हिंदू धर्म में सनातन काल से 'श्राद्ध' की परंपरा रही है. कहते हैं कि हर इंसान पर देव ऋण, गुरु ऋण और पितृ (माता-पिता) ऋण होते हैं. पितृऋण से मुक्ति तभी मिलती है, जब माता-पिता के मरणोपरांत पितृपक्ष में उनके लिए विधिवत श्राद्ध किया जाए. आश्विन कृष्ण पक्ष प्रतिपदा से आश्विन महीने के अमावस्या तक को 'पितृपक्ष' या 'महालया पक्ष' कहा गया है. मान्यता के अनुसार इस दौरान पिंडदान मोक्ष प्राप्ति का सहज और सरल मार्ग है. पितरों के लिए खास तौर पर पितृपक्ष में मोक्षधाम यानी बिहार के गया आकर पिंडदान और तर्पण करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है और माता-पिता समेत सात पीढ़ियों का उद्धार होता है.
विष्णु का नगर
पितृपक्ष के दौरान बिहार के गया में मेले का आयोजन किया जाता है. गया को विष्णु का नगर माना गया है. यह मोक्ष की भूमि कहलाती है. विष्णु पुराण और वायु पुराण में भी इसकी चर्चा की गई है. विष्णु पुराण के मुताबिक, गया में पिंडदान करने से पूर्वजों को मोक्ष मिल जाता है और वे स्वर्ग चले जाते हैं. माना जाता है कि स्वयं विष्णु यहां पितृ देवता के रूप में मौजूद है, इसलिए इसे 'पितृ तीर्थ' भी कहा जाता है. वायुपुराण में तो यहां कि फल्गु नदी की महत्ता का वर्णन किया गया है और इसे गंगा नदी से भी ज्यादा पवित्र माना गया है.
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सत्य तक पहुंचने का मार्ग है श्राद्ध...
फल्गु नदी पर पिंडदान
लोक मान्यता है कि फल्गु नदी के तट पर पिंडदान एवं तर्पण करने से पितरों को सबसे उत्तम गति के साथ मोक्ष की प्राप्ति होती है. कहते हैं कि यहां पिंडदान से पितरों समेत कुल की सात पीढ़ियों का उद्धार होता है और पिंडदानकर्ता खुद भी परमगति को प्राप्त करते है. देश में श्राद्घ के लिए 55 स्थानों को महत्वपूर्ण माना गया है जिसमें बिहार के गया का स्थान सबसे अहम है.
मिला है मां सीता से श्राप
गया शहर के पूर्वी छोर पर पवित्र फल्गु नदी बहती है. तकरीबन पूरे साल ही लोग अपने पूर्वजों के लिए मोक्ष की कामना लेकर यहां पहुंचते हैं और फल्गु नदी के तट पर पिंडदान और तर्पण करते हैं. कहते हैं कि माता सीता के श्राप के कारण यह नदी अन्य नदियों के तरह नहीं बह कर भूमि के अंदर बहती है, इसलिए इसे 'अंत: सलिला' कहा जाता है. मान्यता है कि सबसे पहले आदिकाल में जन्मदाता ब्रह्मा और भगवान श्रीराम ने फल्गु नदी में पिंडदान किया था. महाभारत के वनपर्व में भीष्म पितामह और पांडवों द्वारा भी पिंडदान किए जाने का उल्लेख है.
इनपुट आईएनएस से
विष्णु का नगर
पितृपक्ष के दौरान बिहार के गया में मेले का आयोजन किया जाता है. गया को विष्णु का नगर माना गया है. यह मोक्ष की भूमि कहलाती है. विष्णु पुराण और वायु पुराण में भी इसकी चर्चा की गई है. विष्णु पुराण के मुताबिक, गया में पिंडदान करने से पूर्वजों को मोक्ष मिल जाता है और वे स्वर्ग चले जाते हैं. माना जाता है कि स्वयं विष्णु यहां पितृ देवता के रूप में मौजूद है, इसलिए इसे 'पितृ तीर्थ' भी कहा जाता है. वायुपुराण में तो यहां कि फल्गु नदी की महत्ता का वर्णन किया गया है और इसे गंगा नदी से भी ज्यादा पवित्र माना गया है.
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मिला है मां सीता से श्राप
गया शहर के पूर्वी छोर पर पवित्र फल्गु नदी बहती है. तकरीबन पूरे साल ही लोग अपने पूर्वजों के लिए मोक्ष की कामना लेकर यहां पहुंचते हैं और फल्गु नदी के तट पर पिंडदान और तर्पण करते हैं. कहते हैं कि माता सीता के श्राप के कारण यह नदी अन्य नदियों के तरह नहीं बह कर भूमि के अंदर बहती है, इसलिए इसे 'अंत: सलिला' कहा जाता है. मान्यता है कि सबसे पहले आदिकाल में जन्मदाता ब्रह्मा और भगवान श्रीराम ने फल्गु नदी में पिंडदान किया था. महाभारत के वनपर्व में भीष्म पितामह और पांडवों द्वारा भी पिंडदान किए जाने का उल्लेख है.
इनपुट आईएनएस से
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