भारत के हेल्थकेयर सिस्टम का एक कड़वा सच यह है कि जब किसी मरीज को इमरजेंसी में डॉक्टर की जरूरत होती है, तो अक्सर उसे लंबी कतारों और खाली कुर्सियों का सामना करना पड़ता है. यह किसी एक अस्पताल की कहानी नहीं है, बल्कि देश के कोने-कोने में पसरी एक गंभीर समस्या है. 'द लांसेट पब्लिक हेल्थ' की ताजा रिपोर्ट ने भारत के इसी हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर की पोल खोलकर रख दी है. आंकड़ों के मुताबिक भारत में प्रति 10,000 की आबादी पर सिर्फ 10.5 डॉक्टर और 10.8 नर्सें ही मौजूद हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो 10 हजार लोगों का इलाज और उनकी जान बचाने की जिम्मेदारी सिर्फ 10 डॉक्टरों के भरोसे है. यह आंकड़ा बताता है कि हमारा मेडिकल ढांचा कितने ज्यादा दबाव में है. इस रिपोर्ट के जरिए समझते हैं कि भारत और दुनिया में स्वास्थ्य सेवाओं का असली DNA क्या है?
3.4 करोड़ से ज्यादा स्वास्थ्यकर्मियों की भारी कमी
दरअसल यूनिवर्सिटी ऑफ वॉशिंगटन के 'इन्स्टिट्यूट फॉर हेल्थ मेट्रिक्स एंड इवैल्यूएशन' के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए इस अध्ययन में एक चिंताजनक तस्वीर सामने आई है. रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में मध्यम स्तर की 'यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज' हासिल करने के लिए कम से कम 3.44 करोड़ अतिरिक्त स्वास्थ्यकर्मियों की जरूरत है. इसमें डॉक्टर, नर्सें, दाइयों,डेंटिस्ट और फार्मासिस्ट शामिल हैं. दुनिया में सबसे ज्यादा डॉक्टरों और नर्सों की कमी दक्षिण एशिया और उप-सहारा अफ्रीका के देशों में ही सामने आई है.

भारत का हेल्थ ढांचा: आंकड़े क्या कहते हैं?
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में हर 10,000 लोगों पर कुल 73 स्वास्थ्यकर्मी हैं. यह आंकड़ा पहली नजर में ठीक लग सकता है, लेकिन जब आप इसकी परतें खोलते हैं, तो हमारे हेल्थ सिस्टम की असली और चिंताजनक तस्वीर सामने आती है:
10,000 आबादी पर सिर्फ 10.5 डॉक्टर: WHO के नियम के मुताबिक 10 हजार लोगों पर 10 डॉक्टर होने चाहिए. कागजों पर भारत इस आंकड़े के करीब दिखता है, लेकिन हकीकत यह है कि ज्यादातर डॉक्टर शहरों में हैं और गांवों के सरकारी अस्पताल खाली पड़े हैं.
10,000 आबादी पर सिर्फ 10.8 नर्सें : अंतरराष्ट्रीय मानक के अनुसार हर 1 डॉक्टर पर 3 नर्सें होनी चाहिए. लेकिन भारत में जितने डॉक्टर हैं, लगभग उतनी ही नर्सें भी हैं. यानी अस्पतालों और ICU में भर्ती मरीजों की देखरेख के लिए नर्सों पर क्षमता से तीन गुना ज्यादा बोझ है.
10,000 आबादी पर 8.1 पैरामेडिकल स्टाफ: मरीजों को सही समय पर दवा देने और टेस्ट जैसे जरूरी कामों के लिए यह पैरामेडिकल स्टाफ होता है. 8.1 का यह छोटा आंकड़ा बताता है कि हमारी दवा वितरण व्यवस्था भी बुरी तरह हांफ रही है.
10,000 आबादी पर सिर्फ 1.2 दाई: मां और नवजात बच्चे की जान बचाने में दाइयों की भूमिका सबसे अहम होती है. भारत में 10 हजार लोगों पर सिर्फ एक दाई का होना यह साफ दिखाता है कि गांवों में आज भी डिलीवरी के समय मां और बच्चे की जान जोखिम में रहती है.
ये आंकड़े साबित करते हैं कि भारत का हेल्थकेयर ढांचा सिर्फ डॉक्टरों की कमी से ही नहीं जूझ रहा, बल्कि सुविधाओं की भारी गैर-बराबरी का भी शिकार है. शहरों में बड़े-बड़े प्राइवेट अस्पताल जरूर खुल गए हैं, लेकिन देश का आम और गरीब आदमी आज भी बुनियादी इलाज पाने के लिए तरस रहा है.
चीन से तुलना: भारत कहां खड़ा है?
जब हम अपने पड़ोसी देश चीन से भारत के इन आंकड़ों की तुलना करते हैं, तो अंतर और भी बड़ा और चिंताजनक नजर आता है. चीन में प्रति 10,000 की आबादी पर कुल मिलाकर लगभग 130 स्वास्थ्यकर्मी मौजूद हैं. इनमें प्रति 10,000 लोगों पर 30 से ज्यादा डॉक्टर और लगभग 45 नर्सें शामिल हैं. यानी डॉक्टर और नर्सों की उपलब्धता के मामले में चीन भारत से तीन से चार गुना आगे खड़ा है.आसान शब्दों में कहें तो जिस तरह चीन ने पिछले कुछ दशकों में अपने मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर और नर्सिंग स्टाफ को तैयार करने पर पानी की तरह पैसा बहाया है, भारत उस रफ्तार से काफी पीछे छूट गया है.
आम जनता के लिए इसका क्या मतलब है?
लांसेट की रिपोर्ट के मुताबिक अस्पतालों में डॉक्टरों और नर्सों की इस भारी कमी का सीधा खामियाजा आम आदमी को अपनी सेहत और जेब दोनों से भुगतना पड़ता है. जब अस्पतालों में मेडिकल स्टाफ कम होता है, तो सरकारी और बड़े अस्पतालों में एक छोटे से चेकअप या ऑपरेशन के लिए भी मरीजों को महीनों का लंबा इंतजार करना पड़ता है. कम डॉक्टरों पर मरीजों का असीमित बोझ होने के कारण वे चाहकर भी हर मरीज को पूरा समय और ध्यान नहीं दे पाते, जिससे डॉक्टरों का तनाव और वर्कलोड दोनों बढ़ता है. आखिरकार, सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में लगने वाली लंबी कतारों और देरी से हताश होकर आम आदमी महंगे प्राइवेट अस्पतालों का रुख करने को मजबूर हो जाता है, जिससे उस पर भारी आर्थिक बोझ पड़ता है और उसकी जिंदगी भर की कमाई इलाज में लग जाती है.
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भारत के लिए क्या है असली समाधान?
'द लांसेट पब्लिक हेल्थ' की यह रिपोर्ट सिर्फ कमियों के आंकड़े नहीं दिखाती, बल्कि भारत के स्वास्थ्य ढांचे के लिए एक बड़ी चेतावनी भी जारी करती है. रिपोर्ट के मुताबिक, अगर देश को हर नागरिक तक बेहतर इलाज पहुंचाना है, तो कागजी दावों से आगे बढ़कर तीन बड़े और कड़े कदम उठाने होंगे:
डॉक्टरों और नर्सों की भर्ती में तेजी: सिर्फ नए अस्पताल बनाने या इमारतें खड़ी करने से इलाज नहीं मिलेगा. सरकार को मेडिकल और नर्सिंग सीटों को तेजी से बढ़ाना होगा और पास-आउट होने वाले मेडिकल स्टाफ को तुरंत अस्पतालों में तैनात करना होगा.
गांवों में मेडिकल स्टाफ बढ़ाना: जब तक ग्रामीण इलाकों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHCs) में डॉक्टरों व पैरामेडिकल स्टाफ की तैनाती पक्की नहीं होगी, तब तक बड़े सरकारी अस्पतालों पर मरीजों का अमानवीय दबाव कम होना नामुमकिन है.
स्वास्थ्य बजट में बड़ी बढ़ोतरी: जब तक भारत अपने कुल जीडीपी (GDP) का एक बड़ा हिस्सा स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च नहीं करेगा, तब तक देश में पर्याप्त संख्या में डॉक्टर, नर्सें और दाइयां तैयार करना बहुत मुश्किल रहेगा.
लांसेट की यह स्टडी अंत में एक कड़वी हकीकत सामने रखती है—जब तक देश में डॉक्टरों और नर्सों की इस भारी किल्लत को दूर नहीं किया जाता, तब तक 'सबके लिए बेहतर इलाज' का दावा सिर्फ भाषणों तक ही सीमित रहेगा.
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