हिमालय का इलाका जड़ी-बूटी के दुर्लभ खजाने से भरा पड़ा है.इसी में एक औषधि सालम पंजा है. आयुर्वेद और यूनानी चिकित्सा पद्धति में इसे जीवन शक्ति और शारीरिक ताकत बढ़ाने वाला एक महाऔषधि माना गया है. पुरुषों और महिलाओं की शारीरिक व यौन दुर्बलता को दूर करने, टेस्टोस्टेरोन बढ़ाने और रोग प्रतिरोधक क्षमता इम्यूनिटी को मजबूत करने में इस औषधि का इस्तेमाल होता है.घास के ऊंचे मैदानों बुग्यालों और नम पत्थरों के बीच यह प्राकृतिक तौर पर उगता है. नेपाल में इसे पंचौले कहा जाता है.
हिमालयन गोल्ड कीड़ा जड़ी की तरह दुर्लभ
हिमालयन गोल्ड कीड़ा जड़ी की तरह सालम पंजा भी एनर्जी, स्टेमिना और यौन स्वास्थ्य के लिए बेहतरीन मानी जाती है. इसको सालम पंजा या सालम मिश्री भी कहते हैं. हिमालय की ऊंची बर्फीली पहाड़ियों में भारत, नेपाल और चीन की सीमा के बीच तस्कर इसकी तलाश में रहते हैं. कीड़ा जड़ी (Keeda Jadi) की तरह ये भी काफी महंगी है.
सेंटर फॉर एरोमैटिक प्लांट्स देहरादून में एग्रोनॉमी के डायरेक्टर डॉ. नृपेंद्र चौहान ने कहा कि यह ढाई हजार मीटर से ऊपर पहाड़ी इलाके की एक बहुत ही बहुमूल्य औषधि पौधा है लेकिन यह भारत में प्रतिबंध है और इसकी वजह यही है कि इसको बहुत तेजी से लोगों ने ढाई हजार मीटर या उससे ऊपरी क्षेत्रों में जाकर इसको निकला है जिससे यह विलक्ति के कगार पर आ गया है.
सालम पंजा के फायदे
सलाम पंजा आयुर्वेदिक दावों में इस्तेमाल किया जाता है. ज्यादातर इसका इस्तेमाल पुरुषों के स्पर्म यानी वीर्य को बढ़ाने के लिए उपयोग में लाया जाता है। भारत में तो यह प्रतिबंध है लेकिन नेपाल या फिर अन्य हिमालय देश से इसको एक्सपोर्ट किया जाता है। ढाई हजार मीटर से ऊपरी वाले क्षेत्र के लिए इकोलॉजिकल सिस्टम में यह महत्वपूर्ण पौधा है और दवाइयां के मामले में भी यह बहुत ही महत्वपूर्ण पौधा है लेकिन यह आज विलुप्ति के कगार पर है.
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सालम पंजा क्या है
सालम पंजा जंगली ऑर्किड पौधे की जड़ होती है. जब इसे सालम पंजा को सुखाकर इसका वजन कम किया जाता है. चीनी पारंपरिक चिकित्सा पद्धति में इसका इस्तेमाल होता है. गोक्षुर, कौंच के बीच जैसे अन्य औषधियों से ये काफी अलग है.
जड़ी-बूटी शोध संस्थान की नजर
उत्तराखंड वन विभाग, जड़ी-बूटी शोध संस्थान गोपेश्वर और भारतीय वन्यजीव संस्थान देहरादून इस जड़ी बूटी को संरक्षित करने में काम कर रहा है. उत्तराखंड सरकार इसके अंधाधुंध दोहन को प्रतिबंधित कर चुकी है. उत्तराखंड का जड़ी-बूटी शोध संस्थान (HRDI) और वन विभाग इसके संरक्षण और कृत्रिम रूप से (पॉलीहाउस में) उगाने के विकल्पों को लेकर अनुसंधान कर रहे हैं.
उत्तराखंड में सालम पंजा कहां पाया जाता है
हिमालय में बेहद ऊंचाई वाले बर्फीले इलाके में समुद्र तल से 8000 से 12000 फीट की ऊंचाई पर ये प्राकृतिक तौर पर उगता है. उत्तराखंड में पिथौरागढ़ में धारचूला, मुनस्यारी, चमोली की नीति माणा घाटी, फूलों की घाटी के ऊपरी इलाकों में यह पाई जाती है.उत्तरकाशी में हर्षिल घाटी दयारा बुग्याल के ऊपरी क्षेत्र में ये मिलती है. बागेश्वर के पिंडारी ग्लेशियर क्षेत्र में भी यह पाई जाती है.
भारत, नेपाल और चीन के बीच तस्करी
इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (IUCN) की रेड लिस्ट में सलाम पंजा को शामिल किया गया है. यानी ये गंभीर रूप से लुप्तप्राय औषधि की श्रेणी में शामिल है. भारत और नेपाल दोनों ही देशों में जंगलों से इसे उखाड़ना, बेचना या निर्यात करना बैन है. फिर भी भारी मांग के कारण इन तीन हिमालयी देशों के बीच इसकी तस्करी होती है.
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तस्कर उत्तराखंड धारचूला, मुनस्यारी या नेपाल के ग्रामीणों को लालच देकर इसे जंगलों से उखड़वाते थे. तस्कर पिथौरागढ या नेपाल की खुली दुर्गम पहाड़ियों के रास्ते तिब्बत चीन में पहुंचाने की फिराक में रहते हैं. हालांकि इस पर काफी हद तक रोक लगी है. तस्करी के बाजारों में ये लाखों रुपये में बिकती है. ट्रैफिक(The Wildlife Trade Monitoring Network) और साइट्स (Convention on International Trade in Endangered Species) भी इसकी तस्करी पर निगरानी रखते हैं.
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