How to become a better person: संसार में अच्छे और बुरे लोगों के बीच का अंतर सदियों से एक बड़ी चर्चा का विषय बना रहा है. कोई व्यक्ति अच्छा है या फिर बुरा, उसकी पहचान उसके कर्म, उसके स्वभाव और दूसरों के प्रति किए गये उसके व्यवहार से होती है. अच्छाई और बुराई के बीच में अक्सर लोगों के सामने एक बड़ी चुनौती यह रहती है कि तमाम तरह की नकारात्मक ऊर्जा के बीच खुद को कैसे सकारात्मक बनाए रखें. दरअसल, जीवन में खुद को बेहतर और सकारात्मक इंसान बनाना भी एक साधना है. विशेष तौर पर तब जब आपके आस-पास के लोग आपको गलत राह पर ले जाने के लिए पूरा जोर लगा देते हों.
खुद को कैसे अच्छा बनाएं?
यदि आप स्वयं को अच्छा बनाना है तो आपको अपने इर्द-गिर्द का जो माहौल है, उसको बहुत साफ रखना होगा. बुरे लोगों के बीच में बैठने से आपके अंदर भी वह बुराई आ शक्ति है, इसीलिए शास्त्र और नीति कहती है कि बुरे लोगों के बीच में हमेशा बचने का प्रयास करो. कई बार लोग यह तर्क करते हैं कि हम तो बहुत अच्छे हैं, लेकिन आपको यह मालूम होना चाहिए कि जब आप बुरे लोगों के संपर्क में आते हैं तो उसका प्रभाव कुछ न कुछ आप पर पड़ता है. काजल की कोठरी में कितना भी कोई सयाना व्यक्ति जाए, उसे कहीं न कहीं कालिख लग ही जाती है.
सद्कर्म और सत्संग एक साधना है
काजल की कोठरी में जाने पर आपको जिस प्रकार कालिख से बचने का प्रयास करना पड़ता है. उसी प्रकार दुष्टों की संगति में आपको अपने आपको बचाने का प्रयास करना पड़ता है, क्योंकि वहां पर बुराई मुफ्त में मिलती है. आप भगवान शिव, विष्णु या फिर किसी भी देवता पर आस्था रखते हों, लेकिन आपको उनकी भक्ति को भूलकर बुरे लोगों का संग नहीं करना है क्योंकि जब कभी भी आप किसी सत्संग या कथा में जाने का प्रयास करेंगे और उनसे भी चलने के लिए पूछेंगे तो उससे पूछना ही आपका अपराध हो जाएगा.
वह स्वयं तो आएगा नहीं आपको भी नहीं जाने के लिए कहेगा. वह आपको ताश खेलने या फिर कुछ अन्य कार्यों में लिप्त करने का प्रयास करेगा. वह तर्क देगा कि अभी तो कथा में सात दिन बचें अभी वहां जाकर क्या करना. भंडारे वाले दिन अंत में चलेंगे. एक भगवद् भक्त को सबसे बड़ी सावधानी रखनी चाहिए कि जो भगवद् भक्त न हो उसका साथ नहीं करना चाहिए क्योंकि कभी न कभी उसका साथ आपकी बुद्धि बदल सकता है. कलयुग में व्यक्ति का मन बुरे मार्ग जल्दी भागता है. सद्कर्म और सत्संग के लिए उसे बहुत यत्न करना पड़ता है.
कुछ ऐसा होता है कुसंग का परिणाम
एक बालक भगवान भोलेनाथ का अनन्य भक्त था. वह प्रतिदिन शिवालय में जाता और भगवान शिव की पूजा और अभिषेक करता था. शिवरात्रि के दिन तो उसका पूरा दिन और पूरी रात शिव की सेवा करते ही बीतती थी. शिवरात्रि के दिन वह शिव भक्ति के सिवाल कोई कार्य नहीं करता था. एक बार वह कुसंग में फंस गया. धीरे-धीरे उसने शिवालय जाना बंद किया. इसके बाद सोमवार के दिन शिव पूजन बंद कर दिया.
इसके बाद जब शिवरात्रि आई तो उसने उस दिन व्रत रखने का प्रयास किया और सुबह से कुछ भी नहीं खाया. तब उसके मित्रों ने उसे यह कहते हुए मांस भक्षण करा दिया कि यह तो शिव को चढ़ता है. इस तरह जो बालक शिवरात्रि के दिन कुछ भी सेवन नहीं करता था, उसने कुसंग में उस पावन दिन भी मांस भक्षण कर लिया. ऐसे में किसी व्यक्ति को यदि अपनी अपनी भक्ति और अच्छाई को सुरक्षित रखना हो तो ऐसे कुसंग से दूर रहना ही सबसे बड़ा उपाय है.
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श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि -
'संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः,
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति.'
गलत संग आपको आगे ले जाकर बुराई के कुएं में गिरा देता है, लेकिन यदि आपका संग अच्छा है तो वह आपको शिव की तरफ लेकर जाएगा, नारायण की तरफ लेकर जाएगा, जबकि कुसंग आपको नर्क की ओर ले जाएगा. ऐसे में निर्णय आपको करना है कि आपको नारायण की तरफ जाना है कि नर्क की तरफ जाना है.
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