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न नान है, न खट्टा है… फिर नाम ‘नान खटाई’ क्‍यों? जानिए इस मशहूर बिस्किट की दिलचस्प कहानी

Why Called Naan Khatai: नान खटाई भारत का लोकप्रिय देसी बिस्किट है, जिसकी जड़ें फारस से जुड़ी मानी जाती हैं. फारसी भाषा के ‘नान’ और ‘खटाई’ शब्दों से बना ये नाम भारत में आकर मशहूर हुआ. सूरत की पुरानी बेकरी से शुरू हुई इसकी कहानी आज हर घर की चाय तक पहुंच चुकी है.

न नान है, न खट्टा है… फिर नाम ‘नान खटाई’ क्‍यों? जानिए इस मशहूर बिस्किट की दिलचस्प कहानी
Nankhatai Name Origin: चाय वाले बिस्किट की दिलचस्प कहानी. ( AI Image)

Why Called Naan Khatai: भारत में शायद ही कोई ऐसा हो जिसने कभी नान खटाई ना खाई हो. भारत में आपको बाजारों में साइकिल या फिर ठेले पर प्लेट में रखे हुए ये सफेद रंग के बिस्कुट खूब देखने को मिल जाएंगे. इनको अमूमन लोग चाय के साथ खाना पसंद करते हैं. इसका मीठा स्वाद और कुरकुरापन मुंह में जाकर घुल जाता है. यही वजह है कि ये बच्चों से लेकर बड़ों तक सभी को खूब पसंद आता है.

लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर इसका नाम ‘नान खटाई' कैसे पड़ा? क्योंकि ना तो इसका स्वादा खट्टा है और ना ही ये नान से मेल खाता है जो इसको ये नाम दिया जाए. इसलिए इसके नाम के पीछे की सबसे मजेदार बात ये है कि इसमें न तो ‘नान' होता है और न ही कोई ‘खटाई'. फिर भी इसका नाम ऐसा कैसे पड़ा नान-खटाई. तो आपको बता दें कि इसकी कहानी बेहद दिलचस्प है.

नान खटाई का इतिहास: इसे नान खटाई क्यों कहते हैं? | Nankhatai Name Origin | Nankhatai History

कैसे पड़ा नानखटाई नाम?

आज के समय में हर भारतीय के घर तक पहुंचने वाली इस नान खटाई के तार भारत से नहीं बल्कि फारस यानी आज के ईरान से जुड़े पाए जाते हैं. फारसी भाषा में ‘नान' का मतलब होता है ब्रेड या बेकरी से बनी चीज और ‘खटाई' शब्द का इस्तेमाल एक तरह के बिस्किट के लिए किया जाता था. इस तरह ये बना ब्रेड (रोटी) वाला बिस्कुट. 

कैसे बनी थी नान खटाई...

कहा जाता है कि 16वीं सदी में डच लोग भारत पहुंचे थे तो वो अपने साथ चाय के साथ खाने वाले पसंदीदा नाश्ते को लेकर आए थे जो अंडे औऱ ताड़ी के साथ कई दूसरी सामग्रियों को मिलाकर बनाया जाता था. उनके इस नाश्ते के चलते एक डच कपल ने सूरत बंदरगाह शहर पर एख बैकरी खोली. जो कि लोगों के पास काफी फेमस भी हुई. लेकिन उनके जाने के बाद हालात बदल गए. 

इसके बाद ये बेकरी ईरानी कर्मचारी डोटीवाला ने संभाल लिया, लेकिन उस बेकरी में बिकने वाले बिस्कुट का स्वाद अरबों और भारतीयों को नहीं पसंद आया. फिर बेकरी में रोटी ( ब्रेड) बेची जाने लगी, लेकिन यह भी बेकरी के लिए फायदेमंद साबित नहीं हुआ. अब बची हुई ब्रेड कुरकुरी हो जाती थी, तो लोग उसे चाय में डुबोकर खाते थे.

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जिसके बाद डोटीवाला को एक नया विचार आया, जिससे ये नानखटाई तैयार हुई. डोटीवाला ने ताड़ी और अंडे को हटाकर, सामग्री को कम करते हुए केवल गेहूं का आटा, चीनी और मक्खन, और थोड़ी सी इलायची जैसे मसालों को मिलाकर बिस्कुट तैयार करना शुरु किया. और इस तरह नानखटाई अस्तित्व में आई. इसका स्वाद काफी बेहतर हो गया. यही धीरे-धीरे नान खटाई के रूप में मशहूर हो गई.

आज के समय में खटाई सिर्फ पुराने जमाने का एक बिस्किट नहीं है, बल्कि ये एक तरह का नॉस्टेल्जिया बन चुकी है. रेलवे स्टेशन, लोकल बेकरी, शादी-ब्याह या घर की चाय, हर जगह आप इसको पा सकते हैं. .

बता दें कि समय के साथ इसको बनाने के तरीके बदले, लेकिन इसका नाम वहीं रहा. इसलिए अगली बार जब आप चाय के साथ नान खटाई खाएं, तो सिर्फ उसका स्वाद ही नहीं बल्कि उसके पीछे छिपी ये कहानी भी जरूर याद करें.

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(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)

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