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Muharram 2026: कौन थे हज़रत अली अकबर – पैगंबर साहब की सूरत, हुसैन के दिल का सुकून

करबला की जंग में इमाम हुसैन के साथ शहीद होने वाले उन 72 साथियों में आखिर कौन थे हज़रत अली अकबर (अ.स.), जिन्होंने यज़ीद की सेना के खिलाफ इस्लाम को बचाने के लिए अपनी जान कुर्बान करना कुबूल तो किया लेकिन उसके सामने घुटने नहीं टेके, जानने के लिए पढ़ें 'शबीह-ए-पैगंबर' की अनसुनी दास्तां

Muharram 2026: कौन थे हज़रत अली अकबर – पैगंबर साहब की सूरत, हुसैन के दिल का सुकून
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कर्बला के 72 शहीद (भाग–1) : कर्बला सिर्फ़ एक जंग का नाम नहीं, बल्कि हक़ और इंसाफ़ के लिए दी गई महान कुर्बानियों की दास्तां है..इराक के कर्बला में मोहम्मद साहब के नवासे समेत 72 साथियों को तीन दिन का भूखा प्यासा शहीद कर दिया गया था, जिनमें एक 6 महीने का बच्चा अली असग़र भी था..जो मोहर्रम महीने की 10 तारीख यानी आशूर के दिन कर्बला में शहीद हुए थे. NDTV आपको उन महान 72 शहीदों के बारे में एक एक करके बताएगा जिन्होंने ज़ुल्म के खिलाफ आवाज उठाई और उन्होंने मौत को गले लगाना आसान समझा न की दुश्मन के सामने झुक जाना..

आइए शुरुआत करते हैं उस जवान से, जिसे देखकर लोगों को रसूल-ए-अकरम (स.अ.व.) की याद आ जाती थी जिनका नाम था हज़रत अली अकबर (अ.स.)

कौन थे हज़रत अली अकबर (अ.स.)?

हज़रत अली अकबर (अ.स.) इमाम हुसैन (अ.स.) के 18 साल के बेटे थे इतिहास में उनका ज़िक्र एक ऐसे नौजवान के रूप में मिलता है, जो शक्ल, सीरत, किरदार और बातचीत में सबसे ज़्यादा पैगंबर मुहम्मद (स.अ.व.) से मिलते थे...जब भी रसूल के परिवार वालों को पैग़म्बर साहब की याद आती थी तो वो अली अकबर का चेहरा देख लिया करते थे.. वो बहुत ही ज्यादा खूबसूरत थे..
जिन्हें देखकर लोग भी सुकून पाते थे..इसी वजह से उन्हें शबीह ए पैगम्बर भी कहा जाता था..हजरत अली अकबर के पिता इमाम हुसैन और मां हजरत लैला था.. वो बचपन से अपनी फूफी जनाबे ज़ैनब सअ के पास रहे थे उनके बहुत चहिते थे.. उनकी परवरिश उनकी मां के साथ साथ उनकी फूफी ने भी की...

कैसे हुई थी अली अकबर की दर्दनाक शहादत?

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61 हिजरी के मोहर्रम महीने की 7 तारीख से यजीद की फौज ने करबला में इमाम हुसैन और उनके साथियों के लिए पानी रोक दिया था..जिसके बाद से इमाम हुसैन के साथ काफिले में सभी बच्चे, जवान बुजुर्ग सब गर्मी में प्यास की शिद्दत से जूझ रहे थे.. बच्चे अपने खेमे में आवाज बुलंद कर रहे थे और कह रहे थे अल लतश अल लतश यानी हाय प्यास , हाय प्यास 

उन मासूम बच्चों की इस पुकार तक को यजीद की फौज ने नज़र अंदाज कर दिया..7 मोहर्रम से लेकर 10 मोहर्रम आ जाती है.. और सभी काफिले में लोग भूखे प्यासे गर्मी में तड़प रहे थे..
10 मोहर्रम की सुबह से यजीद की फौज ने ईमान हुसैन के खेमों पर हमला करना शुरू कर दिया.. जिसके बाद इमाम हुसैन के बेटे हजरत अली अकबर ने जंग में जाने की इजाजत मांगी..

अकबर तुम्हे मालूम है क्या मांग रहे हो

एक बाप से मरने की रज़ा मांग रहे हो

इमाम हुसैन ने कहा कि मेरे लाल अली अकबर.. तुम तो मेरी आँखों के नूर हो.. रौशनी हो.. तुम्हे कैसे में जंग की इजाजत दे दूं.. तुम्हे देखकर तो मैं अपने नाना हजरत मोहम्मद मुस्तफा सअ को याद करता हूँ, सुकून पाता हूं.. तब अली अकबर ने कहा कि बाबा काफिले के कई साथी मारे गए..इस्लाम को बचाने की खातिर बाबा मुझे इजाजत दीजिए.. अब मुझे दिखाने दीजिए कि मैं आपका बेटा हु, हजरत अली का पौता हूं...हम अल्लाह की राह पर हैं... तभी इमाम हुसैन ने कहा कि अल्लाह तुम्हे कामयाब करे.. जाओ अपनी मां और अपनी फूफी जनाबे ज़ैनब से इजाजत मांग लो.. बस जैसे ही अली अकबर ने जंग में जाने की इजाजत मांगी तो चीख पुकार मच गई.. हाय अली अकबर.. कैसे तुम्हे जंग में जाने दें..तुम तो हमारा सुकून को.. तुम्हारी बहन जनाबे सुघरा तुम्हारा मदीने में इंतजार कर रही है..वो तुम्हारे सर पर शादी का सेहरा देखना चाहती है अली अकबर, वो मर जाएगी अली अकबर अगर तुम्हें कुछ हो गया तो हमारी जान...

बस जब अली अकबर ने देखा कि इजाजत नहीं मिल पा रही तो फूफी और मां से कहा कि बाबा इमाम हुसैन पहले है या मैं..क्या मेरे होते हुए बाबा को कुछ हो जाए आप देखेंगे.. बस इतना कहना था जनाबे ज़ैनब ने कहा कि अपने भाई इमाम हुसैन पर मेरी औलाद कुर्बान, अपने भाई के लिए में सब कुर्बान कर दूं.. जाओ अली अकबर..इजाजत है मेरे लाल.. अल्लाह की राह के लिए हमेशा कुर्बान

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जिसके बाद हजरत अली अकबर को जंग करने की इजाजत मिल गई.. 

इमाम हुसैन ने हजरत अली अकबर को जंगी लिबास अपने हाथों से पहनाया.. उन्हें तैयार किया.. और घोड़े पर सवार किया..

जिसे ही अली अकबर मैदान में पहुंचे तो पहले उन्होंने ललकार दी.. और हक बयान किया.. उन्होंने कहा कि क्या तुम सब के आंखों में परदा पढ़ गया है जो रसूल के खानदान को मारना चाहते हो.. उन इमाम हुसैन को मारना चाहते हो जिसने रसूल की पीठ पर झुला झूला है.. जिन्हें खुद रसूल ने कहा है कि उनके नवासे इमाम हसन हुसैन जन्नत के सरदार है .

तुम किस यजीद को अपना मान रहे हो जिसे इस्लाम का दूर दूर तक ज्ञान नहीं.. जो जुल्म करने वाला.. जो महिलाओं बच्चों पर पानी बंद कर रहा है.. 

इतना सब कहने पर भी यजीद की फौज पर कोई असर नहीं हुआ जिसके बाद यजीद की फौज ने जंग में अली अकबर का मुकाबला करने के लिए सैनिक भेजने लगे, अली अकबर ने एक से बढ़कर एक ताकतवर सैनिक को मार गिराया.. जब देखा यजीद की फौज ने की एक के मुकाबले में एक में हम शिकस्त खा रहे हैं तो चारों तरफ से घेर कर हमला शुरू करने लगे .. जिसके बाद भी अली अकबर ने जमकर मुकाबला किया... लेकिन तभी एक ज़ालिम ने एक ऐसी बरछी अली अकबर के सीने  में मारी की वो सीधा घोड़े से जमीन पर आ गाए, जिसके बाद यजीद की फौज ने तलवार से हमला कर दिया . तभी अली अकबर ने बाबा को आवाज दी..

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इमाम हुसैन दूर से अली अकबर को देख रहे थे लेकिन जैसे ही अली अकबर घोड़े से जमीन पर गिरे उसी के बाद से इमाम हुसैन का नूर सा चला गया.. वो तनहा अकेले गिरते गिरते अली अकबर के पास पहुंचे तो देखा कि अली अकबर के सीने में बरछी लगी हुई है . अली अकबर की साँसे बची थी.. अली अकबर ने कहा कि बाबा सीने से बरछी निकाल दीजिए.. बहुत दर्द कर रही है.. बस इतना था.. इमाम हुसैन ने एक हाथ से बरछी पकड़ी एक हाथ जमीन पर रखा.. जैसे ही बरछी निकाली.. उसी के साथ कलेजा भी अली अकबर का बाहर आ गया... ज़ख़्मों से पूरे अली अकबर का बदन ज़ख़्मी था.. एक बाप के सामने 18 साल के जवान बेटे की लाश, इमाम हुसैन ने सीने से लगाया...हाय मेरी आँखों का नूर, हाय मेरे दिल का सुकून...

हाय अली अकबर ...

जिसके बाद अली अकबर का लाशा इमाम हुसैन कैसे गर्मी की हालत में तनहा उठा कर खेमे तक लाये होंगे.. और जैसे ही खून में लथपथ लाशा खेमों में आया, एक चीख पुकार, रोना पीटना मच गया.. 

मां सदा देने लगी हाय अली अकबर ,उठ जा अली अकबर
पहले तो एक आवाज में उठ जाते थे बेटा 

अब इतनी सदाओं पर भी पहलू नहीं बदला

क्या हो गया दिलबर
हाय हाय अली अकबर 
क्यों रूठे हो दिलबर
हाय हाय अली अकबर

क्या सिखाया अली अकबर की शहादत ने?

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हज़रत अली अकबर (अ.स.) की उम्र 18 साल की थी लेकिन उनकी बहादुरी, सब्र और कुर्बानी ने इतिहास बदल दिया.. उन्होंने साबित कर दिया कि हक़ के लिए कोई भी उम्र छोटी नहीं होती....प्यास, घाव सब सह लो, लेकिन सच्चाई हक़, दीन से समझौता मत करो... जब भी ज़ालिम आगे बड़े तो उसका डट कर मुकाबला करो चाहे जान ही क्यों न चले जायें

अली अकबर (अ.स.) ने अल्लाह की राह में अपनी जान कुर्बान कर दी.. उनकी शहादत सिर्फ़ एक बेटे की मौत नहीं थी, बल्कि हक़ और इंसाफ़ के लिए एक जवान की सबसे बड़ी कुर्बानी थी..

वहीं अगर इमाम हुसैन अस चाहते तो यजीद से हाथ मिला सकते थे लेकिन उन्होंने जिल्लत की जिंदगी से बेहतर इज़्ज़त की मौत को इंपोर्टेंस दी

और उस यजीद शासक से हाथ मिलाना कबूल नहीं किया..

आज का संदेश

हज़रत अली अकबर (अ.स.) हमें सिखाते हैं कि उम्र छोटी हो या बड़ी, अगर मक़सद सच्चा हो तो इंसान इतिहास में अमर हो जाता है..उनका सब्र, उनकी बहादुरी और उनका ईमान आज भी दुनिया के युवाओं के लिए मिसाल है..

अगली कड़ी में...

अगले भाग में हम कर्बला के उस वफ़ादार अलमदार की कहानी पढ़ेंगे, जिनकी बहादुरी आज भी वफ़ा की सबसे बड़ी मिसाल मानी जाती है जिसने अपने दोनों बाज़ू कंटवा लिए लेकिन जालिमों के सामने न झुके—जिन्हें हज़रत अब्बास (अ.स.) कहते हैं...

लेखक के बारे में
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अली अब्बास नकवी
Associate Guest Coordinator
अली अब्बास नकवी एक प्रतिभाशाली और युवा पत्रकार हैं, जो एनडीटीवी में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. वे अपनी गहरी रिपोर्टिंग और तथ्यों को उजागर करने की क्षमता... और पढ़ें
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