International Epilepsy Day 2026: अंतर्राष्ट्रीय मिर्गी दिवस के मौके पर भारत सरकार के आयुष मंत्रालय ने एक बेहद अहम संदेश दिया है—मिर्गी से जूझ रहे लोगों को दया नहीं, बल्कि सम्मान, समझ और सामाजिक समावेश की जरूरत है. मंत्रालय ने समाज से अपील की है कि मिर्गी से जुड़े पुराने अंधविश्वासों और कलंक को मिलकर खत्म किया जाए और इस बीमारी को लेकर सूचित, संवेदनशील और सहानुभूतिपूर्ण बातचीत को बढ़ावा दिया जाए.
मिर्गी (एपिलेप्सी) कोई दुर्लभ या रहस्यमयी बीमारी नहीं है, बल्कि यह एक सामान्य न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर है. इसमें व्यक्ति को बार-बार दौरे पड़ सकते हैं. दौरे के दौरान हाथ-पैर झटकना, मुंह से झाग आना, आंखों का ऊपर की ओर चढ़ जाना या कुछ देर के लिए बेहोशी जैसी स्थिति बन सकती है. यह दृश्य देखने में डरावना जरूर लगता है लेकिन सही जानकारी होने पर घबराने की ज़रूरत नहीं होती.
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इलाज संभव है, फिर भी डर क्यों?
सबसे अहम बात यह है कि मिर्गी के ज्यादातर मामलों को दवाओं और रेगुलर इलाज से आसानी से कंट्रोल किया जा सकता है. सही समय पर इलाज शुरू हो जाए, तो व्यक्ति सामान्य जीवन जी सकता है पढ़ाई, नौकरी, शादी और परिवार, सब कुछ संभव है.
लेकिन समस्या बीमारी से ज्यादा समाज की सोच है. भारत के कई हिस्सों में आज भी मिर्गी को बुरी आत्माओं का असर, पिछले जन्म के पाप या किसी अलौकिक शक्ति से जोड़कर देखा जाता है. इस वजह से लोग मेडिकल इलाज की जगह झाड़-फूंक, नर्व् फंक्शन और अन्य हानिकारक तरीकों का सहारा लेते हैं, जिससे स्थिति और बिगड़ जाती है.

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कलंक का सबसे गहरा असर: शिक्षा और रोजगार
मिर्गी से जुड़ा सामाजिक कलंक सिर्फ मानसिक तनाव तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका सीधा असर शिक्षा, रोजगार और सामाजिक जीवन पर पड़ता है. रोजगार के मामले में स्थिति खास तौर पर चिंताजनक है.
केरल में किए गए एक सर्वे के अनुसार, मिर्गी से पीड़ित 58% लोग बेरोजगार पाए गए, जबकि सामान्य आबादी में यह आंकड़ा सिर्फ 19% था. इसके पीछे कई कारण हैं:
- वर्कप्लेस पर दौरे पड़ने का डर
- अशिक्षा या पढ़ाई छूट जाना
- एंटी-एपिलेप्टिक दवाओं से थकान
- बार-बार मेडिकल कारणों से अनुपस्थिति
नियोक्ता अक्सर ऐसे लोगों को नौकरी देने से हिचकिचाते हैं. कई बार दौरे पड़ने पर व्यक्ति को कम वेतन वाली नौकरी दी जाती है या नौकरी से निकाल भी दिया जाता है.
सोच बदली नहीं, समस्या बढ़ती गई
हालांकि समय के साथ शिक्षा और सामाजिक स्तर में सुधार हुआ है, लेकिन मिर्गी को लेकर धारणाओं, भेदभाव और कलंक में खास बदलाव नहीं आया. यही वजह है कि मिर्गी से पीड़ित लोगों में अवसाद, चिंता और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं भी बढ़ जाती हैं.
इस दिशा में इंडियन एपिलेप्सी एसोसिएशन के प्रयास बेहद इंपोर्टेंट रहे हैं. इनके प्रयासों से भारतीय न्यायपालिका ने साफ किया है कि मिर्गी को मानसिक बीमारी नहीं माना जाना चाहिए और मिर्गी के आधार पर तलाक जैसी प्रथाओं को हतोत्साहित किया जाना चाहिए.
समाधान क्या है?
विशेषज्ञों का मानना है कि मिर्गी के सामाजिक और हेल्थ बोझ को कम करने के लिए व्यापक जन-जागरूकता अभियान, सही और सुलभ मेडिकल देखभाल, अंधविश्वास के खिलाफ शिक्षा, स्कूल, कॉलेज और वर्कप्लेस में समावेशी नीतियां मौजूदा हेल्थ फंक्शन्स में मिर्गी मरीजों की जरूरतों को शामिल करना बेहद जरूरी है.
मिर्गी कोई अभिशाप नहीं, बल्कि एक इलाज योग्य मेडिकल कंडीशन है. अंतर्राष्ट्रीय मिर्गी दिवस हमें याद दिलाता है कि बीमारी से ज्यादा खतरनाक है गलत सोच और सामाजिक बहिष्कार.
(इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं