कॉर्निया खराब होने से आंखों की रोशनी चली जाए और डोनर कॉर्निया नहीं मिले, तो ऐसी स्थिति में मरीज की आंखें पूरी तरह से खराब हो सकती हैं. इस तरह की मरीजों के लिए एम्स ने आर्टिफिशियल कॉर्निया के रूप में नई उम्मीद जगाई है. इसका इस्तेमाल उन जटिल मरीजों में किया जाता है, जिनमें सामान्य कॉर्निया ट्रांसप्लांट संभव नहीं होता.
मेडिकल भाषा में इस समस्या को कॉर्नियल ब्लाइंडनेस कहा जाता है. सामान्य रूप से इसका ट्रीटमेंट कॉर्निया ट्रांसप्लांट के जरिए किया जाता है, लेकिन हमारे देश में डोनर कॉर्निया की भारी कमी बनी हुई है. इसी समस्या को देखते हुए एम्स के आरपी सेंटर में आर्टिफिशियल कॉर्निया तकनीक का इस्तेमाल शुरू किया गया है.
अब तक 20 मरीजों को लगाया जा चुका है आर्टिफिशियल कॉर्निया
एम्स के आरपी सेंटर के एक्सपर्ट के मुताबिक, अब तक करीब 20 मरीजों में आर्टिफिशियल कॉर्निया लगाया जा चुका है और इसके शुरुआती रिजल्ट काफी अच्छे रह हे हैं.
डोनर कॉर्निया की कमी कितनी बड़ी समस्या?
देश में हर साल लगभग 1 लाख से ज्यादा मरीजों को कॉर्निया ट्रांसप्लांट की जरूरत होती है. इसके मुकबले डोनर कॉर्निया की उपलब्धता काफी कम है. 2022-23 में सिर्फ 62,370 कॉर्निया एकत्र किए गए. वहीं, 2023-24 में 66,434 कॉर्निया एकत्र हुए और 2024-25 में 69,848 कॉर्निया एकत्र हुए. इसका मतलब साफ है कि जरूरत की तुलना में अभी भी हजारों मरीजों को कॉर्निया उपलब्ध नहीं हो पाता है.
क्या है आर्टिफिशियल कॉर्निया?
आर्टिफिशियल कॉर्निया को मेडिकल भाषा में केराटोप्रोस्थेसिस कहा जाता है. ये डोन टिश्यू नहीं, बल्कि स्पेशल चीजों से आर्टिफिशयल उपकरण होता है. इसमें एक पारदर्शी कृत्रिम हिस्सा होता है, जो डैमेज कॉर्निया के कारण बंद हो चुके प्रकाश के रास्ते को दोबारा खोल देता है और रोशनी को आंख के अंदर पहुंचने देता है.
कैसे लौटती है रोशनी?
एक्सपर्ट का कहना है कि आर्टिफिशियल कॉर्निया का पारदर्शी हिस्सा रोशनी को आंख के अंदर जाने देता है. प्रकाश रेटिना तक पहुंचता है और वहां से ऑप्टिक नर्व के जरिए मस्तिष्क तक दृश्य संकेत पहुंचते हैं.
ये रेटिना या ऑप्टिक नर्व का इलाज नहीं करता, बल्कि सिर्फ उस स्थिति में मदद करता है, जब कॉर्निया खराब होने के कारण रोशनी आंख के अंदर नहीं पहुंच पा रही हो.
किन मरीजों को होता है फायदा?
ये तकनीक हर कॉर्नियल ब्लाइंड मरीज के लिए उपयुक्त नहीं है. इसका इस्तेमाल कुछ जटिल मामलों में किया जा सकता है, जैसे-
- जिनमें सामान्य कॉर्निया ट्रांसप्लांट सफल होने की संभावना कम हो.
- जिनका पहले ट्रांसप्लांट फेल हो चुका हो.
- जिनकी कॉर्नियल बीमारी अत्यधिक गंभीर हो.
क्या आर्टिफिशियल कॉर्निया से आंखों की रोशनी वापस आएगी?
डॉक्टर का कहना है कि आर्टिफिशियल कॉर्निया लगाने के बाद आंखों की रोशनी में सुधार हो सकता है, लेकिन ये जरूरी नहीं कि हर मरीज पहले जैसी आंखों की रोशनी प्राप्त कर ले.
इसका रिजल्ट कई बातों पर निर्भर करते हैं, जिसमें रेटिना की स्थिति, ऑप्टिक नर्व की कार्यक्षमता और आंख की अन्य संरचनाओं की सेहत. फिर भी गंभीर कॉर्नियल बीमारी के कारण लगभग कुछ भी न देख पाने वाले मरीजों के लिए ये तकनीक काफी लाभकारी साबित हो सकती है.
क्या है लागत?
हमारे देश में केराटोप्रोस्थेसिस की सामान्य लागत लगभग 2 लाख से 4 लाख रुपये तक बताई जाती है. वास्तविक खर्च उपकरण, अस्पताल और मरीज की स्थिति के अनुसार अलग-अलग हो सकता है.
ये भी पढ़ें - Eye Donation: जानिए कैसे, कब और कौन कर सकता है नेत्रदान, डॉक्टर ने तोड़े इससे जुड़े सभी मिथ
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं