उज्जैन को महाकाल की नगरी कहा जाता है, लेकिन यहां आस्था से जुड़ी ऐसी कई कहानियां भी हैं जो लोगों को हैरान कर देती हैं. इन दिनों करीब 170 साल पुराने खड़े हनुमान मंदिर की चर्चा खूब हो रही है. मान्यता है कि सड़क चौड़ीकरण के लिए जब हनुमान जी की प्रतिमा को दूसरी जगह ले जाने की कोशिश की गई तो प्रतिमा अपनी जगह से नहीं हिली. कई प्रयासों के बाद भी जब बात नहीं बनी तो श्रद्धालुओं ने इसे बजरंगबली की इच्छा और उनकी अडिग शक्ति से जोड़कर देखना शुरू कर दिया.
इसलिए कहलाए 'डॉक्टर हनुमान'
मंदिर से जुड़े पुजारी महेश बैरागी के अनुसार, यहां लंबे समय से छोटे बच्चों के लिए झाड़नी और ताबीज की परंपरा चली आ रही है. स्थानीय मान्यता है कि हनुमान जी की कृपा से बच्चों की परेशानियां दूर होती हैं. इसी वजह से भक्त प्यार से इन्हें 'डॉक्टर हनुमान' भी कहते हैं. मंदिर से जुड़े लोगों के मुताबिक कई परिवार बच्चों की समस्या लेकर यहां मन्नत मांगने आते हैं.
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मुस्लिम परिवार भी आते हैं मन्नत मांगने
इस मंदिर की एक खास बात यह भी है कि यहां सिर्फ हिंदू परिवार ही नहीं, बल्कि मुस्लिम समाज के लोग भी मन्नत लेकर पहुंचते हैं. भक्त शिवेंद्र तिवारी के अनुसार, संतान और बीमारी जैसी परेशानियों को लेकर कई परिवार यहां आाते हैं. श्रद्धालुओं का मानना है कि सच्चे मन से मांगी गई मन्नत बजरंगबली जरूर सुनते हैं.
चार बार कोशिश फिर भी नहीं हिली प्रतिमा
सिंहस्थ महाकुंभ 2028 की तैयारियों के तहत उज्जैन में कंठाल चौराहे से छत्री चौक तक सड़क चौड़ीकरण का काम चल रहा है. इसी रास्ते में सती गेट के पास खड़े हनुमान जी का यह पुराना मंदिर है. मंदिर को दूसरी जगह शिफ्ट करने की कोशिश के दौरान 4 और 5 सितंबर को प्रतिमा को हटाने का प्रयास किया गया. मंदिर से जुड़े लोगों का दावा है कि चार अलग-अलग कोशिशों के बावजूद प्रतिमा अपनी जगहह से नहीं हिली. इसके बाद यह मामला श्रद्धालुओं के बीच चर्चा का विषय बन गया.
1857 से जुड़ा बताया जाता है मंदिर का इतिहास
स्थानीय लोगों और मंदिर से जुड़े परिवार के अनुसार, मंदिर करीब 170 साल पुराना है और इसकी स्थापना 1857 के आसपास मानी जाती है. पुराने कागजातों में 1857 से जुड़े दस्तावेज मिलने की बात भी कही जा रही है. हालांकि इन दस्तावेजों की आधिकारिक पुष्टि अलग विषय है, लेकिन स्थानीय श्रद्धालुओं के बीच मंदिर की प्राचीनता को लेकर गहरी आस्था है.
पांच पीढ़ियों से हो रही हनुमान जी की सेवा
मंदिर से जुड़े महेश पंडित के परिवार का कहना है कि उनके परिवार की कई पीढ़ियां यहां पूजा और सेवा करती आई हैं. अब पांचवीं पीढ़ी भी इस परंपरा से जुड़ी बताई जााती है. यही वजह है कि परिवार और स्थानीय भक्तों के लिए यह मंदिर सिर्फ पूजा की जगह नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही आस्थाा का हिस्सा है.
आस्था या प्राचीन तकनीक चर्चा का विषय
विक्रम विश्वविद्यालय के पुरातत्व विशेषज्ञ प्रो. रमण सोलंकी ने प्रतिमा की बनावट और परंपरा के आधार पर इसके पुराने कालखंड से जुड़े होने की संभावना जताई है. प्राचीन मंदिरों में मूर्तियों को मजबूत आधाार पर स्थापित करने की तकनीक अपनाई जाती थी. ऐसे में प्रतिमा का मजबूती से टिके रहना स्थापत्य तकनीक से भी जुड़ा हो सकता है. वहीं श्रद्धालुओं के लिए इसका अर्थ बिल्कुल अलग है. उनका विश्वास है कि जब बजरंगबली अपनी जगह से नहीं हटना चाहते, तो उन्हें कोई कैसे हटा सकता है. यही आस्था आज खड़े हनुमान मंदिर को चर्चा में ला रही है.
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