How to deal with hard time: समय जीवन का सबसे बड़ा शिक्षक है. यह कभी किसी के पक्ष में होता है तो कभी विपरीत परिस्थितियों का निर्माण करता है. कभी सफलता हमारे कदम चूमती है तो कभी असफलताएँ हमें घेर लेती हैं. कभी जीवन में सम्मान, सुख और समृद्धि आती है, तो कभी संघर्ष, अभाव और कठिनाइयाँ सामने खड़ी हो जाती हैं. यही समय का फेर है. लेकिन महान वही है, जो समय के बदलते स्वरूप के साथ टूटता नहीं, बल्कि संघर्ष करते हुए अपने भीतर जीतने का जज़्बा जीवित रखता है.
संघर्ष व्यक्ति की परीक्षा
जीवन में कठिन समय आना कोई असामान्य बात नहीं है. इतिहास गवाह है कि जिन लोगों ने महान उपलब्धियाँ हासिल कीं, उन्होंने कभी न कभी कठिन परिस्थितियों का सामना अवश्य किया. संघर्ष व्यक्ति की परीक्षा लेता है, लेकिन यही संघर्ष उसके व्यक्तित्व को मजबूत भी बनाता है. सोना आग में तपकर कुंदन बनता है और मनुष्य संघर्षों में तपकर महान बनता है.
भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में कर्म और संघर्ष का मार्ग दिखाते हुए कहा है-

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन.
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
(श्रीमद्भगवद्गीता 2.47)
अर्थात् मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फल पर नहीं. इसलिए फल की चिंता किए बिना अपने कर्तव्य और कर्म को निरंतर करते रहना चाहिए.
यह श्लोक हमें सिखाता है कि परिस्थितियाँ कैसी भी हों, हमें अपने प्रयासों से पीछे नहीं हटना चाहिए. सफलता कब मिलेगी, कितनी मिलेगी और किस रूप में मिलेगी-यह हमारे हाथ में नहीं है. लेकिन प्रयास करना, मेहनत करना, धैर्य रखना और अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहना हमारे हाथ में अवश्य है.
वास्तविक शक्ति की पहचान
समय का फेर अक्सर मनुष्य को भ्रमित करता है. जब सब कुछ अच्छा चल रहा होता है, तब व्यक्ति स्वयं को शक्तिशाली समझने लगता है. लेकिन जब परिस्थितियाँ विपरीत होती हैं, तब वही व्यक्ति अपने भीतर छिपी वास्तविक शक्ति को पहचानता है. कठिन समय हमें यह सिखाता है कि हमारी शक्ति बाहरी साधनों में नहीं, बल्कि हमारे विचारों, धैर्य और आत्मविश्वास में छिपी है.
संघर्ष के समय सबसे बड़ी चुनौती परिस्थितियाँ नहीं, बल्कि हमारा मन होता है. मन बार-बार कहता है-अब और नहीं, यह संभव नहीं, मैं हार गया. लेकिन जीतने का जज़्बा इसी क्षण जन्म लेता है. जो व्यक्ति अपने मन की निराशा पर विजय पा लेता है, वह बाहरी संघर्षों को भी जीत सकता है.
भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्धभूमि में निराश देखकर कहा
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते.
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥
(श्रीमद्भगवद्गीता 2.3)
अर्थात् हे अर्जुन! इस दुर्बलता को प्राप्त मत हो. यह तुम्हारे योग्य नहीं है. हृदय की क्षुद्र दुर्बलता को त्यागकर उठो और अपने कर्तव्य के लिए खड़े हो जाओ.
यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है. जब जीवन में संकट आए, जब रास्ते बंद दिखाई दें, जब अपने भी साथ छोड़ दें और सफलता दूर लगने लगे, तब हमें अपने भीतर से आवाज उठानी चाहिए-“मैं हारने के लिए नहीं, संघर्ष करके जीतने के लिए जन्मा हूँ.”
निराशा के बीच आशा
जीत का अर्थ केवल किसी प्रतियोगिता में प्रथम आना नहीं है. कभी-कभी विपरीत परिस्थितियों में स्वयं को संभाल लेना भी बड़ी जीत होती है. निराशा के बीच आशा को बचाए रखना जीत है. गिरने के बाद फिर उठना जीत है. असफलता के बाद दोबारा प्रयास करना जीत है. दूसरों की नकारात्मक बातों के बावजूद अपने लक्ष्य पर विश्वास बनाए रखना भी जीत है.
समय कभी एक जैसा नहीं रहता. सुख के बाद दुख और दुख के बाद सुख आता है. इसलिए अच्छे समय में अहंकार नहीं करना चाहिए और बुरे समय में निराश नहीं होना चाहिए. जो व्यक्ति समय की गति को समझ लेता है, वह परिस्थितियों का दास नहीं बनता. वह जानता है कि आज की कठिनाई कल की सफलता का आधार बन सकती है.
भगवान के वचन
गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्.
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥
(श्रीमद्भगवद्गीता 6.5)
अर्थात् मनुष्य को स्वयं अपने द्वारा अपना उद्धार करना चाहिए और स्वयं को नीचे नहीं गिराना चाहिए. क्योंकि मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु.
यह श्लोक हमें आत्मविश्वास का सबसे बड़ा संदेश देता है. यदि हम स्वयं पर विश्वास करते हैं, तो कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी रास्ता खोज सकते हैं. लेकिन यदि हम स्वयं को कमजोर मान लेते हैं, तो छोटी-सी समस्या भी पहाड़ जैसी लगने लगती है.
धैर्य सबसे बड़ा हथियार
संघर्ष के समय धैर्य सबसे बड़ा हथियार है. हमें यह समझना होगा कि हर बीज को वृक्ष बनने में समय लगता है. हर नदी को समुद्र तक पहुँचने के लिए अनेक बाधाओं को पार करना पड़ता है. हर महान सफलता के पीछे वर्षों का परिश्रम, त्याग और धैर्य छिपा होता है. इसलिए परिणाम देर से मिले तो भी प्रयास बंद नहीं करना चाहिए.
सफलता का अधिकारी
जीतने का जज़्बा केवल उत्साह का नाम नहीं है. यह निरंतरता का नाम है. जो व्यक्ति थकने के बाद भी चलता है, गिरने के बाद भी उठता है और असफलता के बाद भी प्रयास करता है, वही अंततः सफलता का अधिकारी बनता है. अतः समय के फेर से घबराने की आवश्यकता नहीं है. समय बदलता रहता है, लेकिन हमारा संकल्प नहीं बदलना चाहिए. परिस्थितियाँ हमारे विरुद्ध हो सकती हैं, लेकिन हमारा साहस हमारे साथ होना चाहिए. रास्ते कठिन हो सकते हैं, लेकिन हमारी मंजिल स्पष्ट होनी चाहिए.
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याद रखिए
समय कभी स्थायी नहीं होता, लेकिन संघर्ष से जन्मी शक्ति स्थायी होती है. जो व्यक्ति कठिन समय में भी अपने कर्म, धैर्य और विश्वास को नहीं छोड़ता, उसके लिए कोई भी पराजय अंतिम नहीं होती.
जीवन मंत्र
जीवन का मंत्र यही है कि “समय चाहे कितना भी विपरीत क्यों न हो, यदि हौसला जीवित है, कर्म निरंतर है और लक्ष्य पर विश्वास अडिग है, तो जीत निश्चित है.”
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