Premanand Maharaj Ji: वृंदावन के कथावाचक प्रेमानंद महाराज अपने सरल विचारों के जरिए लोगों के जीवन की समस्याओं का हल करते हैं. देश-विदेश से लोग महाराज जी के पास अपनी समस्याएं लेकर पहुंचते हैं. साथ ही कई तमाम बड़ी हस्तियां भी प्रेमानंद महाराज जी के पास पहुंच चुकी हैं. हाल ही में एक भक्त ने उनसे सवाल पूछा कि राधा नाम का ध्यान कैसे किया जाता है. इसका जवाब में महाराज जी ने बताया कि अगर व्यक्ति व्यक्ति श्रद्धा और निरंतरता के साथ भगवान के नाम का अभ्यास करे, तो मन धीरे-धीरे स्थिर होने लगता है और जीवन में आध्यात्मिक शक्ति का संचार होता है. आइए जानते हैं उन्होंने आग क्या कहा...
अभ्यास मजबूत होना है जरूरी
महाराज जी कहते हैं कि अगर लंबे समय तक आदर और समर्पण के साथ नाम जप किया जाए, तोो यह अभ्यास मजबूत हो जाता है. फिर आंखें खुली हों या बंद, साधक का लक्ष्य उसके सामने बना रहता है. महाराज जी के अनुसार अगर अभ्यास कमजोर होगा तो मन अपना स्वभाव दिखाएगा. वो भूतकाल, भविष्य और तरह-तरह के अनावश्यक विचारों में घूमता रहेगा. लेकिन जब अभ्यास मजबूत हो जाता है, तब मन को अन्य दिशाओं में भटकने का अवसर नहीं मिलता और उसका चिंतन भगवान के नाम में स्थिर होने लगता है.
उन्होंने कहा कि 'राधा-राधा' नाम का जप करते हुए भी व्यक्ति अपने सांसारिक कार्य पूरी कुशलता के साथ कर सकता है. जैसे भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है कि मेरा स्मरण करते हुए अपना कर्तव्य निभाओ, उसी प्रकार नाम-स्मरण के साथ सभी जिम्मेदारियां निभाई जा सकती हैं.

राधा नाम जपने का अभ्यास कैसे शुरू करें?
महाराज जी बताते हैं कि अभ्यास की शुरुआत में साधक को मन में बार-बार "राधा" नाम लिखने का अभ्यास करना चाहिए. धीरे-धीरे यही नाम दिव्य प्रकाश की तरह भीतर स्थापित होने लगता है. उनका कहना है कि व्यक्ति लोगों से बातचीत करते समय भी भीतर-ही-भीतर नाम का स्मरण कर सकता है. इसके लिए जरूरी है कि वह कम बोले, सत्य बोले और ऐसे शब्दों का प्रयोग न करे जिससे किसीी का बुरा लगे. साथ ही झूठ, कटुता और अमंगलकारी वाणी से बचकर नाम-स्मरण को मजबूत बनाया जा सकता है.
गृहस्थ जीवन छोड़ना नहीं है जरूरी
महाराज जी कहते हैं कि आध्यात्मिक प्रगति के लिए गृहस्थ जीवन छोड़ना जरूरी नहीं है. एक परिवार में रहते हुए भी व्यक्ति अच्छा साधक बन सकता है. नाम-जप से लोक और परलोक दोनों का कल्याण होता है. इसके प्रभाव से ज्ञान, वैराग्य और भक्ति खुद जागृत होने लगती है. महाराज जी एक सुंदर उदाहरण देते हुए बताते हैं कि जब हम 6 घंटे की नींद लेते हैं तो सुबह शरीर और इंद्रियां नई ऊर्जा का अनुभव करती हैं. इसका कारण यह है कि उस समय संसार का चिंतन कुछ समय के लिए छूट जाता है.
वे कहते हैं कि अगर जागते हुए भी मन संसार की चिंताओं से हटकर परमात्मा के चिंतन में लग जाए, तो साधक को उससे कहीं अधिक आत्मिक शक्ति प्राप्त हो सकती है. ऐसा व्यक्ति खुद भी भवसागर से पार होता है और दूसरों के लिए भी प्रेरणा बनता है.
शुद्ध आहार और आचरण भी है जरूरी
महाराज जी बताते हैं कि सही निर्णय लेने के लिए बुद्धि का शुद्ध होना आवश्यक हैै. बुद्धि की शुद्धि के लिए शुद्ध आहार और शुद्ध आचरण बेहद महत्वपूर्ण हैं. जब व्यक्ति नाम-जप के साथ अच्छा आचरण अपनाता है, तब उसके भीतर ज्ञान और विवेक का उदय होने लगता है और जीवन मंगलमय बनता है.
धैर्य है सबसे जरूरी
महाराज जी का कहना है कि साधना में धैर्य सबसे महत्वपूर्ण है. शुरुआत में मन एक मिनट भी नहीं टिकता, लेकिन नियमित अभ्यास से वह धीरे-धीरे स्थिर होने लगता है. ये इस बात का संकेत है कि साधक अपने मन पर नियंत्रण प्राप्त कर रहा है.
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