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Sant Ki Seekh: स्वाध्याय क्या होता है और यह जीवन के लिए क्यों जरूरी है?

Swadhyay Kya Hota hai: जीवन में इसके क्या मायने हैं? किसी व्यक्ति को स्वाध्याय कैसे करना चाहिए? महापुरुषों का स्वाध्याय कैसा होता है? स्वाध्याय करने का सही तरीका और इसके बड़े लाभ को बता रहे हैं महामंडलेश्वर स्वामी श्री चिदंबरानंद सरस्वती जी महाराज 

Sant Ki Seekh: स्वाध्याय क्या होता है और यह जीवन के लिए क्यों जरूरी है?
जीवन में स्वाध्याय के क्या मायने हैं?
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Swadhyay Ka Matlab Kya Hota hai: स्वाध्याय क्या है ..सबसे पहले इस समझते है...स्वाध्याय अर्थात् — अपने आप का अध्ययन. इसमें शास्त्रों का पाठ, सद्ग्रंथों का मनन, आत्मचिंतन तथा अपने विचार, आचरण और जीवन दिशा की समीक्षा शामिल होती है. इस तरह देखें तो स्वाध्याय के सही मायने हैं स्वयं का अध्ययन करना. स्वाध्याय से व्यक्ति अपने दोषों को पहचानता है, सद्गुणों को विकसित करता है और आत्मिक उन्नति की ओर अग्रसर होता है. यह विवेक, आत्मविश्वास और नैतिकता को सुदृढ़ करता है तथा जीवन को उद्देश्यपूर्ण और संतुलित बनाता है.

किस तरह करें स्वाध्याय?

स्वाध्याय का सही तरीका नियमितता, एकाग्रता और उद्देश्य से जुड़ा होता है. शांत स्थान चुनकर निश्चित समय पर अध्ययन करें. पहले विषय का उद्देश्य समझें, फिर शुद्ध पाठ का ध्यानपूर्वक वाचन करें. कठिन शब्दों का अर्थ खोजें और संदर्भ सहित समझें. पढ़े गए अंश पर मनन करें, प्रश्न लिखें और उत्तर खोजें. शास्त्र, संतवाणी या प्रमाणिक ग्रंथ का सहारा लें. अंत में सार लिखें, जीवन में प्रयोग तय करें और विनम्र भाव से आत्मचिंतन करें. नियमित समीक्षा, चर्चा और साधना से ज्ञान स्थिर होता है तथा आचरण में स्वाभाविक परिवर्तन आता है, निरंतर अभ्यास आवश्यक.

गहरा सकारात्मक परिवर्तन

 स्वाध्याय करने से व्यक्ति के विचार और चिंतन में गहरा सकारात्मक परिवर्तन आता है. उत्तम ग्रंथों और सद्विचारों के निरंतर अध्ययन से मन को सही दिशा मिलती है और नकारात्मक सोच स्वतः कम होने लगती है. स्वाध्याय आत्मचिंतन की शक्ति बढ़ाता है, जिससे व्यक्ति अपने दोषों को पहचानकर सुधार की ओर अग्रसर होता है. इससे विवेक, धैर्य और निर्णय-क्षमता विकसित होती है. शास्त्रों और महापुरुषों के विचार जीवन के प्रति दृष्टिकोण को व्यापक बनाते हैं. परिणामस्वरूप सोच शुद्ध, सकारात्मक और समाजोपयोगी बनती है. 

स्वाध्याय के बगैर जीवन 

स्वाध्याय न करने से व्यक्ति का विचार-दृष्टिकोण कमजोर हो जाता है. ज्ञान के अभाव में वह सही-गलत का भेद नहीं कर पाता और भ्रम, अंधविश्वास तथा बाहरी प्रभावों में आसानी से बहक जाता है. स्वाध्याय के बिना आत्मचिंतन नहीं होता, जिससे आत्मविश्वास घटता है और निर्णय शक्ति कमजोर पड़ती है. जीवन में अनुशासन, उद्देश्य और दिशा का अभाव उत्पन्न होता है. परिणामस्वरूप व्यक्ति भोगवाद, क्रोध, अहंकार और नकारात्मक संगति की ओर भटकने लगता है. अंततः जीवन मूल्यहीन, अशांत और दिशाहीन बन जाता है, जिससे मानसिक असंतुलन और नैतिक पतन की संभावना बढ़ जाती है.

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महापुरुषों का स्वाध्याय 

स्वाध्याय ने अनेक महापुरुषों के जीवन को उन्नत, अनुकरणीय और समाजोपयोगी बनाया है. असंख्य महापुरुषों ने गीता और उपनिषदों के स्वाध्याय से सत्य और अहिंसा का मार्ग अपनाया. स्वामी विवेकानंद ने वेद-उपनिषदों के अध्ययन से आत्मबल और राष्ट्रचेतना जाग्रत की. डॉ. भीमराव अंबेडकर के निरंतर स्वाध्याय ने उन्हें महान विधिवेत्ता और समाज सुधारक बनाया. लोकमान्य तिलक ने गीता-रहस्य का स्वाध्याय कर कर्मयोग का संदेश दिया. श्री अरविंद और महर्षि दयानंद सरस्वती ने भी स्वाध्याय द्वारा आध्यात्मिक व बौद्धिक उन्नति प्राप्त कर समाज को दिशा दी.

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