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This Article is From Jul 15, 2025

जलेबी की तरह ही घुमावदार है उसका इतिहास, जानिए कैसे मीलों लंबा सफर तय तक बनी हमारी फेवरेट

Jalebi ka Itihaas: यह कहानी है उस जलेबी की जो सर्दियों की सुबह में अखबार और चाय के साथ आती है, जो मेले में बच्चों के हाथ में झूलती है, और जो मोहल्ले की मिठाई की दुकान में “भैया, गरम दे देना” कहकर ज़रूर मांगी जाती है. तो चलिए जानते हैं उस जलेबी के बारे में, जिसने स्वाद ही नहीं बल्कि रिश्तों को भी पक्का किया है.

जलेबी की तरह ही घुमावदार है उसका इतिहास, जानिए कैसे मीलों लंबा सफर तय तक बनी हमारी फेवरेट
Jalebi History: जलेबी की तरह घुमावदार है उसका इतिहास.

Jalebi History: सुनहरा रंग और अंदर से मीठी चाशनी से भरी, बाहर के क्रिस्पी और मुंह में जाते है एक मिठास के साथ मुंह में घुल जाने वाली दिखने में टेढ़ी लेकिन हमारे दिल को भाने वाली जी हां, हम बात कर रहे हैं जलेबी की जो जिंदगी की उलझनों की तरह की गोल घूमी हुई है. कभी आपने सोचा है कि आखिर जलेबी का आकार ऐसा क्यो बनाया गया. इसको तो किसी भी आकार में बनाकर खाया जा सकता है. ये जलेबी कहीं ना कहीं हमे सिखाती है कि भले कि जिंदगी में जितने भी मोड़ आएं लेकिन आखिर में स्वाद मीठा ही होगा. जब बी बात जलेबी की आती है तो हम अपने बचपन के उन दिनों में खो जाते हैं जब इसको सिर्फ छुट्टियों वाले दिन ही खाया जाता था. या तब खाया जाता था जब घर पर कोई खास मेहमान आए या कोई खुशी सेलीब्रेट की जाए.  जलेबी सिर्फ एक मिठाई नहीं, बल्कि बचपन की धूप, दादी की थाली, और शादी की हल्दी वाली सुबह की एक भावनात्मक परत है, जिससे हम सभी कभी ना कभी गुजरे हैं.

यह कहानी है उस जलेबी की जो सर्दियों की सुबह में अखबार और चाय के साथ आती है, जो मेले में बच्चों के हाथ में झूलती है, और जो मोहल्ले की मिठाई की दुकान में “भैया, गरम दे देना” कहकर ज़रूर मांगी जाती है. तो चलिए जानते हैं उस जलेबी के बारे में, जिसने स्वाद ही नहीं बल्कि रिश्तों को भी पक्का किया है. तो जलिए जानते हैं कि कैसे मुगल काल में यह मिठाई दरबारों से निकलकर मंदिरों तक पहुँची, जहाँ इसे प्रसाद के रूप में भी अपनाया गया. आइए जानते हैं जलेबी के इतिहास के बारे में. 

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अक बात तो साफ है कि जलेबी की कहानी सदियों पुरानी है? और ये इसी की तरह घुमावदार भी है. आपको बता दें कि जलेबी सिर्फ भारत की मिठाई नहीं है, इसकी जड़ें दुनिया के दूसरे हिस्सों से भी जुड़ी हैं. प्राचीन मध्य-पूर्व की गलियों में एक मिठाई की खुशबू फैली हुई है. ये जलेबी 10वीं शताब्दी के फारस की है, जहाँ इसे 'जुलाबिया' के नाम से जाना जाता था. ये मिठाई कैसे भारतीयों के दिल पर राज करने लगी, ये सफर इसकी बनावट की तरह ही बड़ा दिलचस्प है!"

जलेबी की शुरुआत

हौब्सन-जौब्सन के अनुसार जलेबी शब्द अरेबिक शब्द 'जलाबिया' या फारसी शब्द 'जलिबिया' से आया है. 'किताब-अल-तबीक़' नाम की किताब में 'जलाबिया' नामक मिठाई का उल्लेख मिलता है जिसका उद्भव पश्चिम एशिया में हुआ था. ईरान में यह 'जुलाबिया या जुलुबिया' के नाम से मिलती है. 10वीं शताब्दी की अरेबिक पाक कला पुस्तक में 'जुलुबिया' बनाने की कई रेसिपीज़ का उल्लेख मिलता है. जैन लेखक जिनासुर की किताब 'प्रियंकरनरपकथा' में भी कुछ इसी तरह की मिठाई का जिक्र है. वहीं 17 वीं शताब्दी की एक पुस्तक 'भोजनकुटुहला' और संस्कृत पुस्तक 'गुण्यगुणबोधिनी' में भी जलेबी के बारे में लिखा गया है.

ऐसा माना जाता है कि मध्यकाल में ये फ़ारसी और तुर्की व्यापारियों के साथ यह मिठाई भारत आई और इसके बाद से हमारे देश में भी इसे बनाया जाने लगा. यूं तो जलेबी को कई लोग विशुद्ध भारतीय मिठाई मानने वाले भी हैं. शरदचंद्र पेंढारकर में जलेबी का प्राचीन भारतीय नाम कुंडलिका बताते हैं. वे रघुनाथकृत ‘भोज कुतूहल' नामक ग्रंथ का हवाला भी देते हैं जिसमें इस व्यंजन के बनाने की विधि का उल्लेख है. भारतीय मूल पर जोर देने वाले इसे ‘जल-वल्लिका' कहते हैं. रस से भरी होने की वजह से इसे यह नाम मिला और फिर इसका रूप जलेबी हो गया.

किन नामों से जानी जाती है जलेबी?

वहीं भारत में अलग-अलग राज्यों में इसे अलग नामों से जाना जाता है. बंगाल में इसे 'चनार'. इंदौर में जलेबा, मध्य प्रदेश में मावा जंबी, हैदराबाद की खोवा जलेबी, आंध्र प्रदेश में इमरती या जांगिरी के नाम से भी जानते हैं.

(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)

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