हर साल आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को भगवान जगन्नाथजी की पुरी में रथ यात्रा निकाली जाती है. इस साल जगन्नाथ यात्रा 16 जुलाई को शुरू होगी. रथयात्रा में भगवान जगन्नाथ के अलावा उनके बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा का रथ भी निकाला जाता है. इस रथ यात्रा को लेकर मान्यता है कि एक दिन भगवान जगन्नाथ की बहन सुभद्रा ने उनसे द्वारका के दर्शन कराने की प्रार्थना की थी. तब भगवान जगन्नाथ ने अपनी बहन की इच्छा पूर्ति के लिए उन्हें रथ में बिठाकर पूरे नगर का भ्रमण करवाया था और इसके बाद से इस रथयात्रा की शुरुआत हुई थी. जगन्नाथजी की रथ यात्रा के बारे में स्कंद पुराण, नारद पुराण, पद्म पुराण और ब्रह्म पुराण में भी बताया गया है. इसलिए हिंदू धर्म में इसका विशेष महत्व बताया गया है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो भी व्यक्ति इस रथयात्रा में शामिल होकर इस रथ को खींचता है उसे 100 यज्ञ करने के बराबर पुण्य प्राप्त होता है. इसकी जानकारी NDTV से बातचीत के दौरान आचार्य मदनमोहन जी ने दी है.
रथयात्रा में होते हैं 3 रथ
800 साल पुराने इस मंदिर में भगवान कृष्ण को जगत के नाथ जगन्नाथजी के रूप में पूजा जाता है और इनके साथ उनके बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा भी विराजमान हैं. रथयात्रा में तीनों ही देवों के रथ निकलते हैं. रथयात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ के साथ भाई बलराम और बहन सुभद्रा के लिए अलग-अलग रथ होते हैं और इन रथों को बनाने की शुरुआत अक्षय तृतीया से होती है. रथयात्रा में सबसे आगे बलराम और बीच में बहन सुभद्रा का रथ रहता है. सबसे पीछे भगवान जगन्नाथ का रथ होता है. सभी के रथ अलग-अलग रंग और ऊंचाई के होते हैं.

किस रंग से होती है तीनों रथ की पहचान?
भगवान बलरामजी के रथ को 'तालध्वज' कहा जाता है और इसकी पहचान लाल और हरे रंग से होती है. वहीं सुभद्रा के रथ का नाम 'दर्पदलन' अथवा 'पद्म रथ' है, उनके रथ का रंग काला या नीले रंग को होता है, जिसमें लाल रंग भी होता है. भगवान जगन्नाथ के रथ को नंदीघोष अथवा गरुड़ध्वज कहा जाता है, इनका रथ लाल और पीले रंग का होता है.
नीम की लकड़ी से बनता है रथ
रथ हमेशा नीम की लकड़ी से बनाया जाता है, क्योंकि ये औषधीय लकड़ी होने के साथ पवित्र भी मानी जाती है. हर साल बनने वाले ये रथ एक समान ऊंचाई के ही बनाए जाते हैं. इसमें भगवान जगन्नाथ का रथ 45.6 फीट ऊंचा, बलराम का रथ 45 फीट और देवी सुभद्रा का रथ 44.6 फीट ऊंचा होता है. भगवान के रथ में एक भी कील या कांटे आदि का प्रयोग नहीं होता। यहां तक की कोई धातु भी रथ में नहीं लगाई जाती है. रथ की लकड़ी का चयन बसंत पंचमी के दिन और रथ बनाने की शुरुआत अक्षय तृतीया के दिन से होती है.

'छर पहनरा' से शुरुआत
तीनों रथ के तैयार होने के बाद इसकी पूजा के लिए पुरी के गजपति राजा की पालकी आती है. इस पूजा अनुष्ठान को 'छर पहनरा' नाम से जाना जाता है. इन तीनों रथों की वे विधिवत पूजा करते हैं और
'सोने की झाड़ू' से रथ मण्डप और यात्रा वाले रास्ते को साफ किया जाता है.
जगन्नाथ जी के जन्म स्थली पहुंचती है यात्रा
रथयात्रा ढोल, नगाड़ों, तुरही और शंखध्वनि के साथ रथ को लोग खींचते हैं. जिसे रथ खींचने का सौभाग्य मिल जाता है, वह महाभाग्यशाली माना जाता है. जगन्नाथ मंदिर से रथ यात्रा शुरू होकर 3 कि.मी. दूर गुंडीचा मंदिर पहुंचती है. इस स्थान को भगवान की मौसी का घर भी माना जाता है. एक अन्य मान्यता के अनुसार यहीं पर विश्वकर्मा ने इन तीनों प्रतिमाओं का निर्माण किया था. यह स्थान जगन्नाथ जी की जन्म स्थली भी है. यहां तीनों देव सात दिनों के लिए विश्राम करते हैं. आषाढ़ माह के दसवें दिन सभी रथ फिर से मुख्य मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं. वापसी की यह यात्रा बहुड़ा यात्रा कहलाती है. जगन्नाथ मंदिर पहुंचने के बाद वैदिक मंत्रोच्चार के बीच देव-विग्रहों को फिर से प्रतिष्ठित किया जाता है.

क्या है मान्यता?
स्कंद पुराण में वर्णित है कि जो व्यक्ति रथ यात्रा में शामिल होकर जगत के स्वामी जगन्नाथजी के नाम का कीर्तन करता हुआ गुंडीचा नगर तक जाता है वह सारे कष्टों से मुक्त हो जाता है. वहीं, जो व्यक्ति जगन्नाथ को प्रणाम करते हुए मार्ग के धूल-कीचड़ आदि में लोट-लोट कर जाता है वो सीधे भगवान विष्णु के उत्तम धाम को प्राप्त होता है. साथ ही जो व्यक्ति गुंडिचा मंडप में रथ पर विराजमान श्री कृष्ण, बलराम और सुभद्रा देवी के दर्शन दक्षिण दिशा को आते हुए करता है उसे मोक्ष मिलता है.
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