Varuthini Ekadashi 2026: हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का बेहद खास महत्व है. हिंदू पंचांग के अनुसार, साल भर में कुल 24 एकादशी आती हैं और हर एकादशी का अलग धार्मिक महत्व होता है. वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को वरुथिनी एकादशी कहा जाता है. द्रिक पंचांग के अनुसार, वरुथिनी एकादशी तिथि 13 अप्रैल 2026 को रात 1 बजकर 17 मिनट से शुरू हुई और इसका समापन 14 अप्रैल 2026 को रात 1 बजकर 08 मिनट पर होगा. ऐसे में उदया तिथि के अनुसार, वरुथिनी एकादशी का व्रत 13 अप्रैल 2026, सोमवार को रखा जा रहा है और इसका पारण 14 अप्रैल 2026 को द्वादशी तिथि में किया जाएगा.
मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु के मधुसूदन स्वरूप की पूजा करने से व्यक्ति को हजारों वर्षों की तपस्या के बराबर पुण्य फल प्राप्त होता है. यह व्रत न केवल आध्यात्मिक उन्नति देता है, बल्कि जीवन के दुखों और कष्टों को भी दूर करने में सहायक माना जाता है.
शुभ मुहूर्त और पारण का समय
ज्योतिष गणना के अनुसार, 13 अप्रैल को सुबह 06 बजकर 12 मिनट से दोपहर 12 बजकर 20 मिनट तक पूजा के लिए अत्यंत शुभ समय है. व्रत रखने वाले श्रद्धालु 14 अप्रैल को सुबह 05 बजकर 56 मिनट से 08 बजकर 30 मिनट के बीच पारण कर सकते हैं. ध्यान रखें कि व्रत खोलते समय द्वादशी तिथि का होना आवश्यक है, तभी व्रत पूर्ण माना जाता है.
वरुथिनी एकादशी पूजा विधि- इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ वस्त्र धारण करें.
- इसके बाद भगवान विष्णु के सामने जल लेकर व्रत का संकल्प लें.
- भगवान की प्रतिमा या चित्र को गंगाजल से स्नान कराएं और उन्हें पीले वस्त्र, चंदन और पीले फूल अर्पित करें.
- भोग में खरबूजा, आम जैसे मौसमी फल चढ़ाएं.
- तुलसी दल अवश्य शामिल करें, क्योंकि बिना तुलसी के भगवान विष्णु भोग स्वीकार नहीं करते.
- अंत में व्रत कथा का पाठ करें और घी के दीपक से आरती करें.
- इसके अलावा शाम के समय तुलसी के पास दीपक जलाकर 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का 11 बार जाप करते हुए परिक्रमा करें.
इस दिन चावल का सेवन नहीं करना चाहिए. साथ ही झूठ बोलने, क्रोध करने और किसी की निंदा करने से बचें. यदि व्रत नहीं भी रख रहे हैं, तो भी सात्विक भोजन ही करें. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्रद्धा और नियमों के साथ किया गया यह व्रत जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लाता है.
एकादशी की आरती | Ekadashi Ki Artiॐ जय एकादशी, जय एकादशी,जय एकादशी माता।
विष्णु पूजा व्रत को धारण कर,शक्ति मुक्ति पाता॥
ॐ जय एकादशी...॥
तेरे नाम गिनाऊं देवी,भक्ति प्रदान करनी।
गण गौरव की देनी माता,शास्त्रों में वरनी॥
ॐ जय एकादशी...॥
मार्गशीर्ष के कृष्णपक्ष की उत्पन्ना,विश्वतारनी जन्मी।
शुक्ल पक्ष में हुई मोक्षदा,मुक्तिदाता बन आई॥
ॐ जय एकादशी...॥
पौष के कृष्णपक्ष की,सफला नामक है।
शुक्लपक्ष में होय पुत्रदा,आनन्द अधिक रहै॥
ॐ जय एकादशी...॥
नाम षटतिला माघ मास में,कृष्णपक्ष आवै।
शुक्लपक्ष में जया, कहावै,विजय सदा पावै॥
ॐ जय एकादशी...॥
विजया फागुन कृष्णपक्ष मेंशुक्ला आमलकी।
पापमोचनी कृष्ण पक्ष में,चैत्र महाबलि की॥
ॐ जय एकादशी...॥
चैत्र शुक्ल में नाम कामदा,धन देने वाली।
नाम वरूथिनी कृष्णपक्ष में,वैसाख माह वाली॥
ॐ जय एकादशी...॥
शुक्ल पक्ष में होयमोहिनी अपरा ज्येष्ठ कृष्णपक्षी।
नाम निर्जला सब सुख करनी,शुक्लपक्ष रखी॥
ॐ जय एकादशी...॥
योगिनी नाम आषाढ में जानों,कृष्णपक्ष करनी।
देवशयनी नाम कहायो,शुक्लपक्ष धरनी॥
ॐ जय एकादशी...॥
कामिका श्रावण मास में आवै,कृष्णपक्ष कहिए।
श्रावण शुक्ला होयपवित्रा आनन्द से रहिए॥
ॐ जय एकादशी...॥
अजा भाद्रपद कृष्णपक्ष की,परिवर्तिनी शुक्ला।
इन्द्रा आश्चिन कृष्णपक्ष में,व्रत से भवसागर निकला॥
ॐ जय एकादशी...॥
पापांकुशा है शुक्ल पक्ष में,आप हरनहारी।
रमा मास कार्तिक में आवै,सुखदायक भारी॥
ॐ जय एकादशी...॥
देवोत्थानी शुक्लपक्ष की,दुखनाशक मैया।
पावन मास में करूंविनती पार करो नैया॥
ॐ जय एकादशी...॥
परमा कृष्णपक्ष में होती,जन मंगल करनी।
शुक्ल मास में होयपद्मिनी दुख दारिद्र हरनी॥
ॐ जय एकादशी...॥
जो कोई आरती एकादशी की,भक्ति सहित गावै।
जन गुरदिता स्वर्ग का वासा,निश्चय वह पावै॥
ॐ जय एकादशी...॥
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी ! जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥
ॐ जय जगदीश हरे।
जो ध्यावे फल पावे, दुःख विनसे मन का।
स्वामी दुःख विनसे मन का।
सुख सम्पत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥
ॐ जय जगदीश हरे।
मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूँ मैं किसकी।
स्वामी शरण गहूँ मैं किसकी।
तुम बिन और न दूजा, आस करूँ जिसकी॥
ॐ जय जगदीश हरे।
तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी।
स्वामी तुम अन्तर्यामी।
पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी॥
ॐ जय जगदीश हरे।
तुम करुणा के सागर, तुम पालन-कर्ता।
स्वामी तुम पालन-कर्ता।
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥
ॐ जय जगदीश हरे।
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
स्वामी सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूँ दयामय, तुमको मैं कुमति॥
ॐ जय जगदीश हरे।
दीनबन्धु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।
स्वामी तुम ठाकुर मेरे।
अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥
ॐ जय जगदीश हरे।
विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
स्वमी पाप हरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, सन्तन की सेवा॥
ॐ जय जगदीश हरे।
श्री जगदीशजी की आरती, जो कोई नर गावे।
स्वामी जो कोई नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी, सुख संपत्ति पावे॥
ॐ जय जगदीश हरे।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. एनडीटीवी इसकी पुष्टि नहीं करता है.)
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