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Muharram 2026: हज़रत अली असग़र (अ.स.) कौन थे? पढ़ें कर्बला के सबसे मासूम शहीद की दास्तां

Hazrat Ali Asghar Story: वह कोई योद्धा नहीं थे, उनके हाथ में तलवार नहीं थी, उनके पास ढाल नहीं थी... वह तो केवल छह महीने के एक मासूम बच्चे थे, जिनकी प्यास ने कर्बला (Karbala) की कहानी को और भी दर्दनाक बना दिया..या ये कहें अली असग़र की शहादत ने करबला को पूरा कर दिया..आज भी जब उनका नाम लिया जाता है, तो आंखें नम हो जाती हैं और दिल भर आता है..

Muharram 2026: हज़रत अली असग़र (अ.स.) कौन थे? पढ़ें कर्बला के सबसे मासूम शहीद की दास्तां
Karbala Ki Kahani: हज़रत अली असग़र (अ.स.) की शहादत
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Ndtv की खास पेशकश करबला की दास्तां में जहां आपने हजरत अली अकबर (Hazrat Ali Akbar), हजरत अब्बास (Hazrat Abbas), हजरत कासिम (Hazrat Qasim) की शहादत के बारे में पढ़ा कि किस तरह भूखे प्यासे इमाम हुसैन के 72 साथी शहीद हो गए थे.. आज जानते हैं उस मासूम 6 महीने के बच्चे हजरत अली असग़र (Hazrat Ali Asghar) की शहादत, जिसे पढ़कर आपकी आंख से आंसू रुक नहीं पाएंगे..इराक के कर्बला में ये ऐसी शहादत थी जिसने इंसानियत को हमेशा के लिए झकझोर दिया..आइए करबला के 72 शहीदों में शामिल हज़रत अली असग़र (अ.स.) की दर्द भरी दास्तां को विस्तार से जानते हैं. 

मासूमियत की तस्वीर

हज़रत अली असग़र (अ.स.) इमाम हुसैन (अ.स.) के सबसे छोटे बेटे थे हजरत अली असग़र की मां जनाबे रबाब थी..उनका चेहरा चांद की तरह खूबसूरत था और उनकी मासूम मुस्कान पूरे ख़ेमे की खुशी थी..

लेकिन कर्बला में यह मासूम बच्चा भी प्यास की सख्त आज़माइश से गुज़रा..

फ़ुरात नहर का पानी बंद कर दिया गया था..

तीन दिन से ख़ेमों में पानी नहीं था..बच्चे, औरतें और बुज़ुर्ग सब प्यास से तड़प रहे थे..उनमें सबसे छोटे 6 महीने के  अली असग़र (अ.स.) भी थे..करबला के शहीदों में बुजुर्ग से लेकर जवान भी थे.. 

प्यास की तड़प

गर्मी बहुत सख्त थी..अली असग़र (अ.स.) के होंठ सूख चुके थे.. उनका छोटा सा गला प्यास से जल रहा था..वह बार-बार करवट बदलते और रोते थे..

एक मां के लिए अपने बच्चे की यह हालत देखना कितना मुश्किल होगा, इसका अंदाज़ा लगाना भी कठिन है..

ख़ेमे में हर तरफ एक ही सवाल था—

क्या इस मासूम को एक घूंट पानी भी नहीं मिलेगा?

मौलाना असलम रिज़वी कहते हैं कि जब 70 साथी शहीद हो गए तो इमामे हुसैन अलैहिस्सलाम (Imam Hussain) ने आशूर के दिन  एक आवाज़ बुलंद की थी कि 'कोई है जो मेरी मदद को आए" तो उस वक्त सब शहीद हो चुके थे.. खै़मे में इमामे हुसैन का 6 महीने का बच्चा अली असग़र था जिसने इस आवाज़ पर लब्बैक कहा और खु़द को झूले से गिरा दिया... यह इस बात की तरफ़ इशारा था कि बाबा मुझे भी मैदान में ले चलिए, मैं भी इंसानियत और इस्लाम की हिफा़ज़त के लिए अपनी जान कु़र्बान कर दूंगा... 

मौलाना कल्बे रुशेद रिज़वी कहते हैं कि अली असग़र का मुंह इस तरह से खुल बंद हो रहा था जैसे पानी से निकल कर मछली तड़प कर मुंह खोलती बंद करती है...

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आखिरी में इमाम हुसैन अपने छह महीने के बच्चे अली असग़र को करबला के मैदान में लेकर आए और दुश्मनों से कहा कि मेरा यह बेटा 3 दिन का भूखा प्यासा है अगर इसे थोड़ा सा पानी पिला दोगे तो तुम्हारे दरिया में कोई कमी नहीं हो जाएगी... इमामे हुसैन अलैहिस्सलाम के इस सवाल पर यज़ीदी लश्कर ने कोई जवाब नहीं दिया तो इमामे हुसैन ने कहा बेटा अली असग़र तुम अपनी जंग शुरू करो जनाबे अली असग़र ने अपनी सूखी हुई ज़बान को सूखे हुए होठों पर फेरना शुरू किया.. यह वह दर्दनाक अंदाज़ था कि पत्थर दिल दुश्मन भी मुंह फेर फेर कर रोने लगे.. यह कहा जा सकता है कि यह अली असग़र की ज़बान नहीं थी बल्कि तलवार थी जो दुश्मनों के दिलों को काट रही थी ...

इमाम हुसैन ने देखा कि जब कोई भी पानी नहीं पिला रहा है तो इमाम हुसैन ने अली असग़र को ज़मीन पर लिटा दिया कि अगर तुम्हे लगता है कि इसके बहाने मैं पानी पी लूंगा तो लो तुम बस इसे पानी पीला दो.. मै पानी नहीं पियूंगा.. लेकिन उसके बाद भी उन ज़ालिम यजीद की फौज पर कोई असर न हुआ.. और पानी न दिया गया..

यज़ीद के लश्कर के कमांडर को यह एहसास हुआ कि अगर इसी तरह से मैदान में अली असगर थोड़ी देर और रह गए तो फौ़ज में बगा़वत हो जाएगी.. इसलिए यजी़द के कमांडर ने जिसका नाम उमर इब्ने साद था उसने हुक्म दिया के हुसैन के इस बेटे को क़त्ल कर दो.. हाकिम का हुक्म सुनते ही इराक का सबसे बड़ा तीरंदाज हुरमुला आया .. और उसने  अली असग़र के गले पर तीर चलाया . और ये तीर भी कोई आम तीर नहीं था.. इस तीर में तीन फल थे, ये उस वक्त में बूढ़े जानवर को मारने के काम आता था, बस इमाम हुसैन के हाथ में अली असग़र थे..

और तभी हुरमुला ने अली असग़र के गले का निशान लिया और तीन फल का तीर चला दिया.. बस जैसे ही तीर अली असग़र के लगा तो उसका एक फल अली असग़र के गले पर था दूसरा इमाम हुसैन के हाथ में लग गया था.. कहा जाता है कि अली असग़र के वजन से ज्यादा तीर का वजन था.. बस जैसे ही तीर अली असग़र के गले पर लगा.. एक खून का उबाल आ गया.. इमाम हुसैन का पूरा हाथ, अली असग़र के खून में रंग गया.. 

इमाम हुसैन ने परवरदिगार से कहा कि ऐ मेरे अल्लाह .. तू गवाह रहना .. तेरी राह में ये मासूम भी आ गया.. और इन जालिमों से इस बच्चे को भी एक बूंद पानी न पिलाया..जिसके बाद 6 महीने का बच्चा इमाम  हुसैन की आग़ेश में शहीद हो गया..  

कैसे एक बाप और मां ने किया सब्र?

इमाम हुसैन (अ.स.) ने अपने खून में लथपथ बच्चे को सीने से लगाया..उनकी आंखों में आंसू थे, लेकिन ज़ुबान पर सब्र था..

उन्होंने अपने बच्चे की शहादत को भी अल्लाह की राह में कुर्बानी समझकर कबूल किया..
यह सब्र और रज़ा की ऐसी मिसाल है जिसकी बराबरी इतिहास में मिलना मुश्किल है..

इमाम हुसैन अली असग़र को खेमों की तरफ लेके जाने लगे.. उन्होंने अपनी अबा में अली असग़र के खून से लथपथ जिस्म को ढक लिया.. रिवायत में है कि इमाम हुसैन पहले 7 कदम आगे आए फिर 7 कदम पीछे.. इमाम हुसैन में हिम्मत ही नहीं हो रही थी कि वो परिवार से कैसे उस बच्चे की शहादत की बात बताए..

बस जैसे ही इमाम हुसैन खेमों में पहुंचे तभी उनकी चार साल की बच्ची जनाबे सकीना ने कहा कि बाबा आप अली असग़र को पानी पिला लाए और मुझे नहीं पिलाया क्यों.. उन्होंने कहा तुम्हे कैसे पता कि अली असग़र ने पानी पी लिया है.. तभी सकीना ने कहा कि बाबा जब बच्चा पानी पी लेता है तभी सुकून से सो जाता है.. और तभी अली असग़र खामोश सो रहा है.. बस इतना था इतने में सभी औरतें आ गई.. चीख पुकार मच गया.. इमाम हुसैन ने अबा हटाई..तो क्या देखा एक नन्हा सा चेहरा .. जो पूरा खून में लथपथ था.. हाय कोहराम मच गया..
हाय अली असग़र 
हाय अली असग़र
कोई दूध पीते बच्चे को भी मारता है क्या...

बस अली असग़र की मां जनाबे रबाब का हाल रो रो के बुरा हो गया.. अभी तो अली असग़र ने दुनिया में कुछ देखा भी न था.. इतने से ही बच्चे को मार दिया.. 

करबला का नन्हा शहीद, जिसका सिर कब्र से निकालकर काटा गया

बस इमाम हुसैन ने बच्चे को लिया और खेमों के पीछे तलवार से एक क़ब्र खोदी..और कब्र खोदकर उस 6 माह के अली असग़र को दफना दिया.. मौलाना कल्बे रूशेद रिज़वी कहते हैं कि जब सब 72 शहीद हो गए तो ज़ालिम की फौज 72 सरों को ढूंढ रही थी लेकिन उन्हें एक सर कम मिला.. तो ज़ालिम की फौज में से एक ने कहा कि मैने देखा था कि इमाम हुसैन किसी को खेमे के पीछे दफना रहे थे..

Muharram 2026: हज़रत क़ासिम (अ.स.) - वह नौजवान जिसने मौत को शहद से भी ज़्यादा मीठा बताया

तभी उन ज़ालिम लोगों ने नैज़ै उठाए और खेमों के पीछे ज़मीन में मारने लगे और एक वक्त वो आया कि जैसे ही जमीन में नेजा (भाला) डाला  तो उसी के साथ अली असग़र का जिस्म भी बाहर आ गया.. और वो नन्हा सा बदन बाहर आने के बाद ज़ालिम ने उस बच्चे का सर काट दिया जिससे 72 सर पूरे उन्हें दिख सके..
हाय जुल्म

अन्याय के खिलाफ सर्वोच्च बलिदान की कहानी है अली असग़र की शहादत

अली असग़र (अ.स.) की शहादत यह बताती है कि कर्बला की लड़ाई सत्ता या दुनिया के लिए नहीं थी..
अगर ऐसा होता, तो छह महीने का एक बच्चा भी इसका शिकार क्यों बनता? उनकी शहादत इस बात की गवाही है कि इमाम हुसैन (अ.स.) सत्य, इंसाफ़ और इंसानियत की रक्षा के लिए खड़े थे..तभी इमाम हुसैन के साथ एक ईसाई जनाबे वहाब, एक अफ्रीकी जनाबे जॉन आदि भी शामिल थे जो सब शहीद हो गए.. मौलाना असलम रिज़वी कहते है कि इस दासतान से नतीजा यह निकलता है कि जो इमामे हुसैन के मुका़बले में आए थे उन का मुसलमान होना तो बहुत दूर की बात है वह इंसान भी नहीं थे...इमाम हुसैन ने कर्बला में अपनी शहादत के ज़रिए  फक्त इस्लाम को नहीं बचाया बल्कि इंसानियत की कश्ती जो यज़ीदियत के भंवर  में डूब रही थी उसे निजात के साहिल तक पहुंचा दिया..

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