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Sant Ki Seekh: समाज के लिए क्यों जरूरी हैं संत और शास्त्र है? जानें इनका धार्मिक महत्व

Sant aur Shastra: 21वीं सदी में संतों के होने का क्या महत्व है? आखिर जीवन के लिए क्यों जरूरी माने जाते हैं संत और शास्त्र? संकट के समय में सही दिशा दिखाने वाले संत और शास्त्र की उपयोगिता को विस्तार से बता रहे हैं महामंडलेश्वर स्वामी श्री चिदंबरानंद सरस्वती जी महाराज.

Sant Ki Seekh: समाज के लिए क्यों जरूरी हैं संत और शास्त्र है? जानें इनका धार्मिक महत्व
सनातन परंपरा में संत और शास्त्र का महत्व
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Importance of Saints and Scriptures: संसार में मनुष्य अक्सर मोह, अज्ञान और भौतिक आकर्षणों में ऐसा उलझ जाता है कि उसे अपने वास्तविक स्वरूप और जीवन के उद्देश्य का बोध ही नहीं रहता. इसी स्थिति को संत और शास्त्र दूर करने के लिए प्रकट होते हैं. यह कथन अत्यंत सारगर्भित है कि 'संत की वाणी अलार्म है और शास्त्र जागरण का शंखनाद'. अलार्म सोए हुए व्यक्ति को झकझोर कर उठाता है और शंखनाद जागरण की घोषणा करता है-ठीक वैसे ही संत और शास्त्र मनुष्य को अज्ञान-निद्रा से जगाकर आत्मबोध की ओर अग्रसर करते हैं.

जीवन का अनुभव है 

आदिजगतगुरु शंकराचार्य जी ने अपने संपूर्ण वेदांत दर्शन में इसी सत्य को प्रकट किया है. वे कहते हैं-
'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः.'
अर्थात् ब्रह्म ही सत्य है, यह जगत अस्थायी है और जीव स्वयं ब्रह्म स्वरूप ही है. किंतु यह महान सत्य केवल ग्रंथों में पढ़ लेने से जीवन में उतरता नहीं. इसके लिए संतों की जीवंत वाणी आवश्यक होती है, जो शास्त्रीय ज्ञान को जीवन का अनुभव बना देती है.

दो सबसे बड़ी आवश्यकता

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शंकराचार्य जी ने विवेकचूडामणि में स्पष्ट कहा है कि मनुष्य जन्म दुर्लभ है और उससे भी दुर्लभ है सद्गुरु तथा शास्त्रों का संग. उनके अनुसार-
'दुर्लभं त्रयमेवैतत् देवअनुग्रहहेतुकम्.
मनुष्यत्वं मुमुक्षुत्वं महापुरुषसंश्रयः.'

अर्थात् मनुष्य जीवन, मोक्ष की इच्छा और महापुरुषों का संग-ये तीनों ईश्वर की विशेष कृपा से ही प्राप्त होते हैं. इससे स्पष्ट होता है कि संत और शास्त्र का आदर करना मात्र आस्था नहीं, बल्कि जीवन की सर्वोच्च आवश्यकता है.

समय रहते जागना होगा

वेदांत का मूल उद्देश्य आत्मज्ञान है-अपने वास्तविक स्वरूप की पहचान. शास्त्र इस ज्ञान का सैद्धांतिक आधार प्रदान करते हैं, जबकि संत उसे व्यावहारिक बनाते हैं. उपनिषदों में बार-बार कहा गया है कि आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है-
'न जायते म्रियते वा कदाचित्.'
परंतु इस गूढ़ सत्य को समझने के लिए मनुष्य को अहंकार, आसक्ति और अज्ञान का परित्याग करना होता है. संत अपनी वाणी से हमें सावधान करते हैं-जैसे अलार्म-कि हम समय रहते जाग जाएँ, अन्यथा जीवन व्यर्थ चला जाएगा.

वैराग्य और ईश्वर-स्मरण जरूरी 

शंकराचार्य जी ने केवल दर्शन नहीं दिया, बल्कि संपूर्ण भारत में चार मठों की स्थापना कर शास्त्र और संत परंपरा को जीवित रखा. उन्होंने भक्ति, ज्ञान और वैराग्य-तीनों को संतुलित किया. भज गोविंदम् में वे तीव्र शब्दों में चेतावनी देते हैं कि केवल शब्दजाल और तर्क से मुक्ति नहीं मिलेगी, जब तक जीवन में वैराग्य और ईश्वर-स्मरण न हो. यह संत की वाणी का ही स्वर है, जो सीधे हृदय को छूता है.

मानव जन्म का उद्देश्य 

आज के युग में, जब मनुष्य बाहरी प्रगति में उलझकर आंतरिक शांति खो बैठा है, संत और शास्त्र की आवश्यकता और भी बढ़ गई है. शास्त्र हमें शाश्वत सत्य का बोध कराते हैं और संत हमें बताते हैं कि उस सत्य को जीवन में कैसे जिया जाए. यदि हम केवल संसार की चकाचौंध में लगे रहे और इन दोनों की उपेक्षा की, तो मानव जन्म का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा.

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वास्तविक कल्याण का मार्ग 

अतः यह अत्यंत आवश्यक है कि हम संत और शास्त्र का गहन आदर करें, उनके उपदेशों को केवल सुनें नहीं, बल्कि जीवन में उतारें. यही वास्तविक कल्याण का मार्ग है. जब संत की वाणी हमें जगाती है और शास्त्र का शंखनाद आत्मचेतना को जाग्रत करता है, तब मनुष्य अपने सत्य स्वरूप को पहचानकर जीवन के परम लक्ष्य-मोक्ष-की ओर अग्रसर होता है. यही वेदांत का संदेश है और यही आदिजगत गुरु शंकराचार्य जी की अमर वाणी का सार.

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