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90 मिनट तक बिना हिले-डुले खड़ा रहता ये फैन, FIFA World Cup में अपने PM की बेहद दर्दनाक कहानी याद दिला रहा

यह कांगो के पहले PM की याद दिलाता है, जिनकी फायरिंग स्क्वाड ने हत्या की. फिर उनके दफनाए गए शव को निकाला गया, टुकड़े किए गए और एसिड में घोल दिया गया.

90 मिनट तक बिना हिले-डुले खड़ा रहता ये फैन, FIFA World Cup में अपने PM की बेहद दर्दनाक कहानी याद दिला रहा
90 मिनट तक बिना हिले-डुले मूर्ति बनकर खड़ा रहता कांगो का ये फैन
AFP

FIFA वर्ल्ड कप में मैच के दौरान कैमरे आमतौर पर उन प्रशंसकों पर टिकते हैं जो अपनी टीम का झंडा लहरा रहे होते या जोर-जोर से नारे लगा रहे होते या गोल होने पर खुशी से उछल रहे होते हैं, लेकिन इस बार एक ऐसा फैन दुनिया भर के लाखों लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच रहा है जो न तो चिल्लाता है और न ही झूमता, यहां तक कि पूरे मैच के दौरान वो अपनी जगह से हिलता भी नहीं है. ये डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो की राष्ट्रीय फुटबॉल टीम के सबसे मशहूर समर्थक मिशेल कुका म्बोलाडिंगा, जिन्हें दुनिया लुमुम्बा वेआ के नाम से जानती है. लुमुम्बा वेआ पूरे मैच के दौरान एक मूर्ति की तरह खड़े रहते हैं. उनके हाथ हवा में उठे होते हैं, चेहरा गंभीर होता है और शरीर बिल्कुल स्थिर. देखने वालों को लगता है मानो कोई इंसान नहीं, बल्कि किसी की प्रतिमा सामने खड़ी हो.

वर्ल्ड कप में कोलंबिया और डीआर कांगो के मुकाबले के दौरान भी यही नजारा देखने को मिला. कांगो की टीम भले ही 1-0 से हार गई, लेकिन स्टेडियम में मौजूद यह अनोखा प्रशंसक चर्चा का केंद्र बन गया.

आखिर कौन हैं लुमुम्बा वेआ?

लुमुम्बा वेआ का असली नाम मिशेल कुका म्बोलाडिंगा है. वह बीते एक दशक से भी अधिक समय से अपनी राष्ट्रीय टीम का समर्थन इसी अनोखे अंदाज में कर रहे हैं. सूट, जैकेट और टाई पहनकर वह स्टैंड में एक छोटे से मंच पर खड़े हो जाते हैं. उनकी पोशाक अक्सर कांगो के राष्ट्रीय झंडे के रंगों से मेल खाती है. मैच शुरू होने के बाद वे लगभग पूरे 90 मिनट तक बिना हिले-डुले खड़े रहते हैं. यही वजह है कि उन्हें दुनिया भर में लिविंग स्टैच्यू के नाम से जाना जाता है.

दिलचस्प बात यह है कि उनकी यह मुद्रा किसी सामान्य फैन की स्टाइल नहीं है. इसके पीछे कांगो के इतिहास का एक बेहद भावनात्मक पहलू छिपा है. लुमुम्बा वेआ जिस मुद्रा में खड़े रहते हैं, वह कांगो के स्वतंत्रता सेनानी और पहले प्रधानमंत्री पैट्रिस लुमुम्बा की राजधानी किंशासा में लगी एक प्रतिमा की हूबहू नकल है.

पैट्रिस लुमुम्बा को आज भी कांगो और पूरे अफ्रीका में स्वतंत्रता, सम्मान और उपनिवेशवाद के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक माना जाता है. यही वजह है कि म्बोलाडिंगा ने अपना नाम भी लुमुम्बा वेआ रखा, जिसका अर्थ है– लुमुम्बा जीवित हैं. यह न केवल उनका फुटबॉल टीम को समर्थन है, बल्कि इतिहास को जिंदा रखने का मिशन भी है.

34 साल की उम्र में प्रधानमंत्री, फिर दर्दनाक हत्या

पैट्रिस लुमुम्बा का जीवन जितना प्रेरणादायी था, उनका अंत उतना ही दर्दनाक और डरावना रहा है. 30 जून 1960 को कांगो को बेल्जियम से आजादी मिलने के बाद पैट्रिस लुमुम्बा स्वतंत्र कांगो के पहले प्रधानमंत्री बने. उस समय उनकी उम्र केवल 34 वर्ष थी. लेकिन कुछ ही दिनों बाद देश गहरे राजनीतिक और सैन्य संकट में फंस गया. 

सेना की कई इकाइयों ने अपने बेल्जियन कमांडरों के खिलाफ विद्रोह कर दिया, जिससे पूरे देश में अराजकता फैल गई. इसी मौके का फायदा उठाकर कटांगा प्रांत के नेता मोइज त्शोम्बे ने खनिज संपदा से भरपूर कटांगा को कांगो से अलग स्वतंत्र राज्य घोषित कर दिया.

बेल्जियम ने अपने नागरिकों की सुरक्षा के नाम पर सैनिक भेजे, लेकिन ये सैनिक मुख्य रूप से कटांगा में तैनात हुए और अलगाववादी शासन को समर्थन देने लगे. प्रधानमंत्री पैट्रिस लुमुम्बा ने संयुक्त राष्ट्र से बेल्जियन सैनिकों को हटाने और देश में व्यवस्था बहाल करने की अपील की, लेकिन संयुक्त राष्ट्र ने कटांगा के विद्रोह को कुचलने में मदद करने से इनकार कर दिया. 

मजबूर होकर लुमुम्बा ने सोवियत संघ से सहायता मांगी, जिससे पश्चिमी देशों और राष्ट्रपति जोसेफ कसावुबू के समर्थकों की चिंताएं बढ़ गईं. 

5 सितंबर 1960 को राष्ट्रपति कसावुबू ने लुमुम्बा को पद से बर्खास्त कर दिया, लेकिन लुमुम्बा ने इसे असंवैधानिक बताया. इसके बाद देश में दो प्रतिद्वंद्वी सरकारों का दावा सामने आया. 

14 सितंबर को सेना प्रमुख कर्नल जोसेफ मोबुतु ने तख्तापलट कर सत्ता अपने हाथ में ले ली. नवंबर में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने कसावुबू की सरकार को वैध मान्यता दे दी और इसके बाद लुमुम्बा को नजरबंद कर दिया गया, लेकिन वे भागकर अपने समर्थकों के गढ़ स्टैनलीविल पहुंचने की कोशिश में पकड़े गए और 2 दिसंबर 1960 को गिरफ्तार कर लिए गए. 

17 जनवरी 1961 को उन्हें उनके साथियों जोसेफ ओकितो और मौरिस मपोलो के साथ कटांगा भेज दिया गया, जहां बेल्जियन अधिकारियों और कटांगा शासन की मिलीभगत से उन्हें बुरी तरह प्रताड़ित किया गया और उसी दिन फायरिंग स्क्वॉड ने उनकी हत्या कर दी.

इतिहासकारों के अनुसार उनकी हत्या में उसी बेल्जियम की भूमिका रही जिससे देश को आजादी मिली थी. हालांकि उनके शवों को शुरू में कब्रों में फेंक दिया गया था, लेकिन बाद में बेल्जियम के अधिकारियों के निर्देश पर उन्हें खोदकर निकाला गया, फिर उन्हें टुकड़े में काट दिया गया और अंत में तेजाब में घोल दिया गया.

इतिहासकार कहते हैं कि उनके शवों को उनकी मौत को छिपाने के लिए पूरी तरह नष्ट किया गया. हालांकि उस समय उनकी मृत्यु को लेकर झूठी कहानियां गढ़ी गईं, लेकिन बाद में सच्चाई सामने आई और लुमुम्बा अफ्रीका में उपनिवेशवाद-विरोधी संघर्ष के सबसे बड़े प्रतीकों में से एक बन गए. इतना सब होने के बावजूद पैट्रिस लुमुम्बा की याद मिट नहीं सकी. आज भी अफ्रीका के कई देशों में सड़कों, चौकों और संस्थानों का नाम उनके नाम पर है. आज उन्हें कांगो का राष्ट्रीय नायक माना जाता है.

एक दांत से बची पूरी कहानी

पैट्रिस लुमुम्बा के शरीर का लगभग पूरा हिस्सा नष्ट कर दिया गया था. वर्षों बाद पता चला कि उनके शरीर का केवल एक दांत बचा था, जिसे एक बेल्जियन अधिकारी ने अपने पास रख लिया था. करीब छह दशक बाद 2022 में यह दांत उनके परिवार को वापस सौंपा गया. यह घटना भी दुनिया भर में सुर्खियां बनी थी और इसने एक बार फिर लुमुम्बा की कहानी को लोगों के सामने ला दिया.

लुमुम्बा वेआ इन्हीं पैट्रिस लुमुम्बा की याद दिलाते हुए FIFA वर्ल्ड कप के दौरान स्टेडियम में बुत बने खड़े रहते हैं. रिपोर्टों के मुताबिक, राष्ट्रीय टीम के खिलाड़ियों ने खुद आग्रह किया था कि उन्हें आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा बनाया जाए ताकि वे वर्ल्ड कप में टीम के साथ मौजूद रह सकें. खिलाड़ियों का मानना है कि स्टैंड में उनकी मौजूदगी टीम को मानसिक ताकत देती है.

इस वर्ल्ड कप में कांगो के बहुत कम फैन्स पहुंच पाए. लंबी यात्रा, महंगे टिकट, वीजा संबंधी चुनौतियां और देश की परिस्थितियों के कारण बड़ी संख्या में समर्थक अपने घरों से ही मैच देख रहे हैं. यहां तक कि लुमुम्बा वेआ को भी कुछ दिन पहले ही वीजा मिल सका, लेकिन स्टेडियम में स्टैचु बने लुमुम्बा वेआ आज लाखों कांगोवासियों का चेहरा बन गए हैं. उनकी खामोशी में कांगो के इतिहास का वो शोर है जो स्टेडियम में उनके बुत बन कर खड़े रहने और उस दौरान गोल होने पर मचाए जा रहे शोर से कभी बड़ा है, क्योंकि तब भी सबका ध्यान लुमुम्बा वेआ पर जाता है जो एक शब्द भी नहीं बोलता.

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