सनातन धर्म में जीवित्पुत्रिका व्रत यानी जितिया व्रत का विशेष महत्व है. यह व्रत तीन दिनों तक चलता है. तीन दिन चलने वाला ये व्रत नहाय-खाय से शुरू होता है और फिर पारण के साथ पूरा होता है. यह व्रत संतान की लंबी उम्र और अच्छी हेल्थ की कामना के लिए रखा जाता है. यह व्रत रखने वाली महिलाएं सुबह स्नान आदि करके पूजा करती हैं और इसके बाद भोजन ग्रहण करती हैं. इस दिन झिंगनी यानी तोरी, नोनी का साग और मडुआ की रोटी खाने की परंपरा बताई गई है. चलिए आपको बताते हैं जितिया व्रत कब है. नहाय-खाय से लेकर पारण तक का समय और महत्व क्या है?
जितिया व्रत कब है?
- नहाय-खाय- 2 अक्तूबर, शुक्रवार
- जितिया निर्जला व्रत- 3 अक्टूबर, शनिवार
- पारण- 4 अक्टूबर, रविवार
प्रयागराज की ज्योतिषी शिप्रा सचदेव ने बताया कि जितिया व्रत माताएं अपने पुत्र की लंबी आयु के लिए रखती हैं. यह व्रत संतान के जीवन में आने वाले विघ्नों को हरने, उनकी अच्छी हेल्थ और उनकी वृद्धि के लिए रखा जाता है. मान्यता है कि इस व्रत को पूरी श्रद्धा से करने पर संतान पर आने वाले सभी कष्ट दूर हो जाते हैं.
शिप्रा सचदेव के अनुसार, यह पर्व तीन दिनों तक चलता है. इसकी शुरुआत नहाय-खाय से होती है. इस साल 2 अक्टूबर को नहाय-खाय है. इस दिन महिलाएं सुबह जल्दी उठकर स्नान-ध्यान करती हैं और सात्विक भोजन ग्रहण करती हैं. इस दिन नहाय-खाय का पूजन किया जाता है और अगले दिन के कठिन व्रत के लिए मन को तैयार किया जाता है.
3 अक्टूबर को निर्जला व्रत
व्रत का मुख्य दिन 3 अक्टूबर को है. इस दिन माताएं पूरे 24 घंटे से भी अधिक समय तक निर्जला उपवास रखती हैं. इस दिन सुबह उठकर व्रत का संकल्प लिया जाता है. उसके बाद पूरे दिन पानी और खाना नहीं खाया जाता है. यह व्रत बहुत कठोर माना जाता है. प्रदोष काल में इस व्रत की पूजा-अर्चना की जाती है. इस दौरान महिलाएं कथा सुनती हैं और अपने बच्चों के मंगल की कामना करती हैं.
पारण
व्रत का समापन और पारण 4 अक्टूबर, नवमी तिथि को होगा. 4 अक्टूबर को सूर्योदय के बाद पारण किया जाएगा. इस दिन सुबह 7 बजकर 32 मिनट के बाद ही व्रत का पारण शुभ माना गया है. इसके बाद ही महिलाएं अन्न-जल ग्रहण करके अपना व्रत खोलेंगी.
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