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Sant Ki Seekh: भोलेनाथ को आखिर क्यों प्रिय है भस्म? जाने इसे शरीर पर कहां धारण करना चाहिए

सनातन पंरपरा में औघड़दानी कहलाने वाले भगवान शिव की पूजा में भस्म क्यों अर्पित की जाती है? शिव साधक को महादेव की प्रिय भस्म को प्रसाद मानकर अपने शरीर में आखिर कहां धारण करना चाहिए? भस्म का धार्मिक महत्व और महाउपाय विस्तार से जानने के लिए पढ़ें महामंडलेश्वर आचार्य स्वामी भास्करानंद की बड़ी सीख. 

Sant Ki Seekh: भोलेनाथ को आखिर क्यों प्रिय है भस्म? जाने इसे शरीर पर कहां धारण करना चाहिए
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Shiv Puja Me Bhasma Mahatva: सनातन परंपरा में भगवान शिव की साधना के ​लिए सोमवार का दिन सबसे ज्यादा शुभ और फलदायी माना जाता है. यह पूजा तब और भी ज्यादा फलदायी हो जाती है जब आप देवों के देव महादेव को उनकी प्रिय चीज यानि भस्म अर्पित करते हैं. औढरदानी कहलाने वाले भगवान शिव के महाकाल स्वरूप की आरती दुनिया भर में प्रसिद्ध है, जिसमें शामिल होने के लिए लोग दुनिया भर से वहां पर पहुंचते हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर भगवान भोलेनाथ की पूजा में भस्म को आखिर क्यों अर्पित किया जाता है. शिव पूजा में भस्म का क्या धार्मिक महत्व है? महादेव की इस प्रिय भस्म को महादेव का महाप्रसाद मानकर शिव साधक को अपने शरीर पर किन अंगों पर लगाना चाहिए. आइए इसका धार्मिक-आध्यात्मिक महत्व और इससे जुड़े नियम को विस्तार से जानते हैं. 

भोलेनाथ की भस्म का धार्मिक महत्व 

पौराणिक मान्यता के अनुसार चिता की जिस भस्म को भगवान शिव अपने वस्त्र की तरह पूरे शरीर में लपेटे रहते हैं, आखिर उन्हें यह इतना प्रिय क्यों है? इसका पीछे क्या राज है? शिव के द्वारा इस भस्म को धारण करने के पीछे कई कारण है, लेकिन उसमें जो सबसे महत्वपूर्ण है, वह यह है जो आप यह सुंदर सा शरीर लेकर घूम रहे हैं, जिस पर आपको बहुत ज्यादा गुमान है, उसकी अंतिम स्थिति क्या होने वाली है? आपने अपने इस शरीर के जरिये अपने लिए, अपने अपनों के लिए बहुत कुछ अर्जित किया. इसी शरीर से तुमने ढेर सारा पैसा और यश कमाया लेकिन अंत में क्या है, यह पूरा शरीर राख का ढेर हो जाना है. 

नश्वरता और वैराग्य का प्रतीक है भस्म

यही कारण है कि हमारे पूज्य संतों ने सीख दी है कि जिस प्रकार हम एक छोटी सी यात्रा के लिए बहुत सारी तैयारी करते हैं, उसी तरह व्यक्ति को अपनी महायात्रा के लिए भी तैयारी करते रहना चाहिए. अंत में जिस शिवलोक में व्यक्ति को जाना होता है, उस महायात्रा के लिए आपकी क्या तैयारी है? महादेव की यह पवित्र भस्म नश्वरता का प्रतीक है.  भस्म पवित्रता का प्रतीक है. जिस प्रकार आग में जलकर सब कुछ शुद्ध हो जाता है, उसी प्रकार भस्म धारण करने से मन और आत्मा पवित्र होती है.

यह भस्म व्यक्ति उसकी महायात्रा का भान कराते हुए माया-मोह, अभिमान और तमाम पापों से मुक्त कराते हुए आत्मा को पवित्र बनाने का कार्य करती है. गुरु नानक जी ने कहा था कि 'नाम ना जानिया राम का मोहे फिर पाछे पछताए'. कहने का तात्पर्य यह कि यदि राम नाम धन आपके पास नहीं होगा तो आपको अंत समय में पछताने के सिवा कुछ भी नहीं रहेगा. 

शरीर में कहां पर लगानी चाहिए भस्म 

सनातन परंपरा में भगवान ​शिव की प्रिय माने जाने वाली भस्म के बारे में बताया गया है कि जब इसे शिव पूजा में वेद मंत्रों के साथ अर्पित किया जाता है और उसके बाद साधक प्रसाद स्वरूप अपने माथे और बाकी अंगों पर लगाता है तो उसके पुण्य प्रताप से ब्रह्म हत्या जैसा पाप तक दूर हो जाता है. हिंदू मान्यता के अनुसार कोई भी साधक भगवान शिव की पूजा का अधिकारी तभी बनता है जब वह महादेव के इस महाप्रसाद यानि भस्म को अपने शरीर पर प्रसाद स्वरूप लगाता है.

हमारे यहां शास्त्रों में भस्म को 32 जगह पर लगाने की बात कही गई है, लेकिन इसे कम से कम शरीर के पांच स्थान पर अवश्य लगाना चाहिए. शिव साधक को अपने मस्तक, कंठ, दोनों भुजाओं और नाभि समेत पांच जगह पर भस्म अवश्य लगाना चाहिए. मान्यता है कि जो व्यक्ति अपने माथे पर भस्म का त्रिपुंड लगाकर शिव पूजा करता है, वह शिव कृपा से सभी पापों से मुक्त होकर, भगवान शिव का प्रिय बनता है और अंत में शिवलोक को प्राप्त होता है. 

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