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10 साल तक Sugar-Free खाने वालों में Diabetes का खतरा 31% ज्यादा? नई स्टडी में बड़ा खुलासा

Sugar-Free और Artificial Sweeteners को लेकर नई रिसर्च में बड़ा खुलासा हुआ है। 7.2 लाख लोगों पर हुई स्टडी में Type 2 Diabetes के बढ़े हुए जोखिम की बात सामने आई है. जानें पूरी रिपोर्ट-

10 साल तक Sugar-Free खाने वालों में Diabetes का खतरा 31% ज्यादा? नई स्टडी में बड़ा खुलासा
क्या Sugar-Free खाने से Diabetes हो सकती है?
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आजकल वजन घटाने (Weight Loss) और शुगर से बचने के लिए लोग 'शुगर-फ्री' (Sugar-Free) और डाइट ड्रिंक्स की तरफ तेजी से भाग रहे हैं. पैकेज्ड फूड्स, सॉफ्ट ड्रिंक्स और मिठाइयों में आर्टिफिशियल स्वीटनर (Artificial Sweeteners) का इस्तेमाल बहुत आम हो चुका है. लोगों को लगता है कि कैलोरी कम है तो यह सेहत के लिए बिल्कुल महफूज है. लेकिन क्या यह मीठा विकल्प लंबे समय में हमारे शरीर को नुकसान पहुँचा रहा है. हाल ही में आई एक बड़ी स्टडी ने कई चौंकाने वाले खुलासे किए हैं.

क्या कहती है नई रिसर्च

'फ्रंटियर्स ऑफ न्यूट्रिशन' (Frontiers of Nutrition) जर्नल में छपी एक बड़ी रिसर्च में अमेरिका, यूरोप और जापान के करीब 7 लाख 20 हजार लोगों के डेटा की जांच की गई. इस मेटा-एनालिसिस में पाया गया कि जो लोग 10 साल से ज्यादा समय तक लगातार आर्टिफिशियल स्वीटनर का सेवन करते रहे, उनमे टाइप 2 डायबिटीज (Type 2 Diabetes) होने का खतरा लगभग 31% तक बढ़ गया.

अक्सर जिन लोगों को ब्लड शुगर या मोटापे की दिक्कत होती है, वे चीनी छोड़कर इन केमिकल्स वाले मीठे का सहारा लेते हैं. पर यह हमारे मेटाबॉलिज्म (Metabolism) को कैसे प्रभावित करता है, इसे समझना बहुत जरूरी है.

Artificial sweeteners diabetes का सीधा कारण नहीं माने जा सकते, लेकिन बहुत अधिक और लंबे समय तक सेवन करने वालों में metabolic changes देखे गए हैं.

शरीर पर इसका क्या असर पड़ता है

आर्टिफिशियल स्वीटनर्स केवल जुबान को मीठे का अहसास कराते हैं, लेकिन पेट और हार्मोन्स पर इनका असर कुछ इस तरह होता है:

  • आंतों के बैक्टीरिया में बदलाव (Gut Health): यह पेट के भीतर मौजूद अच्छे बैक्टीरिया की संख्या और संतुलन को बिगाड़ सकता है. इससे समय के साथ इंसुलिन सेंसिटिविटी कमजोर होने लगती है.
  • शरीर में सूजन (Inflammation): आंतों का संतुलन बिगड़ने से शरीर में धीरे-धीरे हल्की सूजन (Low-grade inflammation) पैदा होती है. जब यह लंबे समय तक बनी रहती है, तो डायबिटीज और मेटाबॉलिक डिसऑर्डर का रूप ले लेती है.
  • भूख और क्रेविंग बढ़ना: दिमाग को मीठे का सिग्नल तो मिलता है लेकिन असली कैलोरी नहीं मिलती. इसकी वजह से घ्रेलिन (Ghrelin) और लेप्टिन (Leptin) जैसे भूख कंट्रोल करने वाले हार्मोन्स असंतुलित हो जाते हैं और इंसान को बार-बार कुछ न कुछ खाने की तलब लगती है.
     

मेटाबॉलिक सिंड्रोम का बढ़ता खतरा

जब शरीर का मेटाबॉलिज्म बिगड़ता है, तो इसे 'मेटाबॉलिक सिंड्रोम' (Metabolic Syndrome) कहा जाता है. इसमें कमर का घेरा बढ़ना, हाई ब्लड प्रेशर, बैड कोलेस्ट्रॉल और हाई ब्लड शुगर जैसी समस्याएं एक साथ घेर लेती हैं. यह स्थिति आगे चलकर हार्ट अटैक, स्ट्रोक और टाइप 2 डायबिटीज का सबसे बड़ा कारण बनती है.

किन्हें सबसे ज्यादा संभलकर रहने की जरूरत है

अगर आप रोजाना भारी मात्रा में डाइट सोडा या शुगर-फ्री गोलियां ले रहे हैं, तो अलर्ट हो जाइए. खासतौर पर इन लोगों को ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए:

  • जिन्हे प्री-डायबिटीज (Prediabetes) की शिकायत है.
  • जो मोटापे से जूझ रहे हैं.
  • जिन्हे पहले से मेटाबॉलिक सिंड्रोम या दिल से जुड़ी परेशानियां हैं.
  • जो दिनभर में कई बार डाइट ड्रिंक्स या प्रोसेस्ड शुगर-फ्री प्रोडक्ट्स पीते हैं.
     

मीठा कम करने के नेचुरल और आसान तरीके

आर्टिफिशियल केमिकल वाले स्वीटनर्स पर निर्भर होने के बजाय आप इन आसान और कुदरती तरीको को अपनी दिनचर्या में शामिल कर सकते हैं:

  • मीठे की तलब होने पर ताजे साबुत फल खाएं.
  • चाय या ओट्स में स्वाद के लिए दालचीनी (Cinnamon) का हल्का सा पाउडर मिलाएं.
  • पैकेट वाले मीठे दही की जगह सादा अनस्वीटनड दही खाएं.
  • धीरे-धीरे चाय-कॉफी में चीनी की मात्रा घटाने की आदत डालें.
  • बाजार के ड्रिंक्स के बजाय पर्याप्त मात्रा में सादा पानी या नारियल पानी पिएं.
  • सीमित मात्रा में खजूर या प्राकृतिक स्टीविया (Stevia) का इस्तेमाल करें.

आर्टिफिशियल स्वीटनर्स डायबिटीज का सीधा कारण बनते हैं या नहीं, इस पर अभी और क्लिनिकल रिसर्च चल रही है, लेकिन लगातार 10 साल तक इनका ज्यादा इस्तेमाल सेहत के लिए सही संकेत नहीं देता. किसी भी ट्रेंड को बिना समझे फॉलो करने से बेहतर है कि अपनी पूरी लाइफस्टाइल और खानपान को संतुलित बनाया जाए.

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