गणेश चतुर्थी पर भगवान गणेश की पूजा के साथ कई नियमों का भी खास महत्व माना जाता है. इन्हीं में से एक है इस दिन चंद्रमा के दर्शन न करना. ऐसी मान्यता है कि गणेश चतुर्थी की रात चांद देखने से व्यक्ति पर झूठा आरोप या कलंक लग सकता है. इसी वजह से इस तिथि को 'कलंक चतुर्थी' भी कहा जाता है. आचार्य मदन मोहन के अनुसार, इसके पीछे भगवान गणेश और चंद्रदेव से जुड़ी एक पौराणिक कथा है.
गणेशजी ने चंद्रमा को क्यों दिया था श्राप
आचार्य मदन मोहन ने बताया कि एक बार भगवान गणेश हाथों में लड्डू लेकर मूषक पर सवार होकर जा रहे थे. तभी उनका संतुलन बिगड़ गया और वे रास्ते में गिर पड़े. यह देखकर चंद्रदेव हंसने लगे. गणेशजी को चंद्रमा की यह बात अपना अपमान लगी और उन्होंने क्रोधित होकर चंद्रदेव को क्षय होने का श्राप दे दिया.
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चंद्रदेव ने की भगवान शिव की तपस्या
उन्होंने बताया कि श्राप के कारण चंद्रमा का तेज लगातार कम होने लगा. परेशान होकर चंद्रदेव ने भगवान शिव की तपस्या की. ऐसी मान्यता है कि गुजरात के समुद्र तट पर उन्होंने शिवलिंग स्थापित कर महादेव की आराधना की. तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें संकट से बचाया. इसके बाद चंद्रदेव ने भगवान गणेश से क्षमा मांगी. गणेशजी ने कहा कि श्राप पूरी तरह समाप्त नहीं होगाा. चंद्रमा 15 दिन घटेगा और फिर 15 दिन बढ़ेगा. लेकिन भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को चंद्र दर्शन करने वाले व्यक्ति को कलंक का सामना करनाा पड़ सकता है.
भगवान कृष्ण पर भी लगा था झूठा आरोप
पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान कृष्ण ने भी एक बार चतुर्थी का चंद्रमा देख लिया था. इसके बाद उन पर स्यमंतक मणि चोरी करने का झूठा आरोप लगा. इसी घटनाा को चंद्र दर्शन से जुड़े 'मिथ्या दोष' की कथा से जोड़ा जाता है.
क्यों कहते हैं कलंक चतुर्थी
मान्यता है कि गणेश चतुर्थी के दिन चंद्रमा देखने से व्यक्ति पर गलत आरोप लगने की आशंका रहती है. इसी वजह से इस तिथि को 'कलंक चतुर्थी' कहा जाता है. धार्मिक मान्यताओं में इसलिए गणेश पूजा के साथ चंद्र दर्शन से बचने की सलााह दी जाती है.
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