Safalta Kaise Milti Hai: जीवन में हर हर कोई व्यक्ति किसी न किसी कार्य में सफलता का सपना संजोए हुए उसके लिए दिन-रात परिश्रम और प्रयास कर रहा है, लेकिन यह प्रयास कुछ लोगों का जल्दी सफल हो जाता है और उनकी झोली में जल्द ही सफलता गिर जाती है तो वहीं कुछ को इसे पाने के लिए लंबे समय तक संघर्ष करना होता है. जीवन से जुड़ी जीत-हार के बीच आखिर सफलता के क्या मायने हैं? किसी कार्य विशेष में सफलता को पाने के लिए क्या करना चाहिए? सबसे खास बात सफल होने के बाद इसका श्रेय किसे देना चाहिए, आइए इसे विस्तार से जानते हैं.
सफलता का पुण्य कार्य से संबंध
जीवन में सफलता का श्रेय हमेशा परमात्मा को देना चाहिए. आपने अपने जीवन में पुण्यकार्य किए हैं, इसीलिए आपका परिश्रम और प्रयास सफल हो रहा है और आपको सफलता मिल रही है, अगर आप पुण्यकार्य नहीं करते तो आपको सफलता मिलने वाली नहीं थी. यह आपके पूर्वार्द्ध और वर्तमान के पुण्य कार्यों का प्रतिफल है. आपकी सफलता के पीछे उस पुण्य कार्य का प्रभाव या फिर कहें उस सत्कर्म की ताकत है, जो आपको जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता मिलती चली जा रही है.
तब भी जारी रखें सत्कर्म
जीवन में जब आपको सफलता प्राप्त होती है और आप उसके जरिए पुण्य कार्य को निरंतर नहीं जारी रखते हैं तो आप एक बार फिर वहीं पर पहुंच जाते हैं, जहां से आपको सफलता का इंतजार बना हुआ था. कहने का तात्पर्य यह कि सत्कर्म या फिर कहें पुण्य कार्य की उपेक्षा करने पर आदमी शिखर से एक बार फिर शून्य पर आ जाता है, जबकि हर समय सत्कर्म करने वाले व्यक्ति को निरंतर सफलता प्राप्त होती है और उन्नति के पथ पर आगे बढ़ता चला जाता है.
सफलता का न करें अभिमान
जीवन के किसी भी क्षेत्र में सफलता प्राप्त होने के बाद जब आप यह कहते हैं कि यह मेरे प्रयास से संभव हुआ है तो आखिर उसके बाद फिर आप कैसे शिखर से शून्य पर पहुंच जाते हैं. जीवन में कोई व्यक्ति ऐसा नहीं मिलेगा जो शिखर पहुंच कर नीचे को जाना चाहेगा. कभी नहीं चाहेगा. जब आपने शिखर पर पहुंचने के बाद अच्छा कार्य नहीं किया या फिर कहें शुभ कर्म नहीं किया तो उसकी वजह से आप एक बार फिर नीचे की ओर चले गये, इसीलिए जीवन में इस बात को गांठ बांध लीजिए कि जब कभी भी अच्छा समय आए तो वह पुण्य कर्म करना चाहिए.
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किसे देना चाहिए सफलता का श्रेय?
अक्सर होता क्या है कि जब कभी भी हमारे जीवन में अच्छा समय आता है तो हम भगवान को भूल जाते हैं. हम शुभ कर्म को भूल जाते हैं. हम समाज को भूल जाते हैं. उस समय जब हम सिर्फ स्वयं को देखते हैं तो वहीं से चीजें गलत होना प्रारंभ हो जाती हैं, जबकि यह हमें ईश्वरीय प्रसाद के रूप में प्राप्त होती है, जिसके लिए हमें उसका हमेशा आभारी रहना चाहिए.
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