तन पर बगैर सिला भगवा कपड़ा और पैरों में खड़ाउं पहने अध्यात्मिक गुरु स्वामी दीपांकर जी महाराज बीते 1,200 से अधिक दिनों से गांव, कस्बों और नगरों की यात्रा कर रहे हैं. उनकी यह यात्रा धन और अन्न को इकट्ठा करने के लिए नहीं बल्कि सनातन परंपरा से जुड़े लोगों को एक सूत्र में पिरोने के लिए है. यात्रा के दौरान उनके कदम केवल रास्ते नहीं नाप रहे, बल्कि समाज में समरसता, एकता और जागरूकता का संदेश पहुंचा रहे हैं. आज के दौर में जब अधिकांश लोग सुख-सुविधा का रास्ता चुनते हैं, उन्होंने संकल्प का मार्ग चुना. जहां समाज ने एक असंभव चुनौती देखी, वहां उन्होंने सदियों पुरानी सामाजिक दूरियों को मिटाने का अवसर देखा.
सनातन एकता का है संकल्प
स्वामी दीपांकर भिक्षा यात्रा के दौरान लोगों को जातीय बंधनों से मुक्त होने के लिए संकल्प करा रहे हैं. स्वामी दीपांकर संवाद, आत्मीय संपर्क और समाज के हर वर्ग से भिक्षा ग्रहण करने जैसे सरल किंतु अत्यंत प्रभावशाली माध्यम से उन्होंने उन पूर्वाग्रहों को चुनौती दी है, जिन्हें बहुत से लोग अटल और अपरिवर्तनीय मानते थे.
कुछ ऐसे बही बदलाव की बयार
आज इस परिवर्तन को आंकड़ों में भले न मापा जा सके, लेकिन यह लोगों की सोच में स्पष्ट दिखाई देता है. यह उन युवाओं के मन में दिखाई देता है जो जातिगत पहचान से ऊपर उठकर समाज को देखने लगे हैं. यह उन परिवारों में दिखाई देता है जो पीढ़ियों से चली आ रही सामाजिक दीवारों पर प्रश्न उठा रहे हैं. और यह उस बढ़ती हुई समझ में दिखाई देता है कि एक सशक्त समाज का निर्माण केवल परस्पर सम्मान, भाईचारे और एकता की नींव पर ही संभव है.
इसलिए मौन नहीं मुखर हुआ यह संत
स्वामी दीपांकर जी ने पिछले 1,200 दिनों में लाखों कदम चलकर समाज के सामने परिवर्तन का एक जीवंत उदाहरण प्रस्तुत किया है. आने वाले वर्षों में जब सामाजिक समरसता, जातिगत भेदभाव को समाप्त करने और समाज को जोड़ने के प्रयासों का इतिहास लिखा जाएगा, तब यह भिक्षा यात्रा निश्चित रूप से उसमें एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में दर्ज होगी. जो कभी असंभव प्रतीत होता था, उसकी शुरुआत संभव हुई क्योंकि एक संत ने मौन रहने के बजाय समाज के बीच उतरकर परिवर्तन का संकल्प लिया. स्वामी दीपांकर जी की भिक्षा यात्रा केवल एक यात्रा नहीं है-यह एक जनजागरण है, एक संदेश है, एक मिशन है.
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