवल 'भूत लग गया' या 'हिस्टीरिया है' कहकर टालना बहुत बड़ी भूल होगी. सबसे पहले बच्चों की पूरी मेडिकल और मनोवैज्ञानिक जांच होनी चाहिए ताकि यह पक्का हो सके कि उन्हें कोई शारीरिक या न्यूरोलॉजिकल दिक्कत तो नहीं है.
साइकोलॉजिस्ट नीलम मिश्रा बताती हैं कि ऐसे मौकों पर बच्चे को डांटना, उसका मजाक उड़ाना या उसकी बात को बकवास बताना सबसे गलत तरीका है. अगर बच्चा कह रहा है कि उसे डर लग रहा है या कोई वहम हो रहा है, तो उसकी बात को शांति से सुनना चाहिए. उसे डांटने के बजाय यह भरोसा दिलाना जरूरी है कि वह पूरी तरह सुरक्छित है.
क्या पुरानी कहानियां और अफवाहें असर बढ़ाती हैं?
बिल्कुल, अगर किसी जगह को लेकर पहले से ही कोई अंधविश्वास या डरावनी बात मशहूर हो, जैसे डोमा आश्रमशाला में महुआ के पेड़ को लेकर कही जा रही थी, तो वह बच्चों के कच्चे मन पर बहुत गहरा असर डालती है. जब ऐसी कहानियां बार-बार दोहराई जाती हैं, तो डर बहुत मजबूत हो जाता है.
WHO भी यह सलाह देता है कि ऐसी घटनाओं में अफवाहों पर तुरंत लगाम लगाई जाए और प्रभावित लोगों से बहुत प्यार और संवेदनशीलता के साथ बातचीत की जाए.
ऐसी स्थिति बनने पर क्या कदम उठाने चाहिए?
सबसे पहले तो भूत-प्रेत से जुड़ी मनगढ़ंत कहानियों और अफवाहों को फैलने से रोकना चाहिए. बच्चों को डराने या झाड़-फूंक के चक्कर में पड़ने के बजाय उन्हें आसान और वैज्ञानिक भाषा में समझाना चाहिए. स्वास्थ्य विभाग की मदद से तुरंत मेडिकल चेकअप और अच्छे साइकोलॉजिस्ट से बच्चों की काउंसलिंग करानी चाहिए.
इसके अलावा जिन बच्चों में ज्यादा लक्षण दिख रहे हैं, उनकी अलग से जांच जरूरी है ताकि किसी इंफेक्शन या दूसरी मेडिकल वजह को नजरअंदाज न किया जाए.
विशेषज्ञों का साफ कहना है कि बच्चों को यह अहसास कराना सबसे जरूरी है कि वे सेफ हैं. हर अजीब अहसास को भूत से जोड़ना सही नहीं है. डोमा की इस घटना ने यह साबित कर दिया है कि स्कूलों और हॉस्टलों में बच्चों के मानसिक स्वास्थ पर ध्यान देना और समय पर सही काउंसलिंग मिलना कितना जरूरी है. अंधविश्वास के बजाय वैज्ञानिक सोच और समझदारी से ही ऐसे सामूहिक डर पर काबू पाया जा सकता है.
(यह लेख डॉ. नीलम मिश्रा, कंसल्टिंग साइकोलॉजिस्ट, सर गंगा राम हॉस्पिटल से बातचीत पर आधारित है.)
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