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"जीतो या मर जाओ", जब ट्रंप की तरह हिटलर और मुसोलिनी ने भी FIFA वर्ल्ड कप में बनाया था दबाव

ट्रंप के दखल के बाद भी अमेरिका हार गया. FIFA वर्ल्ड कप में मुसोलिनी, हिटलर, अर्जेंटीना की सैन्य सरकार, कुवैत के शेख ने भी पहले राजनीतिक दखल दे रखा है.

"जीतो या मर जाओ", जब ट्रंप की तरह हिटलर और मुसोलिनी ने भी FIFA वर्ल्ड कप में बनाया था दबाव
हिटलर और मुसोलिनी लोगों का अभिवादन स्वीकार करते हुए
FBI

क्रिकेट हो या फुटबॉल, खेलों को अक्सर राजनीति से दूर रखने की बात की जाती है लेकिन इतिहास बताता है कि फीफा वर्ल्ड कप कई बार राजनीतिक दखल का भी गवाह बना है. बीते दिन खुद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने माना कि उन्होंने फीफा प्रमुख जियानी इन्फेंटिनो को फोन कर अमेरिकी फुटबॉल टीम के स्ट्राइकर फोलारिन बालोगुन को दिखाए गए रेड कार्ड के रिव्यू का अनुरोध किया था.

इसके बाद फीफा ने बालोगुन पर लगे एक मैच के बैन को एक साल के लिए निलंबित कर दिया, जिससे वह बेल्जियम के खिलाफ प्री-क्वार्टरफाइनल मुकाबले में खेलने के लिए उपलब्ध हो गए. हालांकि इसके बावजूद अमेरिकी टीम बेल्जियम के हाथों हार कर फीफा वर्ल्ड कप 2026 से बाहर हो गई.

लेकिन ट्रंप के इस कॉल ने एक बार फिर उन पुरानी यादों को ताजा कर दिया है जब ऐसे ही राजनीति ने फुटबॉल के मैदान में सीधी एंट्री की थी. उन वाकयों में हिटलर, मुसोलिनी जैसे तानशाहों का नाम भी शामिल है. कुछ ऐसी ही घटनाओं के जानने के लिए चलिए पलटते हैं इतिहास के पन्ने.

1934: मुसोलिनी का वर्ल्ड कप

1934 का फीफा वर्ल्ड कप इटली में हुआ और तब वहां तानाशाह बेनिटो मुसोलिनी का शासन था. मुसोलिनी ने इस टूर्नामेंट को अपनी सरकार की ताकत दिखाने का बड़ा मौका माना. वह लगभग हर मैच में मौजूद रहते थे और कई बार बिना बताए रेफरी के ड्रेसिंग रूम तक भी पहुंच जाते थे. आखिरकार इटली चैंपियन बना, लेकिन पूरे टूर्नामेंट में रेफरी के फैसलों को लेकर सवाल उठे. उस समय फीफा अध्यक्ष जुल्स रिमेट ने तंज कसते हुए कहा था, "यह टूर्नामेंट फीफा ने नहीं, मुसोलिनी ने आयोजित कराया था."

मुसोलिनी के साथ हिटलर

मुसोलिनी के साथ हिटलर
Photo Credit: FBI

1938: मुसोलिनी और हिटलर की छाया

1938 का वर्ल्ड कप फ्रांस में खेला गया, लेकिन इस बार राजनीति का असर और भी गहरा था. जर्मनी के तानाशाह एडॉल्फ हिटलर ने कुछ महीने पहले ऑस्ट्रिया को अपने देश में मिला लिया था. इसके बाद ऑस्ट्रिया की मशहूर वुंडरटीम के कई खिलाड़ियों को जर्मनी के लिए खेलने पर मजबूर किया गया. हालांकि जर्मनी पहले ही दौर में स्विट्जरलैंड से हारकर बाहर हो गया.

दूसरी ओर इटली ने फिर खिताब जीता. कहा जाता है कि फाइनल से पहले मुसोलिनी ने अपनी टीम को सिर्फ तीन शब्दों का संदेश भेजा था- "जीतो या मर जाओ." 

इटली ने फाइनल 4-2 से जीत लिया. बाद में हंगरी के गोलकीपर एंटल सजाबो ने मजाक में कहा, "मैंने चार गोल जरूर खाए, लेकिन खिलाड़ियों की जान बचा ली."

अर्जेंटीना के सैन्य शासक और पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ग राफाएल विदेला (बाएं से तीसरे)

अर्जेंटीना के सैन्य शासक और पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ग राफाएल विदेला (बाएं से तीसरे)
Photo Credit: AFP

1978: अर्जेंटीना की सैन्य सरकार और विवाद

1978 का वर्ल्ड कप अर्जेंटीना में हुआ, जहां उस समय सैन्य शासक और पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ग राफाएल विदेला की तानाशाही चल रही थी. देश में राजनीतिक विरोधियों को गिरफ्तार किया जा रहा था, कई लोगों को यातनाएं दी जा रही थीं और उनकी हत्या तक कर दी जाती थी. जिस स्टेडियम में फाइनल खेला गया, उसके पास ही एक कुख्यात यातना केंद्र भी मौजूद था.

इसके बावजूद फीफा ने टूर्नामेंट वहीं आयोजित किया.

फाइनल में पहुंचने के लिए अर्जेंटीना को पेरू के खिलाफ कम से कम चार गोल से जीत चाहिए थी. लेकिन टीम ने 6-0 से बड़ी जीत दर्ज कर ली. इस नतीजे के बाद यह आरोप लगे कि अर्जेंटीना और पेरू की सैन्य सरकारों के बीच कोई गुप्त समझौता हुआ था. हालांकि इसका कोई ठोस सबूत कभी सामने नहीं आया. अर्जेंटीना बाद में फाइनल जीतकर पहली बार वर्ल्ड चैंपियन बना.

Sheikh Fahd al-Ahmed al-Sabah (C), brother of Emir of Kuwait is pictured during the World Cup football match between France and Kuwait on June 21, 1982

कुवैत के अमीर के भाई, शेख फहद अल-अहमद अल-सबाह (बीच में), 21 जून 1982 को फ्रांस और कुवैत के बीच हुए फुटबॉल वर्ल्ड कप मैच के दौरान मैदान पर पहुंच गए
Photo Credit: AFP

1982: जब एक शेख मैदान में उतर आया

1982 वर्ल्ड कप में फ्रांस और कुवैत के बीच मुकाबले के दौरान एक बेहद अनोखी घटना हुई. फ्रांस ने चौथा गोल किया, लेकिन कुवैत के खिलाड़ियों ने दावा किया कि उन्हें लगा था रेफरी ने पहले ही सीटी बजा दी थी, इसलिए उन्होंने खेल रोक दिया था.

हैरानी की बात यह रही कि कुवैत की ओलंपिक समिति के अध्यक्ष फहाल अल-अहमद अल जाबेर अल सबह खुद मैदान पर पहुंच गए और रेफरी से गोल रद्द करने की मांग की. रेफरी ने दबाव में आकर गोल रद्द भी कर दिया. हालांकि फ्रांस ने कुछ ही देर बाद फिर गोल कर मैच 4-1 से जीत लिया. यह घटना आज भी वर्ल्ड कप इतिहास की सबसे विवादित घटनाओं में गिनी जाती है.

Trump

Photo Credit: AFP

ट्रंप और बालोगुन का मामला क्यों चर्चा में है?

2026 वर्ल्ड कप में अमेरिकी स्ट्राइकर फोलारिन बालोगुन को रेड कार्ड मिलने के बाद उन पर एक मैच का स्वतः प्रतिबंध लगा था. लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की फीफा अध्यक्ष जियानी इन्फेंटिनो से बातचीत के बाद फीफा ने उस बैन को फिलहाल एक साल के लिए टाल दिया. इस फैसले ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि क्या दुनिया के सबसे बड़े फुटबॉल टूर्नामेंट में राजनीति का असर आज भी खत्म नहीं हुआ है.

इतिहास बताता है कि 1934 से लेकर 2026 तक कई बार नेताओं, सरकारों और सत्ता ने वर्ल्ड कप को सिर्फ खेल नहीं, बल्कि अपनी ताकत दिखाने के मंच के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश की है.

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