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सदियों बाद फिर जगा ये रहस्यमयी शक्तिपीठ! पढ़ें जोगुलाम्बा मंदिर की अनोखी कहानी

Jogulamba Mandir: एक ऐसा मंदिर...जो कभी उजड़ गया था, फिर सदियों बाद दोबारा बसाया गया. जहां देवी का रूप अलग है, आस्था अलग है और कहानी भी रहस्यमयी. आखिर क्या है जोगुलाम्बा मंदिर का राज?

सदियों बाद फिर जगा ये रहस्यमयी शक्तिपीठ! पढ़ें जोगुलाम्बा मंदिर की अनोखी कहानी
जहां गिरा था सती का दांत, वही फिर से जगा शक्तिपीठ
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Mysterious Temple India: कहते हैं कुछ जगहें सिर्फ पत्थरों से नहीं बनतीं...वहां अद्भुत कहानियां सांस लेती हैं. तेलंगाना के एक शांत से कस्बे आलमपुर में ऐसा ही एक मंदिर है, जो कभी खामोश हो गया था, जैसे वक्त ने उसे भुला दिया हो, लेकिन सदियों बाद वही जगह फिर से जग उठी और अब वहां हर दिन आस्था की आहट सुनाई देती है. ये मंदिर 18 महा शक्तिपीठों में से एक माना जाता है. ये मंदिर शक्तिवाद का बड़ा तीर्थ स्थल है. मान्यता है कि आलमपुर के जोगुलाम्बा देवी मंदिर वाले स्थान पर माता सती के दांतों की ऊपर वाली पंक्ति गिरी थी.

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कहां है ये अनोखा मंदिर? (Where is this unique temple?)

तेलंगाना के जोगुलाम्बा गडवाल जिले के आलमपुर में स्थित जोगुलाम्बा मंदिर आज फिर से श्रद्धालुओं के लिए खास आकर्षण बन चुका है. यह मंदिर 18 महा शक्तिपीठों में शामिल माना जाता है, जिससे इसकी धार्मिक अहमियत और भी बढ़ जाती है. 'जोगुलाम्बा' नाम तेलुगु के 'योगुला अम्मा' से लिया गया है, जिसका मतलब होता है योगियों की मां. यह नाम ही इस स्थान की आध्यात्मिक गहराई को दिखाता है.

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क्या है इससे जुड़ी मान्यता? (Jogulamba Temple Telangana)

पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब देवी सती के शरीर के अंग अलग हुए, तब उनके ऊपरी दांत इसी स्थान पर गिरे थे. इसी वजह से यहां शक्तिपीठ की स्थापना मानी जाती है. मंदिर में देवी का स्वरूप काफी अलग बताया जाता है. उनके सिर पर बिच्छू, छिपकली और मेंढक जैसे प्रतीक दर्शाए जाते हैं, जो नकारात्मकता पर विजय और सुरक्षा का संकेत माने जाते हैं.

सदियों बाद फिर कैसे हुआ पुनर्निर्माण? (Shakti Peetha India)

इतिहास के मुताबिक, इस मंदिर का निर्माण 7वीं सदी में चालुक्य वंश ने कराया था. बाद में आक्रमणों के दौरान मंदिर को नुकसान पहुंचा और लंबे समय तक यह स्थान वीरान रहा. मूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए पास के बाल ब्रह्मेश्वर मंदिर में रखा गया था. आखिरकार साल 2005 में जोगुलाम्बा देवी को फिर से उनके मूल स्थान पर स्थापित किया गया. आज गडवाल शाही परिवार इस मंदिर के विकास में अहम भूमिका निभा रहा है और यहां सुविधाएं बेहतर की जा रही हैं.

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(डिस्क्लेमर: यहां दी गई सभी जानकारियां सामाजिक और धार्मिक आस्थाओं पर आधारित हैं. NDTV इसकी पुष्टि नहीं करता.)

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