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FIFA World Cup 2026: चार बार का चैंपियन जर्मनी कैसे खोता गया अपना वैभव, कैसे पराग्वे ने दिखाया बाहर का रास्ता

अमित कुमार कड़वासरा
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    जून 30, 2026 16:50 pm IST
    • Published On जून 30, 2026 16:50 pm IST
    • Last Updated On जून 30, 2026 16:50 pm IST
FIFA World Cup 2026:  चार बार का चैंपियन जर्मनी कैसे खोता गया अपना वैभव, कैसे पराग्वे ने दिखाया बाहर का रास्ता

पराग्वे ने आज जर्मनी के खिलाफ पेनल्टी शूटआउट जीतकर असंभव को संभव कर दिखाया. जर्मनी ने इससे पहले वर्ल्ड कप में पेनल्टी शूटआउट में कभी हार का सामना नहीं किया था. वो केवल चार बार जीते ही नहीं थे, बल्कि उन्होंने 18 में से 17 पेनल्टी को स्कोर में भी बदला था. पूरे रिकॉर्ड की बात करें तो जर्मन नेशनल टीम ने 1976 के बाद से किसी भी पेनल्टी शूटआउट में हार का सामना नहीं किया था. इसलिए पराग्वे की यह जीत ना केवल उनके टूर्नामेंट में आगे बढ़ने की एक घटना है, ये जीत एक ऐतिहासिक रिकॉर्ड टूटने की घटना भी है. लेकिन हम यहां बात करेंगे जर्मनी के फुटबॉल स्तर की. एक ऐसी टीम जो अपने अतीत की सफलता में फंसी हुई वर्तमान में अपनी पहचान खो रही है.

अर्श से फर्श पर कैसे पहुंची जर्मनी

जब 2014 में जर्मनी ने एक भी मैच बिना हारे वर्ल्ड कप का खिताब अपने नाम किया था, तब किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि अगले दो वर्ल्ड कप 2018 और 2022 में जर्मनी ग्रुप स्टेज में बहार निकल जाएगी. साल 2026 में जर्मनी ग्रुप स्टेज से बाहर तो निकली, लेकिन पहले ही नाकआउट मुकाबले में पराग्वे से हार गई. जिस पराग्वे को टूर्नामेंट के अपने पहले मैच में अमेरिका से 4-1 से बड़ी हार का सामना करना पड़ा था. पिछले तीन वर्ल्ड कप जर्मनी के लिए कितने शर्मनाक रहे हैं, यह उनका इतिहास बताता है. साल 1954 से 2014 तक जर्मनी ने 16 वर्ल्ड कप टूर्नामेंट में 12 बार सेमीफाइनल या उससे आगे का सफर तय किया था. बाकी चार टूर्नामेंट में क्वार्टरफाइनल तक का सफर किया था.

चार बार की चैंपियन जर्मनी इस वर्ल्ड कप में बहुत सारी उम्मीदों के साथ उतरी थी. उन्होंने ग्रुप स्टेज में 10 गोल स्कोर किए जो की इस टूर्नामेंट में सबसे ज्यादा थे. लेकिन ग्रुप स्टेज के तीसरे मैच में उनको इक्वाडोर से 2-1 से हार मिली. ग्रुप स्टेज में उनकी सबसे बड़ी खामी जो सामने आई थी वो थी टीम का डिफेन्स. उनको तीन मैचों में एक भी क्लीन शीट नहीं मिली थी. उन्होंने तीनों मैचों में एक-एक गोल खाए थे. इस मैच में भी यह देखने को मिला कि जब जर्मनी के खराब डिफेंस का फायदा उठाकर हुलिओ एनसीसो ने गोल किया. एनसीसो हैडर लगाते वक्त पूरी तरह अनमार्क थे. कोई भी जर्मन डिफेंडर उनके साथ हैडर के लिए संघर्ष नहीं कर रहा था. पहले हाफ में जर्मनी का अटैक भी खराब था. जर्मनी गोल करने का कोई मौका नहीं बना पाई थी. बोस्टन की गर्मी ने भी जर्मन खिलाड़ियों की फिटनेस को चुनौती दी. वो गर्मी से परेशान नजर आए. लेकिन सेकंड हाफ में उनका खेल सुधरा और काई हावेरट्ज के हैडर की बदौलत उन्होंने पराग्वे की बराबरी की. फुल टाइम और फिर एक्स्ट्रा टाइम में भी जर्मन टीम पराग्वे के शानदार डिफेंस को नहीं भेद पाई. मिडफील्ड में कप्तान जोशुआ किमिच के अलावा कोई प्लेयर क्रिएटिविटी नहीं दिखा पाया. मैच पेनल्टी शूटआउट में पहुंचा.

पराग्वे के डिफेंस को क्यों तोड़ नहीं पाया जर्मनी

फुटबॉल में कहावत है, 'फुटबॉल बहुत साधारण खेल है. आप 120 मिनट तक खेलते हैं. फिर जर्मन पेनल्टीज से जीत जाते हैं.' लेकिन इस बार पराग्वे के गोलकीपर ऑर्लैंडो हिल के इरादे कुछ और थे. उन्होंने दो पेनल्टी सेव करने के साथ टीम को 4-3 से जीत दिलाई. पराग्वे ने इस मैच में जो गोल दागा, वो उनके नाकआउट स्टेज का पहला गोल था. अब वो अगले राउंड में फ्रांस का सामना करेंगे. मैच शुरू होने से पहले ही पता था कि पराग्वे डीप डिफेंसिव रणनीति के साथ उतरेगा, फिर भी जर्मनी पराग्वे के डिफेंस को नहीं तोड़ पाई. जर्मनी अगर पेनल्टी शूटआउट जीत भी जाती तो भी फ्रांस के खिलाफ उनका टूर्नामेंट से बाहर जाना तय था. ये बात जर्मनी के फुटबॉल स्तर को दर्शाता है कि किस तरह एक यूरोपियन सुपरपावर का फुटबॉल स्तर गिर चुका है. अब यह सवाल खड़ा होता है कि क्या अब जर्मनी फुटबॉल की वो बड़ी ताकत है भी या नहीं, जो पहले हुआ करती थी. शायद अब दूसरी टीमें वर्ल्ड कप में जर्मनी से डरना छोड़कर बहादुरी से उसका सामना करेंगी. 

विश्व कप फुटबॉल में जर्मनी के खिलाफ मिली जीत का जश्न मनाते पराग्वे के खिलाड़ी.

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Photo Credit: AP

वहीं जर्मनी के सामने बहुत सारे सवाल हैं. मैदान पर हर क्षेत्र में कमजोरी नजर आई. टीम के गोलकीपर मैनुअल नोएर 40 साल के हो चुके हैं. वो 2014 वर्ल्ड कप में विनिंग टीम का हिस्सा थे. लेकिन अब उनका खेल उच्च स्तर का नहीं रहा है. जर्मनी को अब नए बेहतरीन गोलकीपर की तलाश रहेगी. मिडफील्डर किमीच और इस मैच के गोल स्कोरर हावेर्ट्ज के अलावा कोई भी खिलाड़ी टीम में ऐसा नहीं है जिसने क्लब लेवल पर अपने आप को साबित किया हो. जबकि 2014 में कीपर नोएर, डिफेंस में मैट्स हेमल्स, जेरोम बोएटांग, फिलिफ लाहम और मिडफील्ड में टोनी क्रूस, मेसुत ओजिल और बास्टियन श्वाइनस्टाइगर जैसे टॉप क्लास खिलाड़ी थे. वही इस वर्ल्ड कप में मेसी के रिकॉर्ड तोड़ने से पहले वर्ल्ड कप हिस्ट्री के टॉप स्कोरर मिरलोस क्लोस जैसा स्ट्राइकर और वर्सेटाइल फॉरवर्ड थॉमस मुलर भी टीम में थे.

बिना सितारों वाली जर्मन टीम

जर्मन फुटबॉल इन सितारों की खाली जगह भरने में पूरी तरह असफल रहा है. साल 2018 के बाद से जर्मनी की फुटबॉल रैकिंग कभी भी रैंक 9 से ऊपर नहीं गई है. ना ही यूरोपियन टूर्नामेंट में जर्मनी ने अच्छा खेल दिखाया है. कोच जूलियन नागेलस्मन पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं. उनके कमान संभालने के बाद 2022 वर्ल्ड कप की तुलना में टीम ने एक कदम आगे जरूर बढ़ाया है.लेकिन खेल में कोई सुधार नहीं है. उनकी और टीम की सोच में कितना बड़ा अंतर है, यह इस बात से पता चलता है कि ग्रुप स्टेज के लास्ट मैच में हार के बाद कोच नागेलस्मन ने कहा मैच में मेरे खिलाड़ियों ने अपना शत-प्रतिशत दिया, वहीं जर्मनी के कप्तान किमीच ने कहा कि आज सामने वाली टीम के खिलाड़ी हमसे से ज्यादा जीतना चाहते थे. टीम का विजन और मैसेज स्पष्ट नहीं हो पाना भी टीम को भारी पड़ रहा है. टीम पुराने सुपरस्टार की जगह नहीं भर पाई है, इसका एक मुख्य कारण टॉप जर्मन क्लब बायर्न म्यूनिख की अकादमी से पिछले कुछ समय में अच्छे खिलाड़ी आना बंद हो गए हैं. दूसरी जगह से अच्छे खिलाड़ी तैयार करने में जर्मन फुटबॉल सफल नहीं रहा है. इसीलिए 2014 के बाद टीम में बदलाव का समय टीम के लिए अच्छा नहीं रहा है.

जर्मन फुटबॉल के सामने यह कड़ी चुनौती रहेगी कि किस तरह इस संकट के समय से बाहर निकले. इसकी तरफ पहला कदम तो शायद उठा भी लिया गया है. जर्मन फुटबॉल टीम के कोच को बदलकर सफल कोच यर्गन क्लॉप को लाने की सोच रहा है. जर्मन फुटबॉल को इन परिस्थितियों से जल्द बाहर इसलिए भी निकलना चाहिए कि कहीं उनकी स्थिति भी चार बार की चैंपियन इटली जैसी ना हो जाए. इटली पिछले तीन बार से वर्ल्ड कप के लिए क्वालीफाई नहीं कर पाई है. वह 2006 में वर्ल्ड कप जीतने के बाद से एक बार भी नाकआउट स्टेज तक नहीं पहुंच पाई है. साल 2006 के बाद से केवल एक वर्ल्ड कप मैच जीत पाई है. एक और यूरोपीय टीम स्पेन भी 2010 में वर्ल्ड कप जीतने के बाद से एक भी नाकआउट मैच नहीं जीता है. जर्मनी को इनसे सबक लेकर कड़े कदम उठाने की जरूरत है. उन्हें जल्द ही अपनी पहचान फिर से बनानी पड़ेगी, इसके बाद ही वो वर्ल्ड फुटबॉल में सुपरपावर का पद वापस हासिल कर पाएंगे.

(डिस्क्लेमर: लेखक फ्रीलान्स राइटिंग और स्पोर्ट्स कंटेंट क्रिएशन के क्षेत्र में पिछले छह साल से काम कर रहे हैं. उनकी दिलचस्पी क्रिकेट और फुटबॉल जैसे खेलों को फॉलो करने के साथ-साथ खेल और खिलाड़ियों का विश्लेषण करने में रही है. इस लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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