Putrada Ekadashi Vrat Katha: आज यानी 23 अगस्त को सावन महीने की पुत्रदा एकादशी का व्रत रखा जा रहा है. पंचांग के अनुसार यह व्रत श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को रखा जाता है. इस दिन भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा करने का विधान है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार संतान सुख और संतान की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि के लिए ये व्रत रखना अत्यंत फलदायी होता है. वहीं, जो दंपति संतान सुख की कामना करते हैं उन्हें यह व्रत विशेष रूप से रखना चाहिए. पुत्रदा एकादशी की पूजा में इस व्रत कथा को बेहद शुभ होता है. माना जाता है कि इस कथा को पढ़े बिना व्रत अधूरा होता है. आइए जानते हैं सावन पुत्रदा एकादशी की व्रत कथा...
पुत्रदा एकादशी की कथा | Putrada Ekadashi Katha
पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन काल में द्वापर युग की शुरूआत में महिरूपति नाम की नगरी हुआ करती थी. इस नगरी में महीजित नाम के राजा का शासन था. राजा का कोई पुत्र नहीं था जिस चलते उसे अपना जीवन सुखदायक नहीं लगता था. अपनी इस उलझन को सुलझाने के लिए और पुत्र प्राप्ति के लिए राजा ने बहुत उपाय किए लेकिन कोई फल नहीं मिला.
एक बार राजा ने सभी ऋषि-मुनियों को बुलाया, सन्यासियों को बुलाया और विद्वानों को एकत्रित किया. राजा ने सभी से पुत्र प्राप्ति के उपाय पूछे. राजा की समस्या सुनने के बाद सभी ने मिलकर राजा को बताया कि उसने अपने पिछले जन्म में सावन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन प्यासी गाय को जल पिलाने से मना कर दिया था. उस गाय ने ही राजा को संतान ना होने का श्राप दिया था. इस चलते ही राजा पुत्र प्राप्ति से हमेशा वंचित रहा. राजा को सभी ने यह सुझाव दिया कि यदि वह सावन की एकादशी पर विधिपूर्वक व्रत करेगा तो उसे श्राप से मुक्ति मिल जाएगी. राजा ने सबकी बात मान ली.
राजा ने पूरे मनोभाव से पुत्रदा एकादशी का व्रत रखा, पूजा संपन्न की और भगवान विष्णु से अपनी मनोकामना कही. इसके बाद राजा की पत्नी गर्भवती हुई और उन्होंने पुत्र को जन्म दिया. माना जाता है कि तभी से संतान प्राप्ति के लिए पुत्रदा एकादशी का व्रत रखा जाने लगा.
Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. एनडीटीवी इसकी पुष्टि नहीं करता है.
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