क्या आपने कभी सोचा है कि अगर छोटी-मोटी चोट लगने या सर्दी-जुकाम होने पर दवाइयां असर करना बंद कर दें, तो क्या होगा? यह सवाल डरावना जरूर है, लेकिन सच यही है कि दुनिया आज एक बहुत बड़े और खतरनाक संकट से जूझ रही है. इसे मेडिकल की भाषा में एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) या आसान शब्दों में 'सुपरबग्स' का खतरा कहा जाता है. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन यानी डब्ल्यूएचओ ने साफ चेतावनी दी है कि यह संकट आने वाले समय में कोरोना महामारी से भी ज्यादा खतरनाक साबित हो सकता है.
हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने चेतावनी दी थी कि बैक्टीरिया, वायरस और फंगस लगातार इतने ताकतवर हो रहे हैं कि उन पर पुरानी और आम एंटीबायोटिक्स दवाइयां असर करना बिल्कुल बंद कर चुकी हैं. साल 2021 में ही दुनिया भर में करीब 47 लाख से ज्यादा मौतें ऐसी ही दवा-प्रतिरोधी बीमारियों की वजह से हुईं.
लेकिन इस समय में भारत की तरफ से एक बहुत ही राहत भरी और बड़ी खबर सामने आई है. लखनऊ स्थित सीएसआईआर-केंद्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान (CDRI) की निदेशक डॉ. राधा रंगराजन ने बताया है कि भारत की फार्मा इंडस्ट्री ने दो ऐसी बड़ी और नई एंटीबायोटिक खोज निकाली हैं, जिन्होंने पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों को हैरान कर दिया है.
क्यों खतरनाक होते जा रहे हैं सुपरबग्स?
हम सब जानते हैं कि एंटीबायोटिक्स हमारी मेडिकल साइंस की रीढ़ की हड्डी हैं. अगर ये दवाइयां काम करना बंद कर दें, तो सामान्य सर्जरी करवाना, कैंसर का इलाज या कीमोथेरेपी कराना, अंग प्रत्यारोपण करना और यहां तक कि छोटा-मोटा इंफेक्शन भी जानलेवा बन सकता है. लेकिन दिक्कत यह है कि बैक्टीरिया बहुत चालाक होते हैं. वे लगातार अपना रूप बदलते रहते हैं और खुद को उन दवाओं के मुताबिक ढाल लेते हैं जो उन्हें मारने के लिए बनाई जाती हैं.

पिछले कुछ दशकों में लोगों ने इन दवाओं का बहुत ज्यादा और गलत इस्तेमाल किया है. बिना डॉक्टर की सलाह के दवाएं खाना, सर्दी-जुकाम जैसी वायरल बीमारियों में एंटीबायोटिक लेना या कोर्स पूरा किए बिना बीच में ही दवा छोड़ देना इन सब हरकतों की वजह से बैक्टीरिया और ज्यादा ताकतवर हो गए हैं.
भारत की बहुत बड़ी जीत क्यों मानी जा रही-
इस मुश्किल दौर में भारत के वैज्ञानिकों और फार्मा कंपनियों ने कमाल कर दिखाया है. लखनऊ के सीएसआईआर-सेंट्रल ड्रग रिसर्च इंस्टीट्यूट की डायरेक्टर डॉ. राधा रंगराजन का कहना है कि यह सफलता बेहद खास है, क्योंकि इसमें सिर्फ पुरानी दवाओं की नकल नहीं की गई है, बल्कि एकदम नई खोज की गई है. आइए जानते हैं भारत की उन तीन बड़ी खोजों के बारे में जो दुनिया को बचाने जा रही हैं.
भारत ने बिना किसी बाहरी मदद के अपनी खुद की लैब्स में ऐसी नई दवाइयां तैयार कर ली हैं, जिन्हें अमेरिका के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (US FDA) और भारत के अपने ड्रग रेगुलेटर से भी मंजूरी मिल गई है.
1. जायनिच -(Zaynich)
मुंबई की जानी-मानी कंपनी वोकहार्ट- (Wockhardt) ने एक नया कॉम्बिनेशन खोजा है, जिसका नाम जायनिच है. यह सेफेपाइम और जिडेबैक्टम नाम की दो चीजों से मिलकर बना है. अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (US FDA) ने इसे पेशाब से जुड़े गंभीर इंफेक्शन (Urinary Tract Infections) और किडनी के इंफेक्शन के इलाज के लिए हरी झंडी दे दी है. सबसे बड़ी बात यह है कि इसकी रिसर्च और पूरी डेवलपमेंट का काम भारत के अंदर ही किया गया है.
2. एक्सबलिफेप- (Exblifep)
दूसरी बड़ी कामयाबी ऑर्किड फार्मा (Orchid Pharma) की तरफ से आई है. उन्होंने एंमेटाजोबैक्टम नाम का एक नया अणु खोजा है. कई खतरनाक बैक्टीरिया ऐसे होते हैं जो दवाइयों को उनके शरीर में जाते ही खत्म कर देते हैं. यह नई दवा उन बैक्टीरिया के हथियारों को ब्लॉक कर देती है, जिससे एंटीबायोटिक अपना काम आसानी से कर पाता है. इस दवा को भी अमेरिका और भारत दोनों जगहों के ड्रग रेगुलेटर्स से मंजूरी मिल चुकी है.
3. मिग्नाफ- (Miqnaf)
वोकहार्ट ने ही निमोनिया जैसी खतरनाक बीमारी से निपटने के लिए Nafithromycin (जिसे मिग्नाफ भी कहते हैं) नाम की एक नई दवा बनाई है. भारत सरकार के बायोटेक्नोलॉजी विभाग (BIRAC) की मदद से तैयार यह दवा कम्युनिटी-एक्वायर्ड बैक्टीरियल निमोनिया के खिलाफ लड़ने वाली देश की पहली स्वदेशी एंटीबायोटिक है. केंद्रीय विज्ञान मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने इस दवा को लॉन्च करते हुए इसे भारत की एक ऐतिहासिक उपलब्धि बताया है.
निमोनिया के खिलाफ देश की पहली स्वदेशी दवा-
इतना ही नहीं, वोकिहार्ड ने सरकार की मदद (BIRAC के सहयोग) से 'Nafithromycin' (नाफिथ्रोमाइसिन) नाम की एक और शानदार दवा बाजार में उतारी है, जिसे 'Miqnaf' (मिकनाफ) ब्रांड नाम दिया गया है. यह कम्युनिटी-एवायर्ड बैक्टीरियल निमोनिया के खिलाफ पिछले 30 सालों में दुनिया भर में खोजी गई पहली नई मैक्रोलाइड एंटीबायोटिक है. केंद्रीय विज्ञान मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने इस ऐतिहासिक दवा को लॉन्च करते हुए कहा कि यह ड्रग-रेजिस्टेंट निमोनिया के खिलाफ भारत का एक बहुत बड़ा और मजबूत हथियार है.
क्यों मुश्किल है नई एंटीबायोटिक बनाना?
विशेषज्ञों का मानना है कि नई एंटीबायोटिक बनाना किसी रॉकेट साइंस से भी ज्यादा कठिन काम है. बैक्टीरिया लगातार अपना रूप बदलते रहते हैं. जब वैज्ञानिक कोई नई दवा बनाते हैं, तो बैक्टीरिया उससे बचने का तरीका ढूंढ लेते हैं. यही वजह है कि पिछले 25 से 30 सालों में दुनिया भर की बड़ी-बड़ी कंपनियों ने एंटीबायोटिक रिसर्च पर पैसा लगाना बंद कर दिया था. ऐसे में भारत के प्राइवेट सेक्टर और रिसर्च संस्थानों का आगे आना एक बहुत बड़ी उपलब्धि है. बेंगलुरु की कंपनी 'Bugworks' जैसी अन्य कंपनियां भी अब ब्रॉड-स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक्स के क्लिनिकल ट्रायल्स में जुट चुकी हैं. यह इस बात का सबूत है कि आने वाले समय में भारत में एंटीबायोटिक रिसर्च का एक मजबूत इकोसिस्टम तैयार हो रहा है.
डॉ. राधा रंगराजन का मानना है कि भारत में अब एक ऐसा माहौल बन रहा है जहां वैज्ञानिक सिर्फ विदेश की नकल नहीं कर रहे, बल्कि खुद मौलिक रिसर्च कर रहे हैं. बेंगलुरु की एक और कंपनी 'बगवक्स' भी इस दिशा में तेजी से काम कर रही है और प्री-क्लिनिकल ट्रायल पूरे कर चुकी है.
बेशक, इन नई दवाओं के आने से एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस की समस्या रातों-रात खत्म नहीं हो जाएगी, क्योंकि बैक्टीरिया समय के साथ फिर से नए तरीके ढूंढ सकते हैं. लेकिन इन नई खोजों ने डॉक्टरों को सांस लेने की मोहलत जरूर दे दी है और इंसानों के लिए जंग जीतने का नया रास्ता खोल दिया है. एक समय जो देश दुनिया की फार्मेसी कहलाता था, आज वह सुपरबग्स के खिलाफ जंग में दुनिया का लीडर बनकर उभर रहा है.
आम आदमी की जिंदगी पर इसका क्या असर होगा?
आसान भाषा में समझें तो, अगर हमारे पास नई और ताकतवर एंटीबायोटिक्स नहीं होतीं, तो भविष्य में एक साधारण सा ऑपरेशन, कैंसर का इलाज या पेट का इंफेक्शन भी जानलेवा साबित हो सकता था. आज जब दुनिया के पास नई दवाओं का खजाना खत्म हो रहा था, तब भारत की इन खोजों ने इंसानी सेहत को एक नया जीवनदान दिया है.
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