मोबाइल के इस्तेमाल को लेकर हमेशा बच्चों को चेताया जाता है. अक्सर एक्सपर्ट कहते हैं कि बच्चों का अधिक समय तक मोबाइल इस्तेमाल करना उनके मन और दिमाग दोनों पर असर डालता है. लेकिन इसे लेकर एक हालिया स्टडी और भी चौंकाने वाली है. एक ताजा रिसर्च के मुताबिक जो बच्चे सेकेंडरी स्कूल शुरू होने पर ही सोशल मीडिया अकाउंट बना लेते हैं, वे टेस्ट में उन बच्चों के मुकाबले खराब प्रदर्शन करते हैं जो कुछ सालों बाद अकाउंट बनाते हैं. रिसर्चर्स का मानना है कि लगातार अपडेट चेक करना कई स्टूडेंट्स के लिए ध्यान भटकाने वाली बड़ी वजह है.
स्टडी में पाया गया कि जिन स्टूडेंट्स ने 11 से 12 साल की उम्र में अपना पहला सोशल मीडिया अकाउंट बनाया, उन्होंने गणित और रीडिंग टेस्ट में उन स्टूडेंट्स के मुकाबले कम स्कोर किया जिन्होंने कुछ साल इंतजार किया. 16 साल की उम्र में दोनों ग्रुप्स के स्कोर में लगभग छह महीने की पढ़ाई के बराबर का अंतर देखा गया.
स्टडी में और क्या आया सामने?
इस स्टडी से यह साबित नहीं होता कि सोशल मीडिया ही इसके लिए जिम्मेदार है, लेकिन रिसर्चर्स ने कई दूसरी बातों पर भी ध्यान दिया जिनसे नतीजे पर असर पड़ सकता था, जैसे सोशल मीडिया इस्तेमाल करने से पहले स्टूडेंट्स का एकेडमिक परफॉर्मेंस, उनके परिवार का ढांचा और माता-पिता की शिक्षा.

क्या बच्चों के दिमाग को कमजोर बना रहा सोशल मीडिया.(NDTV Image)
कहां हुई ये स्टडी?
इटली की मिलानो-बिकोका यूनिवर्सिटी में इस स्टडी के मुख्य लेखक डॉ. मार्को गुई ने कहा, "मुझे लगता है कि अब हम जानते हैं कि एक समस्या है और यह एक जटिल समस्या है, जिसका संबंध इस बात से है कि ये प्लेटफॉर्म कैसे बनाए गए हैं. हमारी रिसर्च दिखाती है कि कम से कम किशोरावस्था से पहले की उम्र में, ये सोशल मीडिया समस्या पैदा करने वाले होते हैं."
गुई और उनके साथियों ने 5,000 से ज्यादा इटैलियन स्कूली बच्चों की सोशल मीडिया आदतों और गणित, इटैलियन और इंग्लिश के स्टैंडर्डाइज्ड एग्जाम में उनके नतीजों के सर्वे का एनालिसिस किया. जब 13 से 14 साल की उम्र में टेस्ट किया गया, तो जिन बच्चों ने 11 या 12 साल की उम्र में अपना पहला सोशल मीडिया अकाउंट बनाया था, उनका स्कोर उन बच्चों से खराब रहा जिन्होंने कम से कम 14 साल की उम्र तक इंतजार किया था.
स्डटी में चौंकाने वाले खुलासे-
'नेचर ह्यूमन बिहेवियर' में लिखते हुए, रिसर्चर्स का कहना है कि स्कोर में अंतर लगभग उतना ही है जितना कि जल्दी सोशल मीडिया इस्तेमाल करने वाले बच्चे छह महीने की पढ़ाई में पीछे रह जाते हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो, जिन बच्चों ने सोशल मीडिया इस्तेमाल करने में देरी की, उन्हें उतना ही फायदा हुआ जितना कि महंगी कोचिंग से मिलता है.
परफॉर्मेंस में अंतर का एक सबसे बड़ा कारण यह था कि बच्चे दिन-रात में अनेकों बार अपना फोन उठाते थे. इससे पता चलता है कि सोशल मीडिया को लगातार चेक करना कम से कम कुछ हद तक इसके लिए जिम्मेदार था. गुई ने कहा, "हमारा अनुमान है कि इसका एक कारण वह लगातार अलर्ट रहने की स्थिति है जो स्मार्टफोन पर सोशल मीडिया की वजह से बच्चों की जिंदगी पर असर डालती है. मैसेज चेक करने की लगातार जरूरत, यह देखने की इच्छा कि ऑनलाइन दुनिया में क्या हो रहा है, जबकि आप असल दुनिया में किसी चीज में व्यस्त हैं. इसका मतलब है कि परिवार या घर की असल जिंदगी में कम शामिल होना. यानी ऐसी चीज़ों में कम ध्यान देना जिनमें समय लगता है, जैसे कि उस उम्र के छात्र के लिए होमवर्क करना.
यूके में सोशल मीडिया पर नकेल-
यह स्टडी ऐसे समय में आई है जब UK 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर बैन लगाने की तैयारी कर रहा है. इससे पहले ऑस्ट्रेलिया ने पिछले साल ऐसा ही बैन लगाया था.
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