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पितृपक्ष में एकादशी कब है? जानिए एकादशी पर श्राद्ध का समय और पूजा विधि

पितृपक्ष होने के चलते इंदिरा एकादशी व्रत करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है और भगवान विष्णु की कृपा से पापों से मुक्ति मिलती है. यहां जानिए पितृपक्ष में एकादशी कब है?

पितृपक्ष में एकादशी कब है? जानिए एकादशी पर श्राद्ध का समय और पूजा विधि
एकादशी कब है?
file photo

हिंदू धर्म में एकादशी तिथि बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है. इस दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है. हर महीने दो एकादशी आती है. अक्टूबर के महीने में अभी पितृपक्ष चल रहा है और पितृपक्ष में एकादशी व्रत आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को पड़ता है. पितृपक्ष की एकादशी को इंदिरा एकादशी भी कहा जाता है. पितृपक्ष होने के चलते इंदिरा एकादशी व्रत करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है और भगवान विष्णु की कृपा से पापों से मुक्ति मिलती है. चलिए आपको बताते हैं पितृपक्ष में इंदिरा एकादशी कब है और श्राद्ध के समय के साथ-साथ पूजा विधि.

इंदिरा एकादशी कब है?

एकादशी तिथि प्रारंभ- 6 अक्टूबर 2026 को सुबह 02:07 बजे

एकादशी तिथि समाप्त- 7 अक्टूबर 2026 को रात 12:34 बजे

व्रत पारण का समय- 7 अक्टूबर को सुबह सूर्योदय के बाद

इंदिरा एकादशी पूजा शुभ मुहूर्त

पंचांग के अनुसार, इंदिरा एकादशी के दिन सुबह 11 बजकर 46 मिनट से दोपहर 12 बजकर 33 मिनट तक अभिजीत मुहूर्त रहेगा. अभिजीत मुहूर्त के समय शुभ कार्य किए जा सकते हैं. इसके अलावा सुबह 6 बजकर 17 मिनट से रात 10 बजकर 17 मिनट तक सर्वार्थ सिद्धि योग रहेगा.

एकादशी पर पितरों श्राद्ध कैसे करें?

इंदिरा एकादशी के दिन भगवान विष्णु के साथ-साथ पितरों का श्राद्ध और तर्पण करने का भी विधान है. एकादशी के दिन पितरों की पूजा के साथ-साथ जरूरतमंद लोगों को दान करें. एकादशी तिथि पर उन पूर्वजों का श्राद्ध किया जाता है जिनकी मृत्यु किसी भी महीने के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को हुई हो. मान्यता है कि इस दिन पूजा, दान और भोजन कराने से पितरों का आशीर्वाद मिलता है.

पूजा और श्राद्ध विधि

  • एकादशी के दिन सुबह उठकर स्नान करें. भगवान विष्णु का स्मरण करके व्रत का संकल्प लें.
  • घर में चौकी पर पीला या लाल वस्त्र बिछाकर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की मूर्ति स्थापित करें. उन्हें पीले वस्त्र, ताजे फूल, धूप, दीप और भोग अर्पित करें.
  • इंदिरा एकादशी की व्रत कथा सुनें या पढ़ें और अंत में आरती करें.
  • इसके बाद शुभ मुहूर्तों में अपने पितरों का ध्यान करके तर्पण और पिंडदान करें. ब्राह्मण, गाय, कौवे और कुत्ते के लिए भोजन का अंश निकालें.

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(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. एनडीटीवी इसकी पुष्टि नहीं करता है.)

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