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भारत में माता-पिता अपने बच्चों को क्या खिला रहे हैं? इकोनॉमिक सर्वे 2026 की चेतावनी, ये आदतें बना सकती हैं उन्हें बीमार

Economic Survey 2026: इकोनॉमिक सर्वे में नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS) के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया है कि भारत में 2020 में करीब 33 मिलियन बच्चे मोटे थे और अनुमान है कि 2035 तक यह आंकड़ा 83 मिलियन तक पहुंच सकता है.

भारत में माता-पिता अपने बच्चों को क्या खिला रहे हैं? इकोनॉमिक सर्वे 2026 की चेतावनी, ये आदतें बना सकती हैं उन्हें बीमार
Economic Survey 2026: इकोनॉमिक सर्वे 2025-26 के अनुसार, भारत में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड की बिक्री 40 गुना बढ़ गई.

Childrens Health: भारत में आज बच्चों की थाली सिर्फ घर का मामला नहीं रह गई है, बल्कि यह देश के भविष्य और अर्थव्यवस्था से भी जुड़ गई है. इकोनॉमिक सर्वे 2025-26 ने एक गंभीर चेतावनी दी है, जो खाना आज हम अपने बच्चों को खिला रहे हैं, वही कल करोड़ों बच्चों की सेहत और देश की आर्थिक मजबूती के लिए खतरा बन सकता है. पहली बार मोटापे और अनहेल्दी डाइट को सिर्फ हेल्थ इश्यू नहीं, बल्कि आर्थिक जोखिम के रूप में देखा गया है. यह चेतावनी हमें रुककर सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर हमारे बच्चे क्या खा रहे हैं और क्यों.

बच्चों की थाली में क्या बढ़ रहा है?

तेज होती जिंदगी, काम का दबाव और आसान विकल्पों की तलाश ने माता-पिता को पैकेट बंद और रेडी-टू-ईट खाने की ओर मोड़ दिया है. चिप्स, बिस्किट, शुगरी ड्रिंक्स, इंस्टेंट नूडल्स और फास्ट फूड अब बच्चों की रोजमर्रा की डाइट का हिस्सा बनते जा रहे हैं. इन्हें अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड (UPF) कहा जाता है, ऐसे फूड्स जिनमें ज्यादा शुगर, नमक, अनहेल्दी फैट और केमिकल एडिटिव्स होते हैं, लेकिन पोषण बहुत कम होता है.

मोटापे की समस्या कितनी बड़ी है?

इकोनॉमिक सर्वे में नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS) के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया है कि भारत में 24 प्रतिशत महिलाएं और 23 प्रतिशत पुरुष ओवरवेट या मोटापे का शिकार हैं. बच्चों में स्थिति और भी चिंताजनक है. पांच साल से कम उम्र के बच्चों में ओवरवेट होने की दर 2015-16 में 2.1 प्रतिशत थी, जो 2019-21 में बढ़कर 3.4 प्रतिशत हो गई. संख्या में देखें तो 2020 में करीब 33 मिलियन बच्चे मोटे थे और अनुमान है कि 2035 तक यह आंकड़ा 83 मिलियन तक पहुंच सकता है.

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ये खाने-पीने की आदतें बन रही बच्चों के लिए खतरनाक:

1. रोज-रोज पैकेट वाला खाना देना

चिप्स, बिस्किट, इंस्टेंट नूडल्स, केक, चॉकलेट ये सब अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड हैं. इनमें ज्यादा नमक, ज्यादा चीनी, खराब फैट होता है, लेकिन पोषण लगभग नहीं के बराबर. इससे मोटापा, डायबिटीज और दिल की बीमारियों का खतरा बढ़ता है.

2. सॉफ्ट ड्रिंक और पैक्ड जूस को नॉर्मल समझना

कई माता-पिता पानी की जगह कोल्ड ड्रिंक, फ्लेवर्ड मिल्क, पैक्ड जूस देते हैं. ये ड्रिंक्स बच्चों के शरीर में फालतू शुगर भर देती हैं, जिससे फैटी लिवर और वजन तेज़ी से बढ़ता है.

3. खाना नहीं खा रहा कहकर जंक फूड देना

जब बच्चा दाल-सब्ज़ी नहीं खाता, तो उसे पिज्जा, बर्गर फ्रेंच फ्राइज दे देना आसान लगता है. इससे बच्चा हेल्दी खाने से दूर और जंक का आदी हो जाता है.

4. घर में टाइम पर खाना न होना

कभी बहुत देर से डिनर, कभी टीवी/मोबाइल देखते हुए खाना कभी नाश्ता स्किप, ऐसी आदतें बच्चों के मेटाबॉलिज़्म को बिगाड़ती हैं और मोटापे का रास्ता खोलती हैं.

5. फल-सब्जी को ऑप्शनल समझना

अगर थाली में फल रोज नहीं, हरी सब्ज़ियां कम दाल, अनाज की जगह रिफाइंड फूड तो बच्चे को ज़रूरी विटामिन और फाइबर नहीं मिल पाता.

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6. मोबाइल या टीवी के साथ खाना

स्क्रीन देखते हुए खाना खाने से बच्चा ज़्यादा खा जाता है, भूख का एहसास खत्म हो जाता है. यह आदत मोटापे और पाचन समस्याओं को बढ़ाती है.

7. फिजिकल एक्टिविटी की कमी

स्कूल से आकर मोबाइल, वीडियो गेम, टीवी और बाहर खेलने का समय नहीं. खराब डाइट और एक्टिविटी की कमी ये सभी आदतें मोटापा और बीमारियां बढ़ाती हैं.

क्या बदला जा सकता है?

  • घर का सादा खाना
  • रोज फल और सब्ज़ी
  • पानी पीने की आदत
  • स्क्रीन टाइम कम
  • रोज थोड़ा खेल या चलना

अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का बढ़ता बाजार

सर्वे बताता है कि भारत में UPF का बाजार तेजी से बढ़ा है. साल 2006 में जहां इसकी रिटेल बिक्री लगभग 0.9 बिलियन डॉलर थी, वहीं 2019 तक यह बढ़कर करीब 38 बिलियन डॉलर हो गई. यह बढ़ोतरी सिर्फ़ बाज़ार का आंकड़ा नहीं है, बल्कि बदलती खान-पान की आदतों का सबूत है.

सेहत से आगे, अर्थव्यवस्था पर असर:

ज्यादा अस्ट्रा प्रोसेस्ड फूड्स खाने को मोटापा, डायबिटीज, दिल की बीमारियों, सांस की समस्याओं और मेंटल डिसऑर्डर्स से जोड़ा गया है. इकोनॉमिक सर्वे साफ कहता है कि इसका असर सिर्फ व्यक्ति तक सीमित नहीं रहेगा.

  • घरों और सरकार दोनों के लिए हेल्थकेयर खर्च बढ़ेगा.
  • लंबी बीमारियों के कारण काम करने की क्षमता घटेगी.
  • प्रोडक्टिविटी कम होगी और पब्लिक फाइनेंस पर दबाव बढ़ेगा.
  • इसीलिए मोटापे को मानव पूंजी के लिए खतरा बताया गया है.

क्या सिर्फ जागरूकता काफी है?

सर्वे का साफ संदेश है सिर्फ कम खाओ, सही खाओ कहना काफी नहीं होगा. खाने की आदतें केवल व्यक्तिगत पसंद से नहीं, बल्कि फूड सिस्टम, मार्केटिंग और उपलब्धता से भी तय होती हैं. जरूरत है कि सरकार और समाज मिलकर फूड प्रोडक्शन, रेगुलेशन, लेबलिंग, विज्ञापन और रिसर्च के लेवल पर ठोस कदम उठाएं.

माता-पिता की भूमिका क्यों अहम है?

नीतियां अपनी जगह जरूरी हैं, लेकिन बदलाव की शुरुआत घर से ही होगी. बच्चों को ताजा, घर का बना खाना, फल-सब्जियां, दालें और बैलेंस डाइट देना आज सिर्फ़ पालन-पोषण नहीं, बल्कि देश के भविष्य में निवेश है. क्योंकि सच यही है आज बच्चों की थाली में क्या है, वही कल भारत की सेहत और अर्थव्यवस्था तय करेगा.

(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)

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