30 साल के नकुल बरुआ एक रोड एक्सीडेंट में बुरी तरह घायल हो गए. उनकी दाहिनी पसलियों में कई फ्रैक्चर, दाहिने पेल्विस और एसिटाबुलम में चोट, लम्बर स्पाइन, बाएं फीमर और पटेला में फ्रैक्चर, और दाहिनी एड़ी और टखने में गंभीर चोटें आईं. पूरे शरीर में कुल 20 फ्रैक्चर्स आए. लेकिन कहते हैं न जाको राखे साइयां, मार सके ना कोय. नकुल के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ है, 20 गंभीर चोटों और फ्रैक्चर्स के बाद जिंदगी ने उन्हें दूसरा मौका दिया है.
नोएडा के सेक्टर 27 में कैलाश हॉस्पिटल में इलाज के दौरान उन्हें लंबे समय तक मैकेनिकल वेंटिलेशन की जरूरत पड़ी और चेस्ट वॉल रिपेयर किया गया. डॉक्टरों ने उनकी छाती, पेट, पेल्विस और हाथ-पैरों में लगी कई चोटों का भी इलाज किया. बरुआ को 2 मार्च, 2026 को भर्ती कराया गया था, और 74 दिनों तक हॉस्पिटल में रहने के बाद 15 मई को स्थिर हालत में छुट्टी दे दी गई.
भर्ती के वक्त हालत थी गंभीर
नकुल को 2 मार्च की सुबह नोएडा में एक रोड एक्सीडेंट के बाद हॉस्पिटल लाया गया था. उन्हें कई गंभीर चोटें आई थीं, जिनमें छाती में चोट, पेट, पेल्विस और हाथ-पैरों में चोटें, बेहोशी और रीढ़ की हड्डी में चोटें शामिल थीं. भर्ती होने पर, वह गंभीर रूप से बीमार थे, उनकी रेस्पिरेटरी रेट 44 प्रति मिनट और पल्स रेट 120 प्रति मिनट थी. जांच के समय उनका ब्लड प्रेशर रिकॉर्ड नहीं हो पा रहा था. उन्हें इमरजेंसी इंट्यूबेशन, मैकेनिकल वेंटिलेशन और सर्कुलेटरी सपोर्ट की जरूरत थी.
नकुल के इलाज के लिए मल्टीडिसिप्लिनरी ट्रॉमा केयर अप्रोच की जरूरत थी, जिसमें डॉ. अनिल गुरनानी, ग्रुप डायरेक्टर, क्रिटिकल केयर, और डॉ. सुशील शर्मा, सीनियर कंसल्टेंट, जॉइंट और नी रिप्लेसमेंट सर्जन, ऑर्थोपेडिक्स, के साथ थोरेसिक सर्जरी और दूसरी क्लिनिकल टीमों के स्पेशलिस्ट शामिल थे.
क्लिनिकल जांच और नतीजे
जांच में पता चला कि दाईं ओर की पसलियों में कई फ्रैक्चर और दाईं ओर सबक्यूटेनियस एम्फाइजिमा है. भर्ती होने के दिन दाईं ओर एक इंटरकोस्टल ड्रेन डाला गया था. पसलियों के फ्रैक्चर से उनकी छाती की दीवार की स्टेबिलिटी पर असर पड़ रहा था, जबकि वह वेंटिलेटरी सपोर्ट पर निर्भर थे, थोरेसिक चोट उनके पूरे मैनेजमेंट का एक जरूरी हिस्सा बन गई. जब उनकी क्लिनिकल कंडीशन ठीक हुई, तो थोरेसिक सर्जरी टीम ने 17 मार्च, 2026 को राइट डायग्नोस्टिक थोरैकोस्कोपी, चेस्ट वॉल रिपेयर और फाइबरऑप्टिक ब्रोंकोस्कोपी की.
डॉ. गुरनानी ने कहा, "नकुल का केस मुश्किल इसलिए नहीं था क्योंकि उसमें कोई एक चोट थी, बल्कि इसलिए था क्योंकि एक ही समय में कई जानलेवा परेशानियां सामने आ रही थीं. आने पर, उन्हें सीने में गंभीर चोट, हीमोडायनामिक अस्थिरता और सांस लेने में दिक्कत थी, जिससे तुरंत एयरवे और सर्कुलेटरी सपोर्ट देना जरूरी हो गया था. लंबे समय तक वेंटिलेटर की जरूरत का मतलब यह भी था कि उनकी सांस की हालत की लगातार जांच करनी पड़ी क्योंकि उनकी दूसरी चोटों का इलाज चल रहा था. ऐसे मुश्किल ट्रॉमा में, क्रिटिकल केयर का मतलब है लगातार कॉम्पिटिटिव और रेस्पिरेटरी हालत को बैलेंस करना.
बहरहाल, 74 दिनों तक अस्पताल में इलाज के बाद नकुल की हालत स्थिर होने पर उन्हें छुट्टी दे दी गई.
इसे भी पढ़ें: महिलाओं के लिए वरदान है भद्रासन! पीरियड्स दर्द, तनाव और कमजोरी में देता है आराम
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं