Kids Mobile Using Side Effects: दिसंबर के आखिरी हफ्ते में आयी एक स्टडी के अनुसार, बच्चों के स्क्रीन टाइम यानी मोबाइल, डिवाइस पर बिताया गया समय उनके दिमाग की ग्रोथ, ध्यान, याददाश्त और व्यवहार पर असर डाल सकता है. एक बड़ी समीक्षा में यह पाया गया कि मोबाइल और डिजिटल तकनीक बच्चों के दिमाग के प्रि-फ्रंटल कॉर्टेक्स हिस्से को प्रभावित करती है, जो एक्जीक्यूटिव फंक्शन्स जैसे कि प्लान बनाना, निर्णय लेना और ध्यान बनाए रखना कंट्रोल करता है. यह स्टडी लगभग 30,000 बच्चों को शामिल करता है और बताता है कि स्क्रीन टाइम से न केवल सोचने की क्षमता प्रभावित होती है, बल्कि भाषा, ध्यान, स्मरण शक्ति और भावनात्मक कंट्रोल जैसे जरूरी हिस्सों पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है.
एक अन्य शोध में यह भी कहा गया है कि जिन बच्चों का मोबाइल स्क्रीन टाइम तीन घंटे से ज्यादा था, वे स्मार्ट स्टैण्डर्ड टेस्ट में कम प्रदर्शन करते पाए गए, जिससे लगता है कि स्क्रीन का अति उपयोग कॉग्निटिव डेवेलपमेंट यानी दिमागी ग्रोथ को भी रोक सकता है.
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मोबाइल उपयोग के दिमागी और भावनात्मक प्रभाव
- बच्चों का मोबाइल पर ज्यादा समय बिताना उनकी फोकस यानी ध्यान क्षमता को कमजोर करता है. बहुत ज्यादा नोटिफिकेशन, सोशल मीडिया और गेमिंग बच्चों को बार-बार डिस्ट्रेक्ट करता है.
- स्क्रीन टाइम बचपन में दिमाग के विकास को बदल सकता है. दो अलग-अलग हिस्सों जैसे मेमोरी, भाषा और विजुअल प्रोसेसिंग प्रभावित होती है.
- मोबाइल का देर तक उपयोग नींद को भी प्रभावित करता है. रात्रि में स्क्रीन की नीली रोशनी मेलाटोनिन हार्मोन को कम करती है, जिससे बच्चे को नींद आने में देर होती है और नींद पूरी नहीं होती, जो दिमागी स्वास्थ्य के लिए खराब है.
- ज़्यादा स्क्रीन समय बच्चों में चिड़चिड़ापन, मूडीनेस, आक्रामकता और चिंता जैसी समस्याएं बढ़ा सकता है. एक्सपर्ट्स के अनुसार यह व्यवहार बदलाव दुनियाभर में बच्चों में बढ़ रहा है क्योंकि स्क्रीन पर मनोरंजन अक्सर इंस्टेंट फीडबैक देता है, जिससे बच्चे बार-बार मोबाइल की ओर आकर्षित होते हैं.
मोबाइल बच्चो की मानसिक सेहत के लिए खतरनाक
पिछले साल अगस्त में आई एक नई ग्लोबल स्टडी ने चेतावनी दी है कि 13 साल की उम्र से पहले स्मार्टफोन मिलना बच्चों की मानसिक सेहत के लिए खतरनाक साबित हो सकता है. रिसर्च के अनुसार, कम उम्र में फोन पाने वाले युवाओं में आत्महत्या के विचार और आक्रामकता की संभावना बढ़ जाती है.
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दुनियाभर के 1 लाख से ज्यादा लोगों पर किए गए एक बड़े अध्ययन ने खुलासा किया है कि जो बच्चे 13 साल से कम उम्र में स्मार्टफोन का इस्तेमाल करने लगते हैं, उनकी मानसिक सेहत और भविष्य की भलाई पर गंभीर असर पड़ता है. जर्नल ऑफ ह्यूमन डेवलपमेंट एंड कैपेबिलिटीज में प्रकाशित इस रिसर्च के मुताबिक, 18 से 24 साल की उम्र में पहुंच चुके वे युवा, जिन्हें बचपन में स्मार्टफोन मिला था, ज्यादा आक्रामकता, वास्तविकता से अलगाव, आत्महत्या के विचार और आत्मसम्मान की कमी जैसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं.
स्टडी में पाया गया कि यह खतरा शुरुआती उम्र में सोशल मीडिया एक्सपोजर, साइबरबुलिंग, खराब नींद और पारिवारिक रिश्तों में खटास से और बढ़ जाता है. इन कारणों से बच्चों का मानसिक विकास प्रभावित होता है और बड़े होने पर उन्हें गंभीर दिक्कतों का सामना करना पड़ता है.
सैपियन लैब्स की रिपोर्ट
जून 2023 में आई सैपियन लैब्स की रिपोर्ट में अध्ययनों के आधार पर शोधकर्ताओं का कहना है कि यदि आप बच्चों को कम उम्र में ही मोबाइल फोन दे रहे हैं, तो यह उनके संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है. जितनी कम उम्र में बच्चों के हाथ में मोबाइल आएगा, मानसिक रोगों का खतरा उतना अधिक हो सकता है.
रिपोर्ट में जेनरेशन Z (18-24 वर्ष की आयु) वाले 27,969 लोगों के डेटा का इस्तेमाल किया गया. इसमें बचपन में स्मार्टफोन के उपयोग और वर्तमान मानसिक स्वास्थ्य के बीच संबंधों के बारे में पता लगाने की कोशिश की गई. इसके अनुसार जिन लोगों ने बहुत ही कम उम्र से मोबाइल पर अधिक समय बिताना शुरू कर दिया था, उनमें मानसिक विकास और मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित दिक्कतें अधिक देखी गई हैं.
रिपोर्ट के मुताबिक जिन पुरुषों ने 6 साल की उम्र में पहली बार स्मार्टफोन प्राप्त किया उनमें 18 साल की उम्र में स्मार्टफोन का इस्तेमाल शुरू करने वालों की तुलना में मानसिक विकारों के विकास का खतरा 6 फीसदी और महिलाओं में यह जोखिम करीब 20 फीसदी अधिक था. शोध के अनुसार, बच्चे अगर रोजाना 5 से 8 घंटे ऑनलाइन बिताते हैं तो यह साल में 2,950 घंटे के बराबर हो सकता है. स्मार्टफोन से पहले बच्चों यह समय परिवार और दोस्तों के साथ बीतता था. ऑनलाइन गेम्स बच्चों के दिमाग को काफी उलझन में डाल रहे हैं, जो विकसित मस्तिष्क के लिए प्रतिकूल प्रभावों वाला है.
पीयर-रिव्यूड जर्नल पीडियाट्रिक्स की स्टडी
दिसंबर 2025 में आई पीयर-रिव्यूड जर्नल पीडियाट्रिक्स की स्टडी में पाया गया कि टीनएज की शुरुआत में स्मार्टफोन रखने से मेंटल हेल्थ प्रॉब्लम और मोटापे का खतरा बढ़ जाता है. साइकोलॉजिकल असर की बात करें तो, इसमें पाया गया कि 12 साल या उससे कम उम्र के जिन बच्चों के पास स्मार्टफोन थे, उनमें डिप्रेशन और नींद की कमी के मामले उन बच्चों की तुलना में ज़्यादा थे जिनके पास ये डिवाइस नहीं थे.
चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल फिलाडेल्फिया, यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया एट बर्कले और कोलंबिया यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स ने 2018 और 2020 के बीच पूरे यूनाइटेड स्टेट्स में 10,000 से ज़्यादा किशोरों के डेटा का एनालिसिस करने के बाद ये नतीजे निकाले. इन किशोरों ने एडोलसेंट ब्रेन कॉग्निटिव डेवलपमेंट स्टडी (ABCD) में हिस्सा लिया था. यह स्टडी नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ़ हेल्थ द्वारा फंडेड है और यह खुद को देश में "दिमाग के विकास और बच्चों के स्वास्थ्य पर सबसे बड़ी लॉन्ग-टर्म स्टडी" बताती है.
रिसर्चर्स के अनुसार, ABCD स्टडी में हिस्सा लेने वालों में से 63.6% के पास स्मार्टफोन था, और उन्हें स्मार्टफोन मिलने की औसत उम्र 11 साल थी. इस डेटा का इस्तेमाल करके, रिसर्चर्स ने पाया कि बड़े बच्चों की तुलना में छोटे बच्चों को स्मार्टफोन रखने से खराब नींद या मोटापे का ज़्यादा खतरा था, और जिन बच्चों को पहला स्मार्टफोन जितनी कम उम्र में मिला था, उनके स्वास्थ्य के नतीजे उतने ही खराब थे.
माता-पिता और शिक्षकों के लिए टिप्स
- बच्चों के लिए दिन में स्क्रीन टाइम लिमिट तय करें. खासकर से मनोरंजन के लिए.
- मोबाइल को फीडबैक-पूर्ण और इंटरैक्टिव चीजों तक सीमित करें, जैसे पढ़ाई-सम्बंधी वीडियो.
- बच्चों को खेल, बातचीत और रिअल एक्टिविटीज में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करें.
- रात में सोने से कम से कम 1 घंटा पहले मोबाइल बंद कर दें.
- माता-पिता अपने व्यवहार का भी ध्यान रखें. बच्चे अक्सर बड़ों की आदतें देख-देख कर सीखते हैं.
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